दोहा 256
तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥ सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥१॥
भावार्थ
[ वे बोले— ] हे तात! बात सत्य है, पर है रामजीकी कृपासे ही। रामविमुखको तो स्वप्नमें भी सिद्धि नहीं मिलती। हे तात! मैं एक बात कहनेमें सकुचाता हूँ। बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [ आधेकी रक्षाके लिये ] आधा छोड़ दिया करते हैं॥ १ ॥
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥ सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥२॥
भावार्थ
अतः तुम दोनों भाई ( भरत-शत्रुघ्न ) वनको जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्रीरामचन्द्रको लौटा दिया जाय। ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये। उनके सारे अंग परमानन्दसे परिपूर्ण हो गये॥ २ ॥
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा॥ बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी॥३॥
भावार्थ
उनके मन प्रसन्न हो गये। शरीरमें तेज सुशोभित हो गया। मानो राजा दशरथ जी उठे हों और श्रीरामचन्द्रजी राजा हो गये हों! अन्य लोगोंको तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई। परन्तु रानियोंको दुःख-सुख समान ही थे ( राम-लक्ष्मण वनमें रहें या भरत-शत्रुघ्न, दो पुत्रोंका वियोग तो रहेगा ही ), यह समझकर वे सब रोने लगीं॥ ३ ॥
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥ कानन करउँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥४॥
भावार्थ
भरतजी कहने लगे—मुनिने जो कहा, वह करनेसे जगत्भरके जीवोंको उनकी इच्छित वस्तु देनेका फल होगा। [ चौदह वर्षकी कोई अवधि नहीं, ] मैं जन्मभर वनमें वास करूँगा। मेरे लिये इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है॥ ४ ॥
अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान। जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान॥२५६॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी हृदयकी जाननेवाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं। यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ! अपने वचनोंको प्रमाण कीजिये ( उनके अनुसार व्यवस्था कीजिये )॥ २५६ ॥
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