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दोहा 324

चौ०

राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥ नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥१॥

भावार्थ

फिर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी और गुरुजीके चरणोंमें सिर नवाकर और प्रभुकी चरणपादुकाओंकी आज्ञा पाकर धर्मकी धुरी धारण करनेमें धीर भरतजीने नन्दिग्राममें पर्णकुटी बनाकर उसीमें निवास किया॥१॥

चौ०

जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥ असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥२॥

भावार्थ

सिरपर जटाजूट और शरीरमें मुनियोंके [ वल्कल ] वस्त्र धारणकर, पृथ्वीको खोदकर उसके अंदर कुशकी आसनी बिछायी। भोजन, वस्त्र, बरतन, व्रत, नियम—सभी बातोंमें वे ऋषियोंके कठिन धर्मका प्रेमसहित आचरण करने लगे॥२॥

चौ०

भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई॥३॥

भावार्थ

गहने-कपड़े और अनेकों प्रकारके भोग-सुखोंको मन, तन और वचनसे तृण तोड़कर ( प्रतिज्ञा करके ) त्याग दिया। जिस अयोध्याके राज्यको देवराज इन्द्र सिहाते थे और [ जहाँके राजा ] दशरथजीकी सम्पत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे,॥३॥

चौ०

तेहिंं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥ रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥४॥

भावार्थ

उसी अयोध्यापुरीमें भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पाके बागमें भौंरा। श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मीके विलास [ भोगैश्वर्य ] को वमनकी भाँति त्याग देते हैं ( फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं )॥४॥

दो०

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति॥३२४॥

भावार्थ

फिर भरतजी तो [ स्वयं ] श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके पात्र हैं। वे इस ( भोगैश्वर्यत्यागरूप ) करनीसे बड़े नहीं हुए ( अर्थात्‌ उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है )। [ पृथ्वीपरका जल न पीनेकी ] टेकसे चातककी और नीर-क्षीर-विवेककी विभूति ( शक्ति ) से हंसकी भी सराहना होती है॥३२४॥

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