युद्धकाण्ड, सर्ग 48
भर्तारं निहतं दृष्ट्वा लक्ष्मणं च महाबलम् । विललाप भृशं सीता करुणं शोककर्शिता ॥ १ ॥
भावार्थ
अपने स्वामी श्रीरामको तथा महाबली लक्ष्मणको भी मारा गया देख शोकसे पीड़ित हुई सीता बारंबार करुणाजनक विलाप करने लगीं—॥ १ ॥
ऊचुर्लक्षणिका ये मां पुत्रिण्यविधवेति च । तेऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोऽनृतवादिनः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘सामुद्रिक लक्षणोंके ज्ञाता विद्वानोंने मुझे पुत्रवती और सधवा बताया था। आज श्रीरामके मारे जानेसे वे सब लक्षण-ज्ञानी पुरुष असत्यवादी हो गये ॥ २ ॥
यज्वनो महिषीं ये मामूचुः पत्नीं च सत्रिणः । तेऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोऽनृतवादिनः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘जिन्होंने मुझे यज्ञपरायण तथा विविध सत्रोंका संचालन करनेवाले राजाधिराजकी पत्नी बताया था, आज श्रीरामके मारे जानेसे वे सभी लक्षणवेत्ता पुरुष झूठे हो गये ॥ ३ ॥
वीरपार्थिवपत्नीनां ये विदुर्भर्तृपूजिताम् । तेऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोऽनृतवादिनः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जिन लोगोंने लक्षणोंद्वारा मुझे वीर राजाओंकी पत्नियोंमें पूजनीय और पतिके द्वारा सम्मानित समझा था; आज श्रीरामके न रहनेसे वे सभी लक्षणज्ञ पुरुष मिथ्यावादी हो गये ॥ ४ ॥
ऊचुः संश्रवणे ये मां द्विजाः कार्तान्तिकाः शुभाम् । तेऽद्य सर्वे हते रामे ज्ञानिनोऽनृतवादिनः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘ज्योतिषशास्त्रके सिद्धान्तको जाननेवाले जिन ब्राह्मणोंने मेरे सामने ही मुझे नित्य मङ्गलमयी कहा था, वे सभी लक्षणवेत्ता पुरुष आज श्रीरामके मारे जानेपर असत्यवादी सिद्ध हो गये ॥ ५ ॥
इमानि खलु पद्मानि पादयोर्वै कुलस्त्रियः । आधिराज्येऽभिषिच्यन्ते नरेन्द्रैः पतिभिः सह ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘जिन लक्षणभूत कमलोंके हाथ-पैर आदिमें होनेपर कुलवती स्त्रियाँ अपने पति राजाधिराजके साथ सम्राज्ञीके पदपर अभिषिक्त होती हैं, वे मेरे दोनों पैरोंमें निश्चित रूपसे विद्यमान हैं ॥ ६ ॥
वैधव्यं यान्ति यैर्नार्योऽलक्षणैर्भाग्यदुर्लभाः । नात्मनस्तानि पश्यामि पश्यन्ती हतलक्षणा ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जिन अशुभ लक्षणोंके कारण सौभाग्य दुर्लभ होता है और स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं, मैं बहुत देखनेपर भी अपने अङ्गोंमें ऐसे लक्षणोंको नहीं देख पाती, तथापि मेरे सारे शुभ लक्षण निष्फल हो गये ॥ ७ ॥
सत्यनामानि पद्मानि स्त्रीणामुक्तानि लक्षणैः । तान्यद्य निहते रामे वितथानि भवन्ति मे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘स्त्रियोंके हाथ-पैरोंमें जो कमलके चिह्न होते हैं, उन्हें लक्षणवेत्ता विद्वानोंने अमोघ बताया है; किंतु आज श्रीरामके मारे जानेसे वे सारे शुभ लक्षण मेरे लिये व्यर्थ हो गये ॥ ८ ॥
केशाः सूक्ष्माः समा नीला भ्रुवौ चासंहते मम । वृत्ते चारोमके जङ्घे दन्ताश्चाविरला मम ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘मेरे सिरके बाल महीन, बराबर और काले हैं। भौंहें परस्पर जुड़ी हुई नहीं हैं। मेरी पिंडलियाँ ( घुटनोंसे नीचेके भाग ) गोल-गोल तथा रोमरहित हैं तथा मेरे दाँत भी परस्पर सटे हुए हैं ॥ ९ ॥
शङ्खे नेत्रे करौ पादौ गुल्फावूरू समौ चितौ । अनुवृत्तनखाः स्निग्धाः समाश्चाङ्गुलयो मम ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मेरे नेत्रोंके आसपासके भाग, दोनों नेत्र, दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों गुल्फ ( तखने ) और जाँघें बराबर, विशाल एवं मांसल ( पुष्ट ) हैं। दोनों हाथोंकी अँगुलियाँ बराबर एवं चिकनी हैं और उनके नख गोल एवं उतार-चढ़ाववाले हैं ॥ १० ॥
