दोहा 146
पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता॥ पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी॥१॥
भावार्थ
जब दीन-दुःखी सब माताएँ पूछेंगी, तब हे विधाता! मैं उन्हें क्या कहूँगा ? जब लक्ष्मणजीकी माता मुझसे पूछेंगी, तब मैं उन्हें कौन-सा सुखदायी सँदेसा कहूँगा ?॥ १ ॥
राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई॥ पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही॥२॥
भावार्थ
श्रीरामजीकी माता जब इस प्रकार दौड़ी आवेंगी जैसे नयी ब्यायी हुई गौ बछड़ेको याद करके दौड़ी आती है, तब उनके पूछनेपर मैं उन्हें यह उत्तर दूँगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, सीता वनको चले गये!॥ २ ॥
जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा। जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा॥ पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना॥३॥
भावार्थ
जो भी पूछेगा उसे यही उत्तर देना पड़ेगा! हाय! अयोध्या जाकर अब मुझे यही सुख लेना है! जब दुःखसे दीन महाराज, जिनका जीवन श्रीरघुनाथजीके [ दर्शनके ] ही अधीन है, मुझसे पूछेंगे,॥ ३ ॥
देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई॥ सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू॥४॥
भावार्थ
तब मैं कौन-सा मुँह लेकर उन्हें उत्तर दूँगा कि मैं राजकुमारोंको कुशलपूर्वक पहुँचा आया हूँ! लक्ष्मण, सीता और श्रीरामका समाचार सुनते ही महाराज तिनकेकी तरह शरीरको त्याग देंगे॥ ४॥
हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु। जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु॥१४६॥
भावार्थ
प्रियतम ( श्रीरामजी ) रूपी जलके बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूँ कि विधाताने मुझे यह ‘यातनाशरीर’ ही दिया है [ जो पापी जीवोंको नरक भोगनेके लिये मिलता है ]॥ १४६ ॥
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