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दोहा 128

चौ०

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥ बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥१॥

भावार्थ

मुनिके प्रेमरससे सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी [ रहस्य खुल जानेके डरसे ] सकुचाकर मनमें मुसकराये। वाल्मीकिजी हँसकर फिर अमृत-रसमें डुबोयी हुई मीठी वाणी बोले— ॥ १ ॥

चौ०

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता॥ जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥२॥

भावार्थ

हे रामजी! सुनिये, अब मैं वे स्थान बताता हूँ जहाँ आप सीताजी और लक्ष्मणजी-समेत निवास करिये। जिनके कान समुद्रकी भाँति आपकी सुन्दर कथारूपी अनेकों सुन्दर नदियोंसे— ॥ २ ॥

चौ०

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे॥ लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥३॥

भावार्थ

निरन्तर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे ( तृप्त ) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिये सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रोंको चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघके लिये सदा लालायित रहते हैं;॥ ३ ॥

चौ०

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥ तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥४॥

भावार्थ

तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलोंका निरादर करते हैं और आपके सौन्दर्य [ रूपी मेघ ] के एक बूँद जलसे सुखी हो जाते हैं ( अर्थात् आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूपके किसी एक अङ्गकी जरा-सी भी झाँकीके सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत्‌के, अर्थात् पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोकतकके सौन्दर्यका तिरस्कार करते हैं ), हे रघुनाथजी! उन लोगोंके हृदयरूपी सुखदायी भवनोंमें आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित निवास कीजिये॥ ४॥

दो०

जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥१२८॥

भावार्थ

आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवरमें जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुणसमूहरूपी मोतियोंको चुगती रहती है, हे रामजी! आप उसके हृदयमें बसिये॥ १२८॥

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