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युद्धकाण्ड, सर्ग 52

धूम्राक्षं प्रेक्ष्य निर्यान्तं राक्षसं भीमविक्रमम् । विनेदुर्वानराः सर्वे प्रहृष्टा युद्धकाङ्क्षिणः ॥ १ ॥

भावार्थ

भयंकर पराक्रमी निशाचर धूम्राक्षको निकलते देख युद्धकी इच्छा रखनेवाले समस्त वानर हर्ष और उत्साहसे भरकर सिंहनाद करने लगे ॥ १ ॥

तेषां सुतुमुलं युद्धं संजज्ञे कपिरक्षसाम् । अन्योन्यं पादपैर्घोरैर्निघ्नतां शूलमुद्गरैः ॥ २ ॥

भावार्थ

उस समय उन वानरों और राक्षसोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया । वे घोर वृक्षों तथा शूलों और मुद्गरोंसे एक दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ॥ २ ॥

राक्षसैर्वानरा घोरा विनिकृत्ताः समन्ततः । वानरै राक्षसाश्चापि द्रुमैर्भूमिसमीकृताः ॥ ३ ॥

भावार्थ

राक्षसोंने चारों ओरसे घोर वानरोंको काटना आरम्भ किया तथा वानरोंने भी राक्षसोंको वृक्षोंसे मार-मारकर धराशायी कर दिया ॥ ३ ॥

राक्षसास्त्वभिसंक्रुद्धा वानरान् निशितैः शरैः । विव्यधुर्घोरसंकाशैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ॥ ४ ॥

भावार्थ

क्रोधसे भरे हुए राक्षसोंने अपने कङ्कपत्रयुक्त, सीधे जानेवाले, घोर एवं तीखे बाणोंसे वानरोंको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४ ॥

ते गदाभिश्च भीमाभिः पट्टिशैः कूटमुद्गरैः । घोरैश्च परिघैश्चित्रैस्त्रिशूलैश्चापि संश्रितैः ॥ ५ ॥ विदार्यमाणा रक्षोभिर्वानरास्ते महाबलाः । अमर्षजनितोद्धर्षाश्चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ॥ ६ ॥

भावार्थ

राक्षसोंद्वारा भयंकर गदाओं, पट्टिशों, कूट, मुद्गरों, घोर परिघों और हाथमें लिये हुए विचित्र त्रिशूलोंसे विदीर्ण किये जाते हुए वे महाबली वानर अमर्षजनित उत्साहसे निर्भयकी भाँति महान् कर्म करने लगे ॥ ५-६ ॥

शरनिर्भिन्नगात्रास्ते शूलनिर्भिन्नदेहिनः । जगृहुस्ते द्रुमांस्तत्र शिलाश्च हरियूथपाः ॥ ७ ॥

भावार्थ

बाणोंकी चोटसे उनके शरीर छिद गये थे । शूलोंकी मारसे देह विदीर्ण हो गयी थी । इस अवस्थामें उन वानर-यूथपतियोंने हाथोंमें वृक्ष और शिलाएँ उठायीं ॥ ७ ॥

ते भीमवेगा हरयो नर्दमानास्ततस्ततः । ममन्थू राक्षसान् वीरान् नामानि च बभाषिरे ॥ ८ ॥

भावार्थ

उस समय उनका वेग बड़ा भयंकर था । वे जोर-जोरसे गर्जना करते हुए जहाँ-तहाँ वीर राक्षसोंको पटक-पटककर मथने लगे और अपने नामोंकी भी घोषणा करने लगे ॥ ८ ॥

तद् बभूवाद्भुतं घोरं युद्धं वानररक्षसाम् । शिलाभिर्विविधाभिश्च बहुशाखैश्च पादपैः ॥ ९ ॥

भावार्थ

नाना प्रकारकी शिलाओं और बहुत-सी शाखावाले वृक्षोंके प्रहारसे वहाँ वानरों और राक्षसोंमें घोर एवं अद्भुत युद्ध होने लगा ॥ ९ ॥

राक्षसा मथिताः केचिद् वानरैर्जितकाशिभिः । प्रवेमू रुधिरं केचिन्मुखै रुधिरभोजनाः ॥ १० ॥

भावार्थ

विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वानरोंने कितने ही राक्षसोंको मसल डाला । कितने ही रक्तभोजी राक्षस उनकी मार खाकर अपने मुखोंसे रक्त वमन करने लगे ॥ १० ॥

