दोहा 31
तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा॥ नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही॥ १ ॥
भावार्थ
तब धीरज धरकर गीधने यह वचन कहा—हे भव ( जन्म-मृत्यु ) के भयका नाश करनेवाले श्रीरामजी! सुनिये। हे नाथ! रावणने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्टने जानकीजीको हर लिया है॥ १ ॥
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं। बिलपति अति कुररी की नाईं॥ दरस लागि प्रभु राखेउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना॥ २ ॥
भावार्थ
हे गोसाईं! वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशाको गया है। सीताजी कुररी ( कुर्ज ) की तरह अत्यन्त विलाप कर रही थीं। हे प्रभो! मैंने आपके दर्शनोंके लिये ही प्राण रोक रखे थे। हे कृपानिधान ! अब ये चलना ही चाहते हैं॥ २ ॥
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता॥ जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा॥ ३ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे तात! शरीरको बनाये रखिये। तब उसने मुसकराते हुए मुँहसे यह बात कही—मरते समय जिनका नाम मुखमें आ जानेसे अधम ( महान् पापी ) भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद गाते हैं— ॥ ३ ॥
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥ जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज तें गति पाई॥ ४ ॥
भावार्थ
वही ( आप ) मेरे नेत्रोंके विषय होकर सामने खड़े हैं। हे नाथ! अब मैं किस कमी [ की पूर्ति ] के लिये देहको रखूँ? नेत्रोंमें जल भरकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे—हे तात! आपने अपने श्रेष्ठ कर्मोंसे [ दुर्लभ ] गति पायी है॥४॥
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥ तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥ ५ ॥
भावार्थ
जिनके मनमें दूसरेका हित बसता है ( समाया रहता है ), उनके लिये जगत्में कुछ भी ( कोई भी गति ) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाममें जाइये। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं ( सब कुछ पा चुके हैं )॥५॥
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ। जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥ ३१ ॥
भावार्थ
हे तात! सीताहरणकी बात आप जाकर पिताजीसे न कहियेगा। यदि मैं राम हूँ तो दशमुख रावण कुटुम्बसहित वहाँ आकर स्वयं ही कहेगा॥३१॥
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