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दोहा 203

भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद

चौ०

कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं॥ साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा॥१॥

भावार्थ

निषादराजको आगे करके पीछे सब माताओंकी पालकियाँ चलायीं। छोटे भाई शत्रुघ्नजीको बुलाकर उनके साथ कर दिया। फिर ब्राह्मणोंसहित गुरुजीने गमन किया॥१॥

चौ०

आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू॥ गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए॥२॥

भावार्थ

तदनन्तर आप ( भरतजी ) ने गङ्गाजीको प्रणाम किया और लक्ष्मणसहित श्रीसीतारामजीका स्मरण किया। भरतजी पैदल ही चले। उनके साथ कोतल ( बिना सवारके ) घोड़े बागडोरसे बँधे हुए चले जा रहे हैं॥२॥

चौ०

कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा॥ रामु पयादेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए॥३॥

भावार्थ

उत्तम सेवक बार-बार कहते हैं कि हे नाथ! आप घोड़ेपर सवार हो लीजिये। [ भरतजी जवाब देते हैं कि ] श्रीरामचन्द्रजी तो पैदल ही गये और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं॥३॥

चौ०

सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा॥ देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी॥४॥

भावार्थ

मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिरके बल चलकर जाऊँ। सेवकका धर्म सबसे कठिन होता है। भरतजीकी दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानिके मारे गले जा रहे हैं॥४॥

दो०

भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥२०३॥

भावार्थ

प्रेममें उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजीने तीसरे पहर प्रयागमें प्रवेश किया॥२०३॥

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