पार्श्वेषु दारिताः केचित् केचिद् राशीकृता द्रुमैः । शिलाभिश्चूर्णिताः केचित् केचिद् दन्तैर्विदारिताः ॥ ११ ॥ ध्वजैर्विमथितैर्भग्नैः खड्गैश्च विनिपातितैः । रथैर्विध्वंसितैः केचिद् व्यथिता रजनीचराः ॥ १२ ॥

भावार्थ

कुछ राक्षसोंकी पसलियाँ फाड़ डाली गयीं । कितने ही वृक्षोंकी चोट खाकर ढेर हो गये, किन्हींका पत्थरोंकी चोटोंसे चूर्ण बन गया और कितने ही दाँतोंसे विदीर्ण कर दिये गये ॥ कितनोंके ध्वज खण्डित करके मसल डाले गये । तलवारें छीनकर नीचे गिरा दी गयीं और रथ चौपट कर दिये गये । इस प्रकार दुर्दशामें पड़कर बहुत-से राक्षस व्यथित हो गये ॥ १२ ॥

गजेन्द्रैः पर्वताकारैः पर्वताग्रैर्वनौकसाम् । मथितैर्वाजिभिः कीर्णं सारोहैर्वसुधातलम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

वानरोंके चलाये हुए पर्वत-शिखरोंसे कुचल डाले गये पर्वताकार गजराजों, घोड़ों और घुड़सवारोंसे वह सारी रणभूमि पट गयी ॥ १३ ॥

वानरैर्भीमविक्रान्तैराप्लुत्योत्प्लुत्य वेगितैः । राक्षसाः करजैस्तीक्ष्णैर्मुखेषु विनिदारिताः ॥ १४ ॥

भावार्थ

भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले वेगशाली वानर उछल-उछलकर अपने पंजोंसे राक्षसोंके मुँह नोच लेते या विदीर्ण कर देते थे ॥ १४ ॥

विषण्णवदना भूयो विप्रकीर्णशिरोरुहाः । मूढाः शोणितगन्धेन निपेतुर्धरणीतले ॥ १५ ॥

भावार्थ

उन राक्षसोंके मुखोंपर विषाद छा जाता । उनके बाल सब ओर बिखर जाते और रक्तकी गन्धसे मूर्च्छित हो पृथ्वीपर पड़ जाते थे ॥ १५ ॥

अन्ये तु परमक्रुद्धा राक्षसा भीमविक्रमाः । तलैरेवाभिधावन्ति वज्रस्पर्शसमैर्हरीन् ॥ १६ ॥

भावार्थ

दूसरे भीषण पराक्रमी राक्षस अत्यन्त क्रुद्ध हो अपने वज्रसदृश कठोर तमाचोंसे मारते हुए वहाँ वानरोंपर धावा करते थे ॥ १६ ॥

वानरैः पातयन्तस्ते वेगिता वेगवत्तरैः । मुष्टिभिश्चरणैर्दन्तैः पादपैश्चावपोथिताः ॥ १७ ॥

भावार्थ

प्रतिपक्षीको वेगपूर्वक गिरानेवाले उन राक्षसोंका बहुत-से अत्यन्त वेगशाली वानरोंने लातों, मुक्कों, दाँतों और वृक्षोंकी मारसे कचूमर निकाल दिया ॥ १७ ॥

सैन्यं तु विद्रुतं दृष्ट्वा धूम्राक्षो राक्षसर्षभः । रोषेण कदनं चक्रे वानराणां युयुत्सताम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

अपनी सेनाको वानरोंद्वारा भगायी गयी देख राक्षसशिरोमणि धूम्राक्षने युद्धकी इच्छासे सामने आये हुए वानरोंका रोषपूर्वक संहार आरम्भ किया ॥ १८ ॥

प्रासैः प्रमथिताः केचिद् वानराः शोणितस्रवाः । मुद्गरैराहताः केचित् पतिता धरणीतले ॥ १९ ॥

भावार्थ

कुछ वानरोंको उसने भालोंसे गाँथ दिया, जिससे वे खूनकी धारा बहाने लगे । कितने ही वानर उसके मुद्गरोंसे आहत होकर धरतीपर लोट गये ॥ १९ ॥

