दोहा 129
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥ तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥१॥
भावार्थ
जिसकी नासिका प्रभु ( आप ) के पवित्र और सुगन्धित [ पुष्पादि ] सुन्दर प्रसादको नित्य आदरके साथ ग्रहण करती ( सूँघती ) है, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसादरूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं;॥ १ ॥
सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥ कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा॥२॥
भावार्थ
जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणोंको देखकर बड़ी नम्रताके साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) के चरणोंकी पूजा करते हैं, और जिनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं;॥ २ ॥
चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥ मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥३॥
भावार्थ
तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) के तीर्थोंमें चलकर जाते हैं; हे रामजी! आप उनके मनमें निवास कीजिये। जो नित्य आपके [ रामनामरूप ] मन्त्रराजको जपते हैं और परिवार ( परिकर )-सहित आपकी पूजा करते हैं॥ ३ ॥
तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥ तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥४॥
भावार्थ
जो अनेकों प्रकारसे तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर बहुत दान देते हैं; तथा जो गुरुको हृदयमें आपसे भी अधिक ( बड़ा ) जानकर सर्वभावसे सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं;॥ ४॥
सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥१२९॥
भावार्थ
और ये सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें हमारी प्रीति हो; उन लोगोंके मनरूपी मन्दिरोंमें सीताजी और रघुकुलको आनन्दित करनेवाले आप दोनों बसिये॥ १२९ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें