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दोहा 325

चौ०

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥ नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥१॥

भावार्थ

भरतजीका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है। तेज ( अन्न, घृत आदिसे उत्पन्न होनेवाला मेद* ) घट रहा है। बल और मुखछबि ( मुखकी कान्ति अथवा शोभा ) वैसी ही बनी हुई है। रामप्रेमका प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्मका दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है ( अर्थात्‌ प्रसन्न है )॥१॥

* संस्कृत-कोषमें ‘तेज’ का अर्थ मेद मिलता है और यह अर्थ लेनेसे ‘घटइ’ के अर्थमें भी किसी प्रकारकी खींच-तान नहीं करनी पड़ती।

चौ०

जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे॥ सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा॥२॥

भावार्थ

जैसे शरद्‌-ऋतुके प्रकाश [ विकास ] से जल घटता है, किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं। शम, दम, संयम, नियम और उपवास आदि भरतजीके हृदयरूपी निर्मल आकाशके नक्षत्र ( तारागण ) हैं॥२॥

चौ०

ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥ राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥३॥

भावार्थ

विश्वास ही [ उस आकाशमें ] ध्रुवतारा है, चौदह वर्षकी अवधि [ का ध्यान ] पूर्णिमाके समान है और स्वामी श्रीरामजीकी सुरति ( स्मृति ) आकाशगङ्गा-सरीखी प्रकाशित है। रामप्रेम ही अचल ( सदा रहनेवाला ) और कलङ्करहित चन्द्रमा है। वह अपने समाज ( नक्षत्रों ) सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है॥३॥

चौ०

भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥ बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥४॥

भावार्थ

भरतजीकी रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्यका वर्णन करनेमें सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [ औरोंकी तो बात ही क्या ] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वतीकी भी पहुँच नहीं है॥४॥

दो०

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति। मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति॥३२५॥

भावार्थ

वे नित्यप्रति प्रभुकी पादुकाओंका पूजन करते हैं, हृदयमें प्रेम समाता नहीं है। पादुकाओंसे आज्ञा माँग-माँगकर वे बहुत प्रकार ( सब प्रकारके ) राज-काज करते हैं॥ ३२५ ॥

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