दोहा 302
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू॥ काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती॥१॥
भावार्थ
देवराज इन्द्र कपट और कुचालकी सीमा है। उसे परायी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्रकी रीति कौएके समान है। वह छली और मलिन-मन है, उसका कहीं किसीपर विश्वास नहीं है॥१॥
प्रथम कुमत करि कपटु संँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥२॥
भावार्थ
पहले तो कुमत ( बुरा विचार ) करके कपटको बटोरा ( अनेक प्रकारके कपटका साज सजा )। फिर वह ( कपटजनित ) उचाट सबके सिरपर डाल दिया। फिर देवमायासे सब लोगोंको विशेषरूपसे मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमसे उनका अत्यन्त बिछोह नहीं हुआ ( अर्थात् उनका श्रीरामजीके प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा )॥२॥
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं॥ दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी॥३॥
भावार्थ
भय और उचाटके वश किसीका मन स्थिर नहीं है। क्षणमें उनकी वनमें रहनेकी इच्छा होती है और क्षणमें उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मनकी इस प्रकारकी दुविधामयी स्थितिसे प्रजा दुखी हो रही है। मानो नदी और समुद्रके सङ्गमका जल क्षुब्ध हो रहा हो। ( जैसे नदी और समुद्रके सङ्गमका जल स्थिर नहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकारकी दशा प्रजाके मनकी हो गयी )॥३॥
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं॥ लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥४॥
भावार्थ
चित्त दोतरफा हो जानेसे वे कहीं सन्तोष नहीं पाते और एक-दूसरेसे अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदयमें हँसकर कहने लगे—कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक ( कामी पुरुष ) एक-सरीखे ( एक ही स्वभावके ) हैं। [ पाणिनीय व्याकरणके अनुसार श्वन्, युवन् और मघवन् शब्दोंके रूप भी एक-सरीखे होते हैं ]॥४॥
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ॥३०२॥
भावार्थ
भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मन्त्री और ज्ञानी साधु-संतोंको छोड़कर अन्य सभीपर जिस मनुष्यको जिस योग्य ( जिस प्रकृति और जिस स्थितिका ) पाया, उसपर वैसे ही देवमाया लग गयी॥३०२॥
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