दोहा 150
पुनि पुनि पूँछत मंत्रिहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ॥ करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ॥१॥
भावार्थ
राजा बार-बार मन्त्रीसे पूछते हैं—मेरे प्रियतम पुत्रोंका सँदेसा सुनाओ। हे सखा! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको मुझे आँखों दिखा दो॥१॥
सचिव धीर धरि कह मृदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी॥ बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा॥२॥
भावार्थ
मन्त्री धीरज धरकर कोमल वाणी बोले—महाराज! आप पण्डित और ज्ञानी हैं। हे देव! आप शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान् पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने सदा साधुओंके समाजका सेवन किया है॥२॥
जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा॥ काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं॥३॥
भावार्थ
जन्म-मरण, सुख-दुःखके भोग, हानि-लाभ, प्यारोंका मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी! काल और कर्मके अधीन रात और दिनकी तरह बरबस होते रहते हैं॥३॥
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥ धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥४॥
भावार्थ
मूर्खलोग सुखमें हर्षित होते और दुःखमें रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मनमें दोनोंको समान समझते हैं। हे सबके हितकारी ( रक्षक )! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोकका परित्याग कीजिये॥४॥
प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर। न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर॥१५०॥
भावार्थ
श्रीरामजीका पहला निवास ( मुकाम ) तमसाके तटपर हुआ, दूसरा गङ्गातीरपर। सीताजीसहित दोनों भाई उस दिन स्नान करके जल पीकर ही रहे॥१५०॥
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