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दोहा 255

चौ०

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू॥ केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ॥१॥

भावार्थ

श्रीरामजीका राज्याभिषेक सबके लिये सुखदायक है। मङ्गल और आनन्दका मूल यही एक मार्ग है। [ अब ] श्रीरघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें ? विचारकर कहो, वही उपाय किया जाय॥ १ ॥

चौ०

सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी॥ उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे॥२॥

भावार्थ

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीकी नीति, परमार्थ और स्वार्थ ( लौकिक हित ) में सनी हुई वाणी सबने आदरपूर्वक सुनी। पर किसीको कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले ( विचारशक्तिसे रहित ) हो गये। तब भरतने सिर नवाकर हाथ जोड़े॥ २ ॥

चौ०

भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे॥ जनम हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता॥३॥

भावार्थ

[ और कहा— ] सूर्यवंशमें एक-से-एक अधिक बड़े बहुत-से राजा हो गये हैं। सभीके जन्मके कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मोंको ( कर्मोंका फल ) विधाता देते हैं॥ ३ ॥

चौ०

दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना॥ सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी॥४॥

भावार्थ

आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दुःखोंका दमन करके, समस्त कल्याणोंको सज देती है; यह जगत् जानता है। हे स्वामी! आप वही हैं जिन्होंने विधाताकी गति ( विधान ) को भी रोक दिया। आपने जो टेक टेक दी ( जो निश्चय कर दिया ) उसे कौन टाल सकता है ?॥ ४ ॥

दो०

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु। सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु॥२५५॥

भावार्थ

अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजीके प्रेममय वचनोंको सुनकर गुरुजीके हृदयमें प्रेम उमड़ आया॥ २५५ ॥

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