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दोहा 149

चौ०

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई॥ सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी॥१॥

भावार्थ

राजाने सुमन्त्रको हृदयसे लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमीको कुछ सहारा मिल गया हो। मन्त्रीको स्नेहके साथ पास बैठाकर नेत्रोंमें जल भरकर राजा पूछने लगे—॥१॥

चौ०

राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही॥ आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए॥२॥

भावार्थ

हे मेरे प्रेमी सखा! श्रीरामकी कुशल कहो। बताओ, श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी कहाँ हैं? उन्हें लौटा लाये हो कि वे वनको चले गये? यह सुनते ही मन्त्रीके नेत्रोंमें जल भर आया॥२॥

चौ०

सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू॥ राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ॥३॥

भावार्थ

शोकसे व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे—सीता, राम और लक्ष्मणका सँदेसा तो कहो। श्रीरामचन्द्रजीके रूप, गुण, शील और स्वभावको याद कर-करके राजा हृदयमें सोच करते हैं॥३॥

चौ०

राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू॥ सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना॥४॥

भावार्थ

[ और कहते हैं— ] मैंने राजा होनेकी बात सुनाकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिस ( राम ) के मनमें हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्रके बिछुड़नेपर भी मेरे प्राण नहीं गये, तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा?॥४॥

दो०

सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ। नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ॥१४९॥

भावार्थ

हे सखा! श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण जहाँ हैं, मुझे भी वहीं पहुँचा दो। नहीं तो मैं सत्य भावसे कहता हूँ कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं॥१४९॥

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