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दोहा 303

चौ०

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥ सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री॥१॥

भावार्थ

कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजीने लोगोंको अपने स्नेह और देवराज इन्द्रके भारी छलसे दुःखी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री आदि सभीकी बुद्धिको भरतजीकी भक्तिने कील दिया॥१॥

चौ०

रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से॥ भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥२॥

भावार्थ

सब लोग चित्रलिखे-से श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये हुए-से वचन बोलते हैं। भरतजीकी प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुननेमें सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करनेमें कठिनता है॥२॥

चौ०

जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥३॥

भावार्थ

जिनकी भक्तिका लवलेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेममें मग्न हो गये, उन भरतजीकी महिमा तुलसीदास कैसे कहे? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे [ कविके ] हृदयमें सुबुद्धि हुलस रही है ( विकसित हो रही है )॥३॥

चौ०

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई॥४॥

भावार्थ

परन्तु वह बुद्धि अपनेको छोटी और भरतजीकी महिमाको बड़ी जानकर कविपरम्पराकी मर्यादाको मानकर सकुचा गयी ( उसका वर्णन करनेका साहस नहीं कर सकी )। उसकी गुणोंमें रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धिकी गति बालकके वचनोंकी तरह हो गयी ( वह कुण्ठित हो गयी )!॥४॥

दो०

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि॥३०३॥

भावार्थ

भरतजीका निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कविकी सुबुद्धि चकोरी है, जो भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें उस चन्द्रमाको उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है [ तब उसका वर्णन कौन करे? ]॥३०३॥

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