युद्धकाण्ड, सर्ग 49
घोरेण शरबन्धेन बद्धौ दशरथात्मजौ । निःश्वसन्तौ यथा नागौ शयानौ रुधिरोक्षितौ ॥ १ ॥
भावार्थ
दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण भयंकर सर्पाकार बाणके बन्धनमें बँधे हुए-से पड़े थे । वे लहूलुहान हो रहे थे और फुफकारते हुए सर्पोंके समान साँस ले रहे थे ॥ १ ॥
सर्वे ते वानरश्रेष्ठाः ससुग्रीवमहाबलाः । परिवार्य महात्मानौ तस्थुः शोकपरिप्लुताः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘उन दोनों महात्माओंको चारों ओरसे घेरकर सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ महाबली वानर शोकमें डूबे खड़े थे ॥ २ ॥
एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रत्यबुध्यत वीर्यवान् । स्थिरत्वात् सत्त्वयोगाच्च शरैः संदानितोऽपि सन् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘इसी बीचमें पराक्रमी श्रीराम नागपाशसे बँधे होनेपर भी अपने शरीरकी दृढ़ता और शक्तिमत्ताके कारण मूर्छासे जाग उठे ॥ ३ ॥
ततो दृष्ट्वा सरुधिरं निषण्णं गाढमर्पितम् । भ्रातरं दीनवदनं पर्यदेवयदातुरः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने देखा कि भाई लक्ष्मण बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर खूनसे लथपथ हुए पड़े हैं और उनका चेहरा बहुत उतर गया है; अतः वे आतुर होकर विलाप करने लगे—॥४॥
किं नु मे सीतया कार्यं लब्धया जीवितेन वा । शयानं योऽद्य पश्यामि भ्रातरं युधि निर्जितम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘हाय ! यदि मुझे सीता मिल भी गयीं तो मैं उन्हें लेकर क्या करूँगा ? अथवा इस जीवनको ही रखकर क्या करना है ? जब कि आज मैं अपने पराजित हुए भाईको युद्धस्थलमें पड़ा हुआ देख रहा हूँ ॥ ५ ॥
शक्या सीतासमा नारी मर्त्यलोके विचिन्वता । न लक्ष्मणसमो भ्राता सचिवः साम्परायिकः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘मर्त्यलोकमें ढूँढ़नेपर मुझे सीता-जैसी दूसरी स्त्री मिल सकती है; परंतु लक्ष्मणके समान सहायक और युद्धकुशल भाई नहीं मिल सकता ॥ ६ ॥
परित्यक्ष्याम्यहं प्राणान् वानराणां तु पश्यताम् । यदि पञ्चत्वमापन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘सुमित्राके आनन्दको बढ़ानेवाले लक्ष्मण यदि जीवित न रहे तो मैं वानरोंके देखते-देखते अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा ॥ ७ ॥
किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां मातरं किं नु कैकयीम् । कथमम्बां सुमित्रां च पुत्रदर्शनलालसाम् ॥ ८ ॥ विवत्सां वेपमानां च वेपन्तीं कुररीमिव । कथमाश्वासयिष्यामि यदि यास्यामि तं विना ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मणके बिना यदि मैं अयोध्याको लौटूँ तो माता कौसल्या और कैकेयीको क्या जवाब दूँगा तथा अपने पुत्रको देखनेके लिये उत्सुक हो बछड़ेसे बिछुड़ी गायके समान काँपती और कुररीकी भाँति रोती-बिलखती माता सुमित्रासे क्या कहूँगा ? उन्हें किस तरह धैर्य बँधाऊँगा ? ॥ ८-९ ॥
कथं वक्ष्यामि शत्रुघ्नं भरतं च यशस्विनम् । मया सह वनं यातो विना तेनाहमागतः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मैं यशस्वी भरत और शत्रुघ्नसे किस तरह यह कह सकूँगा कि लक्ष्मण मेरे साथ वनको गये थे; किंतु मैं उन्हें वहीं खोकर उनके बिना ही लौट आया हूँ ॥ १० ॥
उपालम्भं न शक्ष्यामि सोढुमम्बासुमित्रया । इहैव देहं त्यक्ष्यामि नहि जीवितुमुत्सहे ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘दोनों माताओंसहित सुमित्राका उपालम्भ मैं नहीं सह सकूँगा; अतः यहीं इस देहको त्याग दूँगा । अब मुझमें जीवित रहनेका उत्साह नहीं है ॥ ११ ॥
