दोहा 18
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी॥ पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानब रउरें॥१॥
भावार्थ
रामकी माता ( कौसल्या ) बड़ी चतुर और गम्भीर है ( उसकी थाह कोई नहीं पाता )। उसने मौका पाकर अपनी बात बना ली। राजाने जो भरतको ननिहाल भेज दिया, उसमें आप बस, रामकी माताकी ही सलाह समझिये!॥ १ ॥
सेवहिं सकल सवति मोंहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें॥ सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई॥२॥
भावार्थ
[ कौसल्या समझती है कि ] और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरतकी माँ पतिके बलपर गर्वित रहती है! इसीसे हे माई! कौसल्याको तुम बहुत ही साल ( खटक ) रही हो। किन्तु वह कपट करनेमें चतुर है; अतः उसके हृदयका भाव जाननेमें नहीं आता ( वह उसे चतुरतासे छिपाये रखती है )॥ २ ॥
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी॥ रचि प्रपंचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई॥३॥
भावार्थ
राजाका तुमपर विशेष प्रेम है। कौसल्या सौतके स्वभावसे उसे देख नहीं सकती। इसीलिये उसने जाल रचकर राजाको अपने वशमें करके [ भरतकी अनुपस्थितिमें ] रामके राजतिलकके लिये लग्न निश्चय करा लिया॥ ३ ॥
यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका॥ आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही॥४॥
भावार्थ
रामको तिलक हो, यह कुल ( रघुकुल ) के उचित ही है और यह बात सभीको सुहाती है; और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है। परन्तु मुझे तो आगेकी बात विचारकर डर लगता है। दैव उलटकर इसका फल उसी ( कौसल्या ) को दे॥ ४॥
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु। कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु॥१८॥
भावार्थ
इस तरह करोड़ों कुटिलपनकी बातें गढ़-छोलकर मन्थराने कैकेयीको उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतोंकी कहानियाँ इस प्रकार [ बना-बनाकर ] कहीं जिस प्रकार विरोध बढ़े॥ १८ ॥
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