दोहा 60
श्रीसीता-राम-संवाद
बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी॥ पाहनकृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ॥१॥
भावार्थ
वनके लिये तो ब्रह्माजीने विषयसुखको न जाननेवाली कोल और भीलोंकी लड़कियोंको रचा है, जिनका पत्थरके कीड़े-जैसा कठोर स्वभाव है। उन्हें वनमें कभी क्लेश नहीं होता॥१॥
कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू॥ सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती॥२॥
भावार्थ
अथवा तपस्वियोंकी स्त्रियाँ वनमें रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्याके लिये सब भोग तज दिये हैं। हे पुत्र! जो तसवीरके बन्दरको देखकर डर जाती हैं वे सीता वनमें किस तरह रह सकेंगी ?॥२॥
सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी॥ अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई॥३॥
भावार्थ
देवसरोवरके कमलवनमें विचरण करनेवाली हंसिनी क्या गड़ैयों ( तलैयों ) में रहनेके योग्य है ? ऐसा विचारकर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकीको वैसी ही शिक्षा दूँ॥३॥
जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा॥ सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी॥४॥
भावार्थ
माता कहती हैं—यदि सीता घरमें रहें तो मुझको बहुत सहारा हो जाय। श्रीरामचन्द्रजीने माताकी प्रिय वाणी सुनकर, जो मानो शील और स्नेहरूपी अमृतसे सनी हुई थी, ॥४॥
कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष। लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष॥६०॥
भावार्थ
विवेकमय प्रिय वचन कहकर माताको सन्तुष्ट किया। फिर वनके गुण-दोष प्रकट करके वे जानकीजीको समझाने लगे॥६०॥
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