दोहा 4
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी॥ नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू॥१॥
भावार्थ
अपने जीमें गुरुजीको सब प्रकारसे प्रसन्न जानकर, हर्षित होकर राजा कोमल वाणीसे बोले—हे नाथ! श्रीरामचन्द्रको युवराज कीजिये। कृपा करके कहिये ( आज्ञा दीजिये ) तो तैयारी की जाय॥ १ ॥
मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू॥ प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं॥२॥
भावार्थ
मेरे जीते-जी यह आनन्द-उत्सव हो जाय, [ जिससे ] सब लोग अपने नेत्रोंका लाभ प्राप्त करें। प्रभु ( आप )-के प्रसादसे शिवजीने सब कुछ निबाह दिया ( सब इच्छाएँ पूर्ण कर दीं ), केवल यही एक लालसा मनमें रह गयी है॥ २ ॥
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ॥ सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए॥३॥
भावार्थ
[ इस लालसाके पूर्ण हो जानेपर ] फिर सोच नहीं, शरीर रहे या चला जाय, जिससे मुझे पीछे पछतावा न हो। दशरथजीके मङ्गल और आनन्दके मूल सुन्दर वचन सुनकर मुनि मनमें बहुत प्रसन्न हुए॥ ३ ॥
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं॥ भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी॥४॥
भावार्थ
[ वसिष्ठजीने कहा— ] हे राजन्! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना जीकी जलन नहीं जाती, वही स्वामी ( सर्वलोकमहेश्वर ) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेमके अनुगामी हैं। [ श्रीरामजी पवित्र प्रेमके पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, इसीसे तो प्रेमवश आपके पुत्र हुए हैं ]॥ ४ ॥
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु। सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु॥४॥
भावार्थ
हे राजन्! अब देर न कीजिये; शीघ्र सब सामान सजाइये। शुभ दिन और सुन्दर मङ्गल तभी है जब श्रीरामचन्द्रजी युवराज हो जायँ ( अर्थात् उनके अभिषेकके लिये सभी दिन शुभ और मङ्गलमय हैं )॥ ४ ॥
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