दोहा 45
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए॥ कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती॥१॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके सुन्दर वचन सुनकर मुनिका शरीर पुलकित हो गया और नेत्र [ प्रेमाश्रुओंके जलसे ] भर आये। [ वे मन-ही-मन कहने लगे— ] कहो तो किस प्रभुकी ऐसी रीति है, जिसका सेवकपर इतना ममत्व और प्रेम हो॥ १ ॥
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी॥ पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद॥२॥
भावार्थ
जो मनुष्य भ्रमको त्यागकर ऐसे प्रभुको नहीं भजते, वे ज्ञानके कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं। फिर नारद मुनि आदरसहित बोले—हे विज्ञान-विशारद श्रीरामजी! सुनिये— ॥ २ ॥
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥ सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥३॥
भावार्थ
हे रघुवीर! हे भव-भय ( जन्म-मरणके भय )-का नाश करनेवाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतोंके लक्षण कहिये। [ श्रीरामजीने कहा— ] हे मुनि! सुनो, मैं संतोंके गुणोंको कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वशमें रहता हूँ॥ ३ ॥
षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥ अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥४॥
भावार्थ
वे संत [ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—इन ] छः विकारों ( दोषों ) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल ( स्थिरबुद्धि ), अकिञ्चन ( सर्वत्यागी ), बाहर-भीतरसे पवित्र, सुखके धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान्, योगी,॥ ४॥
सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना॥५॥
भावार्थ
सावधान, दूसरोंको मान देनेवाले, अभिमानरहित, धैर्यवान्, धर्मके ज्ञान और आचरणमें अत्यन्त निपुण,॥ ५ ॥
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह। तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥४५॥
भावार्थ
गुणोंके घर, संसारके दुःखोंसे रहित और सन्देहोंसे सर्वथा छूटे हुए होते हैं। मेरे चरणकमलोंको छोड़कर उनको न देह ही प्रिय होती है, न घर ही॥ ४५ ॥
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