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दोहा 19

चौ०

भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई॥ का पूँछहु तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना॥१॥

भावार्थ

होनहारवश कैकेयीके मनमें विश्वास हो गया। रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी। [ मन्थरा बोली— ] क्या पूछती हो ? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा ? अपने भले-बुरेको ( अथवा मित्र-शत्रुको ) तो पशु भी पहचान लेते हैं॥ १ ॥

चौ०

भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू॥ खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें॥२॥

भावार्थ

पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पायी है आज मुझसे! मैं तुम्हारे राजमें खाती-पहनती हूँ, इसलिये सच कहनेमें मुझे कोई दोष नहीं है॥ २ ॥

चौ०

जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई॥ रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ॥३॥

भावार्थ

यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊँगी तो विधाता मुझे दण्ड देगा। यदि कल रामको राजतिलक हो गया तो [ समझ रखना कि ] तुम्हारे लिये विधाताने विपत्तिका बीज बो दिया॥ ३ ॥

चौ०

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी॥ जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई॥४॥

भावार्थ

मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूँ, हे भामिनी! तुम तो अब दूधकी मक्खी हो गयी! ( जैसे दूधमें पड़ी हुई मक्खीको लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घरसे निकाल बाहर करेंगे ) जो पुत्रसहित [ कौसल्याकी ] चाकरी बजाओगी तो घरमें रह सकोगी; [ अन्यथा घरमें रहनेका ] दूसरा उपाय नहीं॥ ४॥

दो०

कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब। भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब॥१९॥

भावार्थ

कद्रूने विनताको दुःख दिया था, तुम्हें कौसल्या देगी। भरत कारागारका सेवन करेंगे ( जेलकी हवा खायेंगे ) और लक्ष्मण रामके नायब ( सहकारी ) होंगे॥ १९ ॥

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