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दोहा 40

चौ०

सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भूअंगू॥ सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई॥१॥

भावार्थ

राजाके ओठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणिके बिना साँप दुःखी हो रहा हो। पास ही क्रोधसे भरी कैकेयीको देखा, मानो [ साक्षात् ] मृत्यु ही बैठी [ राजाके जीवनकी अन्तिम ] घड़ियाँ गिन रही हो॥१॥

चौ०

करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ॥ तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥२॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने [ अपने जीवनमें ] पहली बार यह दुःख देखा; इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। तो भी समयका विचार करके हृदयमें धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनोंसे माता कैकेयीसे पूछा— ॥२॥

चौ०

मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन॥ सुनहु राम सबु कारनु एहू। राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू॥३॥

भावार्थ

हे माता! मुझे पिताजीके दुःखका कारण कहो ताकि जिससे उसका निवारण हो ( दुःख दूर हो ) वह यत्न किया जाय। [ कैकेयीने कहा— ] हे राम! सुनो, सारा कारण यही है कि राजाका तुमपर बहुत स्नेह है॥३॥

चौ०

देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना॥ सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥४॥

भावार्थ

इन्होंने मुझे दो वरदान देनेको कहा था। मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वही मैंने माँगा। उसे सुनकर राजाके हृदयमें सोच हो गया; क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते॥४॥

दो०

सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु॥४०॥

भावार्थ

इधर तो पुत्रका स्नेह है और उधर वचन ( प्रतिज्ञा ); राजा इसी धर्मसंकटमें पड़ गये हैं। यदि तुम कर सकते हो, तो राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेशको मिटाओ॥४०॥

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