धिग्घां दुष्कृतकर्माणमनार्यं यत्कृते ह्यसौ । लक्ष्मणः पतितः शेते शरतल्पे गतासुवत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘मुझ-जैसे दुष्कर्मी और अनार्यको धिक्कार है, जिसके कारण लक्ष्मण मरे हुएके समान बाण-शय्यापर सो रहे हैं ॥ १२ ॥
त्वं नित्यं सुविषण्णं मामाश्वासयसि लक्ष्मण । गतासुर्नाद्य शक्तोऽसि मामार्तमभिभाषितुम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! जब मैं अत्यन्त विषादमें डूब जाता था, उस समय तुम्हीं सदा मुझे आश्वासन देते थे; परंतु आज तुम्हारे प्राण नहीं रहे, इसलिये आज तुम मुझ दुखियासे बात करने-में भी असमर्थ हो ॥ १३ ॥
येनाद्य बहवो युद्धे निहता राक्षसाः क्षितौ । तस्यामेवाद्य शूरस्त्वं शेषे विनिहतः शरैः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘भैया ! जिस रणभूमिमें आज तुमने बहुत-से राक्षसोंको मार गिराया था, उसीमें शूरवीर होकर भी तुम बाणोंद्वारा मारे जाकर सो रहे हो ॥ १४ ॥
शयानः शरतल्पेऽस्मिन् सशोणितपरिस्रुतः । शरभूतस्ततो भासि भास्करोऽस्तमिव व्रजन् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘इस बाण-शय्यापर तुम खूनसे लथपथ होकर पड़े हो और बाणोंसे व्याप्त होकर अस्ताचलको जाते हुए सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे हो ॥ १५ ॥
बाणाभिहतमर्मत्वान्न शक्तोषीह भाषितुम् । रुजा चाब्रुवतो यस्य दृष्टिरागेण सूच्यते ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘बाणोंसे तुम्हारा मर्मस्थल विदीर्ण हो गया, इसलिये तुम यहाँ बात भी नहीं कर सकते । यद्यपि तुम बोल नहीं रहे हो, तथापि तुम्हारे नेत्रोंकी लालीसे तुम्हारी मार्मिक पीड़ा सूचित हो रही है ॥ १६ ॥
यथैव मां वनं यान्तमनुयातो महाद्युतिः । अहमप्यनुयास्यामि तथैवैनं यमक्षयम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जिस तरह वनकी यात्रा करते समय महातेजस्वी लक्ष्मण मेरे पीछे-पीछे चले आये थे, उसी प्रकार मैं भी यमलोकमें इनका अनुसरण करूँगा ॥ १७ ॥
इष्टबन्धुजनो नित्यं मां च नित्यमनुव्रतः । इमामद्य गतोऽवस्थां ममानार्यस्य दुर्नयैः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘जो मेरे प्रिय बन्धुजन थे और सदा मुझमें अनुराग एवं भक्तिभाव रखते थे, वे ही लक्ष्मण आज मुझ अनार्यकी दुर्नीतियोंके कारण इस अवस्थाको पहुँच गये ॥ १८ ॥
सुरुष्टेनापि वीरेण लक्ष्मणेन न संसरे । परुषं विप्रियं चापि श्रावितं तु कदाचन ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘मुझे ऐसा कोई प्रसंग याद नहीं आता, जब कि वीर लक्ष्मणने अत्यन्त कुपित होनेपर भी मुझे कभी कोई कठोर या अप्रिय बात सुनायी हो ॥ १९ ॥
विसमर्जैकवेगेन पञ्च बाणशतानि यः । इष्वस्त्रेष्वधिकस्तस्मात् कार्तवीर्याच्च लक्ष्मणः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण एक ही वेगसे पाँच सौ बाणोंकी वर्षा करते थे; इसलिये धनुर्विद्यामें कार्तवीर्य अर्जुनसे भी बढ़कर थे ॥ २० ॥
अस्त्रैरस्त्राणि यो हन्याच्छक्रस्यापि महात्मनः । सोऽयमुर्व्यां हतः शेते महार्हशयनोचितः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘जो अपने अस्त्रोंद्वारा महात्मा इन्द्रके भी अस्त्रोंको काट सकते थे, वे ही बहुमूल्य शय्यापर सोने योग्य लक्ष्मण आज स्वयं मारे जाकर पृथ्वीपर सो रहे हैं ॥ २१ ॥
