दोहा 30
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी॥ जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली॥१॥
भावार्थ
[ इधर ] श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको आते देखकर बाह्यरूपमें बहुत चिन्ता की [ और कहा— ] हे भाई! तुमने जानकीको अकेली छोड़ दिया और मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कर यहाँ चले आये!॥१॥
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी॥२॥
भावार्थ
राक्षसोंके झुंड वनमें फिरते रहते हैं। मेरे मनमें ऐसा आता है कि सीता आश्रममें नहीं है। छोटे भाई लक्ष्मणजीने श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़कर हाथ जोड़कर कहा—हे नाथ! मेरा कुछ भी दोष नहीं है॥२॥
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥ आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना॥३॥
भावार्थ
लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी वहाँ गये जहाँ गोदावरीके तटपर उनका आश्रम था। आश्रमको जानकीजीसे रहित देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्यकी भाँति व्याकुल और दीन ( दुःखी ) हो गये॥३॥
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥ लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती॥४॥
भावार्थ
[ वे विलाप करने लगे— ] हा गुणोंकी खान जानकी! हा रूप, शील, व्रत और नियमोंमें पवित्र सीते! लक्ष्मणजीने बहुत प्रकारसे समझाया। तब श्रीरामजी लताओं और वृक्षोंकी पंक्तियोंसे पूछते हुए चले॥४॥
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥ खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥५॥
भावार्थ
हे पक्षियो! हे पशुओ! हे भौंरोंकी पंक्तियो! तुमने कहीं मृगनयनी सीताको देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरोंका समूह, प्रवीण कोयल, ॥ ५ ॥
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी॥ बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा॥६॥
भावार्थ
कुन्दकली, अनार, बिजली, कमल, शरद्का चन्द्रमा और नागिनी, वरुणका पाश, कामदेवका धनुष, हंस, गज और सिंह—ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं॥ ६ ॥
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं॥ सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू॥७॥
भावार्थ
बेल, सुवर्ण और केला हर्षित हो रहे हैं। इनके मनमें जरा भी शङ्का और संकोच नहीं है। हे जानकी! सुनो, तुम्हारे बिना ये सब आज ऐसे हर्षित हैं, मानो राज पा गये हों। ( अर्थात् तुम्हारे अंगोंके सामने ये सब तुच्छ, अपमानित और लज्जित थे। आज तुम्हें न देखकर ये अपनी शोभाके अभिमानमें फूल रहे हैं )॥ ७॥
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं। प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥ एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहु महा बिरही अति कामी॥८॥
भावार्थ
तुमसे यह अनख ( स्पर्धा ) कैसे सही जाती है? हे प्रिये! तुम शीघ्र ही प्रकट क्यों नहीं होती ? इस प्रकार [ अनन्त ब्रह्माण्डोंके अथवा महामहिमामयी स्वरूपाशक्ति श्रीसीताजीके ] स्वामी श्रीरामजी सीताजीको खोजते हुए [ इस प्रकार ] विलाप करते हैं, मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो॥ ८ ॥
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी॥ आगें परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥९॥
भावार्थ
पूर्णकाम, आनन्दकी राशि, अजन्मा और अविनाशी श्रीरामजी मनुष्योंके-से चरित्र कर रहे हैं। आगे [ जानेपर ] उन्होंने गृध्रपति जटायुको पड़ा देखा। वह श्रीरामजीके चरणोंका स्मरण कर रहा था, जिनमें [ ध्वजा, कुलिश आदिकी ] रेखाएँ ( चिह्न ) हैं॥ ९ ॥
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर। निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर॥३०॥
भावार्थ
कृपासागर श्रीरघुवीरने अपने करकमलसे उसके सिरका स्पर्श किया ( उसके सिरपर कर-कमल फेर दिया )। शोभाधाम श्रीरामजीका [ परम सुन्दर ] मुख देखकर उसकी सब पीड़ा जाती रही॥ ३०॥
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