परिघैर्मथिताः केचिद् भिन्दिपालैश्च दारिताः । पट्टिशैर्मथिताः केचिद् विह्वलन्तो गतासवः ॥ २० ॥

भावार्थ

कुछ वानर परिघोंसे कुचल डाले गये । कुछ भिन्दिपालोंसे चीर दिये गये और कुछ पट्टिशोंसे मथे जाकर व्याकुल हो अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे ॥ २० ॥

केचिद् विनिहता भूमौ रुधिरार्द्रा वनौकसः । केचिद् विद्राविता नष्टाः संक्रुद्धै राक्षसैर्युधि ॥ २१ ॥

भावार्थ

कितने ही वानर राक्षसोंद्वारा मारे जाकर खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर सो गये और कितने ही क्रोधभरे राक्षसोंद्वारा युद्धस्थलमें खदेड़े जानेपर कहीं भागकर छिप गये ॥ २१ ॥

विभिन्नहृदयाः केचिदेकपार्श्वेन शायिताः । विदारितास्त्रिशूलैश्च केचिदान्त्रैर्विनिःसृताः ॥ २२ ॥

भावार्थ

कितनोंके हृदय विदीर्ण हो गये । कितने ही एक करवटसे सुला दिये गये तथा कितनोंको त्रिशूलसे विदीर्ण करके धूम्राक्षने उनकी आँतें बाहर निकाल दीं ॥ २२ ॥

तत् सुभीमं महद्युद्धं हरिराक्षससंकुलम् । प्रबभौ शस्त्रबहुलं शिलापादपसंकुलम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

वानरों और राक्षसोंसे भरा हुआ वह महान् युद्ध बड़ा भयानक प्रतीत होता था । उसमें अस्त्र-शस्त्रोंकी बहुलता थी तथा शिलाओं और वृक्षोंकी वर्षासे सारी रणभूमि भर गयी थी ॥ २३ ॥

धनुर्ज्यातन्त्रिमधुरं हिक्कातालसमन्वितम् । मन्दस्तनितगीतं तद् युद्धगान्धर्वमाबभौ ॥ २४ ॥

भावार्थ

वह युद्धरूपी गान्धर्व ( संगीत-महोत्सव ) अद्भुत प्रतीत होता था । धनुषकी प्रत्यञ्चासे जो टंकार-ध्वनि होती थी, वही मानो वीणाका मधुर नाद था, हिचकियाँ तालका काम देती थीं और मन्दस्वरसे घायलोंका जो कराहना होता था वही गीतका स्थान ले रहा था ॥ २४ ॥

धूम्राक्षस्तु धनुष्पाणिर्वानरान् रणमूर्धनि । हसन् विद्रावयामास दिशस्ताञ्छरवृष्टिभिः ॥ २५ ॥

भावार्थ

इस प्रकार धनुष हाथमें लिये धूम्राक्षने युद्धके मुहानेपर बाणोंकी वर्षा करके वानरोंको हँसते-हँसते सम्पूर्ण दिशाओंमें मार भगाया ॥ २५ ॥

धूम्राक्षेणार्दितं सैन्यं व्यथितं प्रेक्ष्य मारुतिः । अभ्यवर्तत संक्रुद्धः प्रगृह्य विपुलां शिलाम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

धूम्राक्षकी मारसे अपनी सेनाको पीड़ित एवं व्यथित हुई देख पवनकुमार हनुमान्जी अत्यन्त कुपित हो उठे और एक विशाल शिला हाथमें ले उसके सामने आये ॥ २६ ॥

क्रोधाद् द्विगुणताम्राक्षः पितुस्तुल्यपराक्रमः । शिलां तां पातयामास धूम्राक्षस्य रथं प्रति ॥ २७ ॥

भावार्थ

उस समय क्रोधके कारण उनके नेत्र दुगुने लाल हो रहे थे । उनका पराक्रम अपने पिता वायुदेवताके ही समान था । उन्होंने धूम्राक्षके रथपर वह विशाल शिला दे मारी ॥ २७ ॥

आपतन्तीं शिलां दृष्ट्वा गदामुद्यम्य सम्भ्रमात् । रथादाप्लुत्य वेगेन वसुधायां व्यतिष्ठत ॥ २८ ॥

भावार्थ

उस शिलाको रथकी ओर आती देख धूम्राक्ष हड़बड़ीमें गदा लिये उठा और वेगपूर्वक रथसे कूदकर पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ २८ ॥

सा प्रमथ्य रथं तस्य निपपात शिला भुवि । सचक्रकूबरं साश्वं सध्वजं सशरासनम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

वह शिला पहिये, कूबर, अश्व, ध्वज और धनुषसहित उसके रथको चूर-चूर करके पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २९ ॥

स भङ्क्त्वा तु रथं तस्य हनूमान् मारुतात्मजः । रक्षसां कदनं चक्रे सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ॥ ३० ॥

भावार्थ

इस प्रकार धूम्राक्षके रथको चौपट करके पवनपुत्र हनुमान्ने छोटी-बड़ी डालियोंसहित वृक्षोंद्वारा राक्षसोंका संहार आरम्भ किया ॥ ३० ॥

विभिन्नशिरसो भूत्वा राक्षसा रुधिरोक्षिताः । द्रुमैः प्रमथिताश्चान्ये निपेतुर्धरणीतले ॥ ३१ ॥

भावार्थ

बहुतेरे राक्षसोंके सिर फूट गये और वे रक्तसे नहा उठे । दूसरे बहुत-से निशाचर वृक्षोंकी मारसे कुचले जाकर धरतीपर लोट गये ॥ ३१ ॥

विद्राव्य राक्षसं सैन्यं हनूमान् मारुतात्मजः । गिरेः शिखरमादाय धूम्राक्षमभिदुद्रुवे ॥ ३२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार राक्षससेनाको खदेड़कर पवनकुमार हनुमान्ने एक पर्वतका शिखर उठा लिया और धूम्राक्षपर धावा किया ॥ ३२ ॥

तमापतन्तं धूम्राक्षो गदामुद्यम्य वीर्यवान् । विनर्दमानः सहसा हनूमन्तमभिद्रवत् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उन्हें आते देख पराक्रमी धूम्राक्षने भी गदा उठा ली और गर्जना करता हुआ वह सहसा हनुमान्जीकी ओर दौड़ा ॥ ३३ ॥

तस्य क्रुद्धस्य रोषेण गदां तां बहुकण्टकाम् । पातयामास धूम्राक्षो मस्तकेऽथ हनूमतः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

धूम्राक्षने कुपित हुए हनुमान्जीके मस्तकपर बहुसंख्यक काँटोंसे भरी हुई वह गदा दे मारी ॥ ३४ ॥

ताडितः स तया तत्र गदया भीमवेगया । स कपिर्मारुतबलस्तं प्रहारमचिन्तयन् ॥ ३५ ॥ धूम्राक्षस्य शिरोमध्ये गिरिशृङ्गमपातयत् ।

भावार्थ

भयानक वेगवाली उस गदाकी चोट खाकर भी वायुके समान बलशाली कपिवर हनुमान्ने वहाँ इस प्रहारको कुछ भी नहीं गिना और धूम्राक्षके मस्तकपर वह पर्वतशिखर चला दिया ॥ ३५½ ॥

स विस्फारितसर्वाङ्गो गिरिशृङ्गेण ताडितः ॥ ३६ ॥ पपात सहसा भूमौ विकीर्ण इव पर्वतः ।

भावार्थ

पर्वतशिखरकी गहरी चोट खाकर धूम्राक्षके सारे अङ्ग छिन्न-भिन्न हो गये और वह बिखरे हुए पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३६½ ॥

धूम्राक्षं निहतं दृष्ट्वा हतशेषा निशाचराः । त्रस्ताः प्रविविशुर्लङ्कां वध्यमानाः प्लवंगमैः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

धूम्राक्षको मारा गया देख मरनेसे बचे हुए निशाचर भयभीत हो वानरोंकी मार खाते हुए लङ्कामें घुस गये ॥३७॥

स तु पवनसुतो निहत्य शत्रून् क्षतजवहाः सरितश्च संविकीर्य । रिपुवधजनितश्रमो महात्मा मुदमगमत् कपिभिः सुपूज्यमानः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

इस प्रकार शत्रुओंको मारकर और रक्तकी धारा बहानेवाली बहुत-सी नदियोंको प्रवाहित करके महात्मा पवनकुमार हनुमान् यद्यपि शत्रुवधजनित परिश्रमसे थक गये थे, तथापि वानरोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित होनेसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३८ ॥

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