तत्तु मिथ्या प्रलप्तं मां प्रधक्ष्यति न संशयः । यन्मया न कृतो राजा राक्षसानां विभीषणः ॥ २२ ॥ अस्मिन् मुहूर्ते सुग्रीव प्रतियातुमितोऽर्हसि । मत्वा हीनं मया राजन् रावणोऽभिभविष्यति ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘मैं विभीषणको राक्षसोंका राजा न बना सका; अतः मेरा वह झूठा प्रलाप मुझे सदा जलाता रहेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ‘वानरराज सुग्रीव ! तुम इसी मुहूर्तमें यहाँसे लौट जाओ; क्योंकि मेरे बिना तुम्हें असहाय समझकर रावण तुम्हारा तिरस्कार करेगा ॥ २३ ॥
अङ्गदं तु पुरस्कृत्य ससैन्यं सपरिच्छदम् । सागरं तर सुग्रीव नीलेन च नलेन च ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘मित्र सुग्रीव ! सेना और सामग्रियोंसहित अङ्गदको आगे करके नल और नीलके साथ तुम समुद्रके पार चले जाओ ॥ २४ ॥
कृतं हि सुमहत्कर्म यदन्यैर्दुष्करं रणे । ऋक्षराजेन तुष्यामि गोलाङ्गूलाधिपेन च ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘मैं लंगूरोंके स्वामी गवाक्ष तथा ऋक्षराज जाम्बवान्से भी बहुत संतुष्ट हूँ । तुम सब लोगोंने युद्धमें वह महान् पुरुषार्थ कर दिखाया है, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुष्कर था ॥ २५ ॥
अङ्गदेन कृतं कर्म मैन्देन द्विविदेन च । युद्धं केसरिणा संख्ये घोरं सम्पातिना कृतम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘अङ्गद, मैन्द और द्विविदने भी महान् पराक्रम प्रकट किया है । केसरी और सम्पातिने भी समराङ्गणमें घोर युद्ध किया है ॥ २६ ॥
गवयेन गवाक्षेण शरभेण गजेन च । अन्यैश्च हरिभिर्युद्धं मदर्थे त्यक्तजीवितैः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘गवय, गवाक्ष, शरभ, गज तथा अन्य वानरोंने भी मेरे लिये प्राणोंका मोह छोड़कर संग्राम किया है ॥ २७ ॥
न चातिक्रमितुं शक्यं दैवं सुग्रीव मानुषैः । यत्तु शक्यं वयस्येन सुहृदा वा परं मम ॥ २८ ॥ कृतं सुग्रीव तत् सर्वं भवता धर्मभीरुणा । मित्रकार्यं कृतमिदं भवद्भिर्वानरर्षभाः ॥ २९ ॥ अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं गन्तुमर्हथ ।
भावार्थ
‘किंतु सुग्रीव ! मनुष्योंके लिये दैवके विधानको लाँघना असम्भव है । मेरे परम मित्र अथवा उत्तम सुहृद्के नाते तुम-जैसे धर्मभीरु पुरुषके द्वारा जो कुछ किया जा सकता था, वह सब तुमने किया है । वानरशिरोमणियो ! तुम सबने मिलकर मित्रके इस कार्यको सम्पन्न किया है । अब मैं आज्ञा देता हूँ—तुम सब जहाँ इच्छा हो, वहाँ चले जाओ’ ॥२८-२९½॥
शुश्रुवुस्तस्य ये सर्वे वानराः परिदेवितम् ॥ ३० ॥ वर्तयांचक्रिरेऽश्रूणि नेत्रैः कृष्णेतरेक्षणाः ॥ ३१ ॥ ततः सर्वाण्यनीकानि स्थापयित्वा विभीषणः । आजगाम गदापाणिस्त्वरितं यत्र राघवः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
भगवान् श्रीरामका यह विलाप भूरी आँखोंवाले जिन-जिन वानरोंने सुना, वे सब अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ तदनन्तर समस्त सेनाओंको स्थिरतापूर्वक स्थापित करके विभीषण हाथमें गदा लिये तुरंत उस स्थानपर लौट आये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजी विद्यमान थे ॥ ३२ ॥
तं दृष्ट्वा त्वरितं यान्तं नीलाञ्जनचयोपमम् । वानरा दुद्रुवुः सर्वे मन्यमानास्तु रावणिम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
काले कोयलोंकी राशिके समान कृष्ण कान्तिवाले विभीषणको शीघ्रतापूर्वक आते देख सब वानर उन्हें रावणपुत्र इन्द्रजित् समझकर इधर-उधर भागने लगे ॥ ३३ ॥
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