दोहा 3
रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे उनकी प्रार्थना
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक॥ सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी॥१॥
भावार्थ
राजाने कहा—हे मुनिराज! [ कृपया यह निवेदन ] सुनिये। श्रीरामचन्द्र अब सब प्रकारसे सब योग्य हो गये हैं। सेवक, मन्त्री, सब नगरनिवासी और जो हमारे शत्रु, मित्र या उदासीन हैं—॥ १ ॥
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही॥ बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाईं॥२॥
भावार्थ
सभीको श्रीरामचन्द्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं। [ उनके रूपमें ] आपका आशीर्वाद ही मानो शरीर धारण करके शोभित हो रहा है। हे स्वामी! सारे ब्राह्मण, परिवारसहित आपके ही समान उनपर स्नेह करते हैं॥ २ ॥
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं॥ मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें॥३॥
भावार्थ
जो लोग गुरुके चरणोंकी रजको मस्तकपर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्यको अपने वशमें कर लेते हैं। इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसीने नहीं किया। आपकी पवित्र चरण-रजकी पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया॥ ३ ॥
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें॥ मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू॥४॥
भावार्थ
अब मेरे मनमें एक ही अभिलाषा है। हे नाथ! वह भी आपहीके अनुग्रहसे पूरी होगी। राजाका सहज प्रेम देखकर मुनिने प्रसन्न होकर कहा—नरेश! आज्ञा दीजिये ( कहिये, क्या अभिलाषा है ? )॥ ४ ॥
राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार। फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार॥३॥
भावार्थ
हे राजन्! आपका नाम और यश ही सम्पूर्ण मनचाही वस्तुओंको देनेवाला है। हे राजाओंके मुकुटमणि! आपके मनकी अभिलाषा फलका अनुगमन करती है ( अर्थात् आपके इच्छा करनेके पहले ही फल उत्पन्न हो जाता है )॥ ३ ॥
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