दोहा 246
सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी॥ गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता॥१॥
भावार्थ
सीताजी आकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके चरणों लगीं और उन्होंने मनमाँगी उचित आशिष पायी। फिर मुनियोंकी स्त्रियोंसहित गुरुपत्नी अरुन्धतीजीसे मिलीं। उनका जितना प्रेम था, वह कहा नहीं जाता॥ १ ॥
बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के॥ सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं॥२॥
भावार्थ
सीताजीने सभीके चरणोंकी अलग-अलग वन्दना करके अपने हृदयको प्रिय ( अनुकूल ) लगनेवाले आशीर्वाद पाये। जब सुकुमारी सीताजीने सब सासुओंको देखा, तब उन्होंने सहमकर अपनी आँखें बंद कर लीं॥ २ ॥
परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं॥ तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा॥३॥
भावार्थ
[ सासुओंकी बुरी दशा देखकर ] उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो राजहंसिनियाँ बधिकके वशमें पड़ गयी हों। [ मनमें सोचने लगीं कि ] कुचाली विधाताने क्या कर डाला? उन्होंने भी सीताजीको देखकर बड़ा दुःख पाया। [ सोचा ] जो कुछ दैव सहावे, वह सब सहना ही पड़ता है॥ ३ ॥
जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा॥ मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई॥४॥
भावार्थ
तब जानकीजी हृदयमें धीरज धरकर, नील कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर, सब सासुओंसे जाकर मिलीं। उस समय पृथ्वीपर करुणा ( करुण-रस ) छा गयी॥ ४॥
लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग। हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग॥२४६॥
भावार्थ
सीताजी सबके पैरों लग-लगकर अत्यन्त प्रेमसे मिल रही हैं, और सब सासुएँ स्नेहवश हृदयसे आशीर्वाद दे रही हैं कि तुम सुहागसे भरी रहो ( अर्थात् सदा सौभाग्यवती रहो )॥२४६॥
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