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दोहा 247

चौ०

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं॥ कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा॥१॥

भावार्थ

सीताजी और सब रानियाँ स्नेहके मारे व्याकुल हैं। तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेके लिये कहा। फिर मुनिनाथ वसिष्ठजीने जगत्‌की गतिको मायिक कहकर ( अर्थात्‌ जगत्‌ मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर ) कुछ परमार्थकी कथाएँ ( बातें ) कहीं॥१॥

चौ०

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा॥ मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी॥२॥

भावार्थ

तदनन्तर वसिष्ठजीने राजा दशरथजीके स्वर्गगमनकी बात सुनायी, जिसे सुनकर रघुनाथजीने दुःसह दुःख पाया। और अपने प्रति उनके स्नेहको उनके मरनेका कारण विचारकर धीरधुरन्धर श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त व्याकुल हो गये॥२॥

चौ०

कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी॥ सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू॥३॥

भावार्थ

वज्रके समान कठोर, कड़वी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी, सीताजी और सब रानियाँ विलाप करने लगीं। सारा समाज शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गया! मानो राजा आज ही मरे हों॥३॥

चौ०

मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए॥ ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा॥४॥

भावार्थ

फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने श्रीरामजीको समझाया। तब उन्होंने समाजसहित श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीजीमें स्नान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निर्जल व्रत किया। मुनि वसिष्ठजीके कहनेपर भी किसीने जल ग्रहण नहीं किया॥४॥

दो०

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह॥२४७॥

भावार्थ

दूसरे दिन सबेरा होनेपर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीको जो-जो आज्ञा दी, वह सब कार्य प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने श्रद्धा-भक्तिसहित आदरके साथ किया॥२४७॥

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