दोहा 145
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी॥ रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहू॥१॥
भावार्थ
जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधुस्वभावकी, समझदार और मन, वचन, कर्मसे पतिको ही देवता माननेवाली पतिव्रता स्त्रीको भाग्यवश पतिको छोड़कर ( पतिसे अलग ) रहना पड़े, उस समय उसके हृदयमें जैसे भयानक सन्ताप होता है, वैसे ही मन्त्रीके हृदयमें हो रहा है॥ १ ॥
लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥ सूखहिं अधर लागि मुँह लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥२॥
भावार्थ
नेत्रोंमें जल भरा है, दृष्टि मन्द हो गयी है। कानोंसे सुनायी नहीं पड़ता, व्याकुल हुई बुद्धि बेठिकाने हो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुँहमें लाटी लग गयी है। किन्तु [ ये सब मृत्युके लक्षण हो जानेपर भी ] प्राण नहीं निकलते; क्योंकि हृदयमें अवधिरूपी किवाड़ लगे हैं ( अर्थात् चौदह वर्ष बीत जानेपर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रही है )॥ २ ॥
बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी॥ हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी॥३॥
भावार्थ
सुमन्त्रजीके मुखका रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है मानो इन्होंने माता-पिताको मार डाला हो। उनके मनमें रामवियोगरूपी हानिकी महान् ग्लानि ( पीड़ा ) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरकको जाता हुआ रास्तेमें सोच कर रहा हो॥ ३ ॥
बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई॥ राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥४॥
भावार्थ
मुँहसे वचन नहीं निकलते। हृदयमें पछताते हैं कि मैं अयोध्यामें जाकर क्या देखूँगा ? श्रीरामचन्द्रजीसे शून्य रथको जो भी देखेगा, वही मुझे देखनेमें संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुँह नहीं देखना चाहेगा )॥ ४॥
धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि। उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि॥१४५॥
भावार्थ
नगरके सब व्याकुल स्त्री-पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदयपर वज्र रखकर सबको उत्तर दूँगा॥ १४५ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें