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युद्धकाण्ड, सर्ग 51

तेषां तु तुमुलं शब्दं वानराणां महौजसाम् । नर्दतां राक्षसैः सार्धं तदा शुश्राव रावणः ॥ १ ॥

भावार्थ

उस समय भीषण गर्जना करते हुए महाबली वानरोंका वह तुमुलनाद राक्षसोंसहित रावणने सुना ॥ १ ॥

स्निग्धगम्भीरनिर्घोषं श्रुत्वा तं निनदं भृशम् । सचिवानां ततस्तेषां मध्ये वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥

भावार्थ

मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए रावणने जब वह स्निग्ध गम्भीर घोष, वह उच्चस्वरसे किया हुआ सिंहनाद सुना, तब वह इस प्रकार बोला—॥ २ ॥

यथासौ सम्प्रहृष्टानां वानराणामुपस्थितः । बहूनां सुमहान् नादो मेघानामिव गर्जताम् ॥ ३ ॥ सुव्यक्तं महती प्रीतिरेतेषां नात्र संशयः । तथाहि विपुलैर्नादैश्चुक्षुभे लवणार्णवः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘इस समय गर्जते हुए मेघोंके समान जो अधिक हर्षमें भरे हुए बहुसंख्यक वानरोंका यह महान् कोलाहल प्रकट हो रहा है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि इन सबको बड़ा भारी हर्ष प्राप्त हुआ है; इसमें संशय नहीं है । तभी इस तरह बारंबार की गयी गर्जनाओंसे यह खारे पानीका समुद्र विक्षुब्ध हो उठा है ॥ ३-४ ॥

तौ तु बद्धौ शरैस्तीक्ष्णैर्भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । अयं च सुमहान् नादः शङ्कां जनयतीव मे ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘परंतु वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण तो तीखे बाणोंसे बँधे हुए हैं । इधर यह महान् हर्षनाद भी हो रहा है, जो मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है’ ॥ ५ ॥

एवं च वचनं चोक्त्वा मन्त्रिणो राक्षसेश्वरः । उवाच नैर्ऋतांस्तत्र समीपपरिवर्तिनः ॥ ६ ॥

भावार्थ

मन्त्रियोंसे ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने अपने पास ही खड़े हुए राक्षसोंसे कहा—॥ ६ ॥

ज्ञायतां तूर्णमेतेषां सर्वेषां च वनौकसाम् । शोककाले समुत्पन्ने हर्षकारणमुत्थितम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘तुमलोग शीघ्र ही जाकर इस बातका पता लगाओ कि शोकका अवसर उपस्थित होनेपर भी इन सब वानरोंके हर्षका कौन-सा कारण प्रकट हो गया है’ ॥ ७ ॥

तथोक्तास्ते सुसम्भ्रान्ताः प्राकारमधिरुह्य च । ददृशुः पालितां सेनां सुग्रीवेण महात्मना ॥ ८ ॥

भावार्थ

रावणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे राक्षस घबराये हुए गये और परकोटेपर चढ़कर महात्मा सुग्रीवके द्वारा पालित वानरसेनाकी ओर देखने लगे ॥ ८ ॥

तौ च मुक्तौ सुघोरेण शरबन्धेन राघवौ । समुत्थितौ महाभागौ विषेदुः सर्वराक्षसाः ॥ ९ ॥

भावार्थ

जब उन्हें मालूम हुआ कि महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण उस अत्यन्त भयंकर नागरूपी बाणोंके बन्धनसे मुक्त होकर उठ गये हैं, तब समस्त राक्षसोंको बड़ा दुःख हुआ ॥ ९ ॥

संत्रस्तहृदयाः सर्वे प्राकारादवरुह्य ते । विवर्णा राक्षसा घोरा राक्षसेन्द्रमुपस्थिताः ॥ १० ॥

भावार्थ

उनका हृदय भयसे थर्रा उठा । वे सब भयानक राक्षस परकोटेसे उतरकर उदास हो राक्षसराज रावणकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ १० ॥

तद्प्रियं दीनमुखा रावणस्य च राक्षसाः । कृत्स्नं निवेदयामासुर्यथावद् वाक्यकोविदाः ॥ ११ ॥

भावार्थ

वे बातचीतकी कलामें कुशल थे । उनके मुखपर दीनता छा रही थी । उन निशाचरोंने वह सारा अप्रिय समाचार रावणको यथावत् रूपसे बताया ॥ ११ ॥

यौ ताविन्द्रजिता युद्धे भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । निबद्धौ शरबन्धेन निष्प्रकम्पभुजौ कृतौ ॥ १२ ॥ विमुक्तौ शरबन्धेन दृश्येते तौ रणाजिरे । पाशानिव गजौ छित्त्वा गजेन्द्रसमविक्रमौ ॥ १३ ॥

भावार्थ

( वे बोले— ) ‘महाराज ! कुमार इन्द्रजित्ने जिन राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको युद्धस्थलमें नागरूपी बाणोंके बन्धनसे बाँधकर हाथ हिलानेमें भी असमर्थ कर दिया था; वे गजराजके समान पराक्रमी दोनों वीर जैसे हाथी रस्सेको तोड़कर स्वतन्त्र हो जायँ, उसी तरह बाणबन्धनसे मुक्त हो समराङ्गणमें खड़े दिखायी देते हैं’ ॥ १२-१३ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां राक्षसेन्द्रो महाबलः । चिन्ताशोकसमाक्रान्तो विवर्णवदनोऽभवत् ॥ १४ ॥

भावार्थ

उनका वह वचन सुनकर महाबली राक्षसराज रावण चिन्ता तथा शोकके वशीभूत हो गया और उसका चेहरा उतर गया ॥ १४ ॥

घोरैर्दत्तवरैर्बद्धौ शरैराशीविषोपमैः । अमोघैः सूर्यसंकाशैः प्रमथ्येन्द्रजिता युधि ॥ १५ ॥ तदस्त्रबन्धमासाद्य यदि मुक्तौ रिपू मम । संशयस्थमिदं सर्वमनुपश्याम्यहं बलम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

( वह मन-ही-मन सोचने लगा— ) ‘जो विषधर सर्पोंके समान भयंकर, वरदानमें प्राप्त हुए और अमोघ थे तथा जिनका तेज सूर्यके समान था, उन्हींके द्वारा युद्धस्थलमें इन्द्रजित्ने जिन्हें बाँध दिया था, वे मेरे दोनों शत्रु यदि उस अस्त्रबन्धनमें पड़कर भी उससे छूट गये, तब तो अब मैं अपनी सारी सेनाको संशयापन्न ही देखता हूँ ॥१५-१६॥

निष्फलाः खलु संवृत्ताः शराः पावकतेजसः । आदत्तं यैस्तु संग्रामे रिपूणां जीवितं मम ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘जिन्होंने पहले युद्धस्थलमें मेरे शत्रुओंके प्राण ले लिये थे, वे अग्नितुल्य तेजस्वी बाण निश्चय ही आज निष्फल हो गये’ ॥ १७ ॥

एवमुक्त्वा तु संक्रुद्धो निःश्वसन्नुरगो यथा । अब्रवीद् रक्षसां मध्ये धूम्राक्षं नाम राक्षसम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुआ रावण फुफकारते हुए सर्पके समान जोर-जोरसे साँस लेने लगा और राक्षसोंके बीचमें धूम्राक्ष नामक निशाचरसे बोला—॥ १८ ॥

बलेन महता युक्तो रक्षसां भीमविक्रम । त्वं वधायाशु निर्याहि रामस्य सह वानरैः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘भयानक पराक्रमी वीर ! तुम राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर वानरोंसहित रामका वध करनेके लिये शीघ्र जाओ’ ॥ १९ ॥

एवमुक्तस्तु धूम्राक्षो राक्षसेन्द्रेण धीमता । परिक्रम्य ततः शीघ्रं निर्जगाम नृपालयात् ॥ २० ॥

भावार्थ

बुद्धिमान् राक्षसराजके इस प्रकार आज्ञा देनेपर धूम्राक्षने उसकी परिक्रमा की तथा वह तुरंत राजभवनसे बाहर निकल गया ॥ २० ॥

अभिनिष्क्रम्य तद् द्वारं बलाध्यक्षमुवाच ह । त्वरयस्व बलं शीघ्रं किं चिरेण युयुत्सतः ॥ २१ ॥

भावार्थ

रावणके गृहद्वारपर पहुँचकर उसने सेनापतिसे कहा— ‘सेनाको उतावलीके साथ शीघ्र तैयार करो । युद्धकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको विलम्ब करनेसे क्या लाभ ?’ ॥ २१ ॥

धूम्राक्षवचनं श्रुत्वा बलाध्यक्षो बलानुगः । बलमुद्योजयामास रावणस्याज्ञया भृशम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

धूम्राक्षकी बात सुनकर रावणकी आज्ञाके अनुसार सेनापतिने जिनके पीछे बहुत बड़ी सेना थी, भारी संख्यामें सैनिकोंको तैयार कर दिया ॥ २२ ॥

ते बद्धघण्टा बलिनो घोररूपा निशाचराः । विनद्यमानाः संहृष्टा धूम्राक्षं पर्यवारयन् ॥ २३ ॥ विविधायुधहस्ताश्च शूलमुद्गरपाणयः । गदाभिः पट्टिशैर्दण्डैरायसैर्मुसलैरपि ॥ २४ ॥ परिघैर्भिन्दिपालैश्च भल्लैः पाशैः परश्वधैः । निर्ययू राक्षसा घोरा नर्दन्तो जलदा यथा ॥ २५ ॥

भावार्थ

वे भयानक रूपधारी बलवान् निशाचर प्रास और शक्ति आदि अस्त्रोंमें घण्टे बाँधकर हर्ष और उत्साहसे युक्त हो जोर-जोरसे गर्जते हुए आये और धूम्राक्षको घेरकर खड़े हो गये ॥ उनके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे । कुछ लोगोंने अपने हाथोंमें शूल और मुद्गर ले रक्खे थे । गदा, पट्टिश, लोहदण्ड, मूसल, परिघ, भिन्दिपाल, भाले, पाश और फरसे लिये बहुतेरे भयानक राक्षस युद्धके लिये निकले । वे सभी मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करते थे ॥ २४-२५ ॥

रथैः कवचिनस्त्वन्ये ध्वजैश्च समलंकृतैः । सुवर्णजालविहितैः खरैश्च विविधाननैः ॥ २६ ॥ हयैः परमशीघ्रैश्च गजैश्चैव मदोत्कटैः । निर्ययुर्नैर्ऋतव्याघ्रा व्याघ्रा इव दुरासदाः ॥ २७ ॥

भावार्थ

कितने ही निशाचर ध्वजोंसे अलंकृत तथा सोनेकी जालीसे आच्छादित रथोंद्वारा युद्धके लिये बाहर आये । वे सब-के-सब कवच धारण किये हुए थे । कितने ही श्रेष्ठ राक्षस नाना प्रकारके मुखवाले गधों, परम शीघ्रगामी घोड़ों तथा मदमत्त हाथियोंपर सवार हो दुर्जय व्याघ्रोंके समान युद्धके लिये नगरसे बाहर निकले ॥ २६-२७ ॥

वृकसिंहमुखैर्युक्तं खरैः कनकभूषितैः । आरुरोह रथं दिव्यं धूम्राक्षः खरनिःस्वनः ॥ २८ ॥

भावार्थ

धूम्राक्षके रथमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित ऐसे गधे नधे हुए थे जिनके मुँह भेड़ियों और सिंहोंके समान थे । गधेकी भाँति रेंकनेवाला धूम्राक्ष उस दिव्य रथपर सवार हुआ ॥ २८ ॥

स निर्यातो महावीर्यो धूम्राक्षो राक्षसैर्वृतः । हसन् वै पश्चिमद्वाराद्धनूमान् यत्र तिष्ठति ॥ २९ ॥

भावार्थ

इस प्रकार बहुत-से राक्षसोंके साथ महापराक्रमी धूम्राक्ष हँसता हुआ पश्चिम द्वारसे, जहाँ हनुमान्जी शत्रुका सामना करनेके लिये खड़े थे, युद्धके लिये निकला ॥ २९ ॥

रथप्रवरमास्थाय खरयुक्तं खरस्वनम् । प्रयान्तं तु महाघोरं राक्षसं भीमदर्शनम् ॥ ३० ॥ अन्तरिक्षगताः क्रूराः शकुनाः प्रत्यषेधयन् ।

भावार्थ

गदहोंसे जुते और गदहोंकी-सी आवाज करनेवाले उस श्रेष्ठ रथपर बैठकर युद्धके लिये जाते हुए महाघोर राक्षस धूम्राक्षको, जो बड़ा भयानक दिखायी देता था,आकाशचारी क्रूर पक्षियोंने अशुभसूचक बोली बोलकर आगे बढ़नेसे मना किया ॥ ३०½ ॥

रथशीर्षे महाभीमो गृध्रश्च निपपात ह ॥ ३१ ॥ ध्वजाग्रे ग्रथिताश्चैव निपेतुः कुणपाशनाः । रुधिरार्द्रो महाञ्श्वेतः कबन्धः पतितो भुवि ॥ ३२ ॥ विस्वरं चोत्सृजन्नादान् धूम्राक्षस्य निपातितः । ववर्ष रुधिरं देवः संचचाल च मेदिनी ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उसके रथके ऊपरी भागपर एक महाभयानक गीध आ गिरा । ध्वजके अग्रभागपर बहुत-से मुर्दाखोर पक्षी परस्पर गुँथे हुए-से गिर पड़े । उसी समय एक बहुत बड़ा श्वेत कबन्ध ( धड़ ) खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर गिरा ॥ वह कबन्ध बड़े जोर-जोरसे चीत्कार करता हुआ धूम्राक्षके पास ही गिरा था । बादल रक्तकी वर्षा करने लगे और पृथ्वी डोलने लगी ॥ ३३ ॥

प्रतिलोमं ववौ वायुर्निर्घातसमनिःस्वनः । तिमिरौघावृतास्तत्र दिशश्च न चकाशिरे ॥ ३४ ॥

भावार्थ

वायु प्रतिकूल दिशाकी ओरसे बहने लगी । उसमें वज्रपातके समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी । सम्पूर्ण दिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो जानेके कारण प्रकाशित नहीं होती थीं ॥ ३४ ॥

स तूत्पातांस्ततो दृष्ट्वा राक्षसानां भयावहान् । प्रादुर्भूतान् सुघोरांश्च धूम्राक्षो व्यथितोऽभवत् । मुमुहुः राक्षसाः सर्वे धूम्राक्षस्य पुरःसराः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

राक्षसोंके लिये भय देनेवाले वहाँ प्रकट हुए उन भयंकर उत्पातोंको देखकर धूम्राक्ष व्यथित हो उठा और उसके आगे चलनेवाले सभी राक्षस अचेत-से हो गये ॥ ३५ ॥

ततः सुभीमो बहुभिर्निशाचरै- र्वृतोऽभिनिष्क्रम्य रणोत्सुको बली । ददर्श तां राघवबाहुपालितां महौघकल्पां बहु वानरीं चमूम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

इस प्रकार बहुसंख्यक निशाचरोंसे घिरे हुए और युद्धके लिये उत्सुक रहनेवाले महाभयंकर बलवान् राक्षस धूम्राक्षने नगरसे बाहर निकलकर श्रीरामचन्द्रजीके बाहुबलसे सुरक्षित एवं प्रलयकालिक समुद्रके समान विशाल वानरी सेनाको देखा ॥ ३६ ॥

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