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दोहा 202

चौ०

सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा॥ यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी॥१॥

भावार्थ

सखाके वचन सुनकर, हृदयमें धीरज धरकर श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते हुए भरतजी डेरेको चले। नगरके सारे स्त्री-पुरुष यह ( श्रीरामजीके ठहरनेके स्थानका ) समाचार पाकर बड़े आतुर होकर उस स्थानको देखने चले॥१॥

चौ०

परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा॥ भरि भरि बारि बिलोचन लेहीं। बाम बिधातहि दूषन देहीं॥२॥

भावार्थ

वे उस स्थानकी परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयीको बहुत दोष देते हैं। नेत्रोंमें जल भर-भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाताको दूषण देते हैं॥२॥

चौ०

एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू॥ निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि॥३॥

भावार्थ

कोई भरतजीके स्नेहकी सराहना करते हैं और कोई कहते हैं कि राजाने अपना प्रेम खूब निबाहा। सब अपनी निन्दा करके निषादराजकी प्रशंसा करते हैं। उस समयके विमोह और विषादको कौन कह सकता है ?॥३॥

चौ०

एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा॥ गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं॥४॥

भावार्थ

इस प्रकार रातभर सब लोग जागते रहे। सबेरा होते ही खेवा लगा। सुन्दर नावपर गुरुजीको चढ़ाकर फिर नयी नावपर सब माताओंको चढ़ाया॥४॥

चौ०

दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा॥५॥

भावार्थ

चार घड़ीमें सब गङ्गाजीके पार उतर गये। तब भरतजीने उतरकर सबको सँभाला॥५॥

दो०

प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ। आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ॥२०२॥

भावार्थ

प्रातःकालकी क्रियाओंको करके माताके चरणोंकी वन्दना कर और गुरुजीको सिर नवाकर भरतजीने निषादगणोंको [ रास्ता दिखलानेके लिये ] आगे कर लिया और सेना चला दी॥२०२॥

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