दोहा 41
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी॥ जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना॥१॥
भावार्थ
कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी वाणी कह रही है जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो उठी। जीभ धनुष है, वचन बहुत-से तीर हैं और मानो राजा ही कोमल निशानेके समान हैं॥१॥
जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू॥ सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई॥२॥
भावार्थ
[ इस सारे साज-सामानके साथ ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीरका शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है। श्रीरघुनाथजीको सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो॥ २॥
मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू॥ बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥३॥
भावार्थ
सूर्यकुलके सूर्य, स्वाभाविक ही आनन्दनिधान श्रीरामचन्द्रजी मनमें मुसकराकर सब दूषणोंसे रहित ऐसे कोमल और सुन्दर वचन बोले जो मानो वाणीके भूषण ही थे— ॥३॥
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥ तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥४॥
भावार्थ
हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माताके वचनोंका अनुरागी ( पालन करनेवाला ) है। [ आज्ञा-पालनके द्वारा ] माता-पिताको सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी! सारे संसारमें दुर्लभ है॥४॥
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर। तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥४१॥
भावार्थ
वनमें विशेषरूपसे मुनियोंका मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकारसे कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजीकी आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है॥४१॥
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