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दोहा 44

संतोंके लक्षण और सत्संग-भजनके लिये प्रेरणा

चौ०

सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता॥ जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी॥१॥

भावार्थ

हे मुनि! सुनो, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोहरूपी वन [ को विकसित करने ] के लिये स्त्री वसन्त ऋतुके समान है। जप, तप, नियमरूपी सम्पूर्ण जलके स्थानोंको स्त्री ग्रीष्मरूप होकर सर्वथा सोख लेती है॥ १ ॥

चौ०

काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका॥ दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई॥२॥

भावार्थ

काम, क्रोध, मद और मत्सर ( डाह ) आदि मेढक हैं। इनको वर्षा-ऋतु होकर हर्ष प्रदान करनेवाली एकमात्र यही ( स्त्री ) है। बुरी वासनाएँ कुमुदोंके समूह हैं। उनको सदैव सुख देनेवाली यह शरद्‌ ऋतु है॥ २ ॥

चौ०

धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा॥ पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई॥३॥

भावार्थ

समस्त धर्म कमलोंके झुंड हैं। यह नीच ( विषयजन्य ) सुख देनेवाली स्त्री हिम-ऋतु होकर उन्हें जला डालती है। फिर ममतारूपी जवासका समूह ( वन ) स्त्रीरूपी शिशिर-ऋतुको पाकर हरा-भरा हो जाता है॥ ३ ॥

चौ०

पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी॥ बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना॥४॥

भावार्थ

पापरूपी उल्लुओंके समूहके लिये यह स्त्री सुख देनेवाली घोर अन्धकारमयी रात्रि है। बुद्धि, बल, शील और सत्य—ये सब मछलियाँ हैं और उन [ को फँसाकर नष्ट करने ] के लिये स्त्री बंसीके समान है, चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं॥ ४ ॥

दो०

अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि। ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि॥४४॥

भावार्थ

युवती स्त्री अवगुणोंकी मूल, पीड़ा देनेवाली और सब दुःखोंकी खान है। इसलिये हे मुनि! मैंने जीमें ऐसा जानकर तुमको विवाह करनेसे रोका था॥ ४४ ॥

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