स्तनौ चाविरलौ पीनौ मामकौ मग्नचूचुकौ । मग्ना चोत्सेधनी नाभिः पार्श्वोरस्कं च मे चितम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘मेरे दोनों स्तन परस्पर सटे हुए और स्थूल हैं। इनके अग्रभाग भीतरकी ओर दबे हुए हैं। मेरी नाभि गहरी और उसके आसपासके भाग ऊँचे हैं। मेरे पार्श्वभाग तथा छाती मांसल हैं ॥ ११ ॥
मम वर्णो मणिनिभो मृदून्यङ्गरुहाणि च। प्रतिष्ठितां द्वादशभिर्मामूचुः शुभलक्षणाम् ॥ १२ ॥ समग्रयवमच्छिद्रं पाणिपादं च वर्णवत्। मन्दस्मितेत्येव च मां कन्यालाक्षणिका विदुः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘मेरी अङ्गकान्ति खरादी हुई मणिके समान उज्ज्वल है। शरीरके रोएँ कोमल हैं तथा पैरोंकी दसों अँगुलियाँ और दोनों तलवे—ये बारहों पृथ्वीसे अच्छी तरह सट जाते हैं। इन सबके कारण लक्षणज्ञोंने मुझे शुभलक्षणा बताया था ॥ ‘मेरे हाथ-पैर लाल एवं उत्तम कान्तिसे युक्त हैं। उनमें जौकी समूची रेखाएँ हैं तथा मेरे हाथोंकी अँगुलियाँ जब परस्पर सटी होती हैं, उस समय उनमें तनिक भी छिद्र नहीं रह जाता है। कन्याके शुभलक्षणोंको जाननेवाले विद्वानोंने मुझे मन्द-मुस्कानवाली बताया था ॥ १३ ॥
आधिराज्येऽभिषेको मे ब्राह्मणैः पतिना सह। कृतान्तकुशलैरुक्तं तत् सर्वं वितथीकृतम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘ज्योतिषके सिद्धान्तको जाननेवाले निपुण ब्राह्मणोंने यह बताया था कि मेरा पतिके साथ राज्याभिषेक होगा, किंतु आज वे सारी बातें झूठी हो गयीं ॥ १४ ॥
शोधयित्वा जनस्थानं प्रवृत्तिमुपलभ्य च। तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं भ्रातरौ गोष्पदे हतौ ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘इन दोनों भाइयोंने मेरे लिये जनस्थानको छान डाला तथा मेरा समाचार पाकर अक्षोभ्य समुद्रको पार किया, किंतु हाय ! इतना सब कर लेनेके बाद थोड़ी-सी राक्षससेनाके द्वारा जिसे हराना इनके लिये गोपदको लाँघनेके समान था, वे दोनों मारे गये ॥ १५ ॥
ननु वारुणमाग्नेयमैन्द्रं वायव्यमेव च। अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव राघवौ प्रत्यपद्यत ॥ १६ ॥ अदृश्यमानेन रणे मायया वासवोपमौ। मम नाथावनाथाया निहतौ रामलक्ष्मणौ ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘परंतु ये दोनों रघुवंशी बन्धु तो वारुण, आग्नेय, ऐन्द्र, वायव्य और ब्रह्मशिर आदि अस्त्रोंको भी जानते थे। मरनेसे पहले इन्होंने उन अस्त्रोंका प्रयोग क्यों नहीं किया ? ॥ ‘मुझ अनाथाके रक्षक श्रीराम और लक्ष्मण इन्द्रतुल्य पराक्रमी थे, किंतु इन्द्रजित्ने स्वयं मायासे अदृश्य रहकर ही इन्हें रणभूमिमें मार डाला है ॥ १७ ॥
नहि दृष्टिपथं प्राप्य राघवस्य रणे रिपुः। जीवन् प्रतिनिवर्तेत यद्यपि स्यान्मनोजवः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘अन्यथा युद्धस्थलमें इन श्रीरघुनाथजीके दृष्टिपथमें आकर कोई भी शत्रु, वह मनके समान वेगशाली क्यों न हो, जीवित नहीं लौट सकता था ॥ १८ ॥
न कालस्यातिभारोऽस्ति कृतान्तश्च सुदुर्जयः। यत्र रामः सह भ्रात्रा शेते युधि निपातितः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘परंतु कालके लिये कुछ भी अधिक बोझ नहीं है ( वह सब कुछ कर सकता है )। उसके लिये दैवको भी जीतना विशेष कठिन नहीं है। इस कालके ही वशमें पड़कर आज श्रीराम अपने भाईके साथ मारे जाकर युद्धभूमिमें सो रहे हैं ॥ १९ ॥
न शोचामि तथा रामं लक्ष्मणं च महारथम्। नात्मानं जननीं चापि यथा श्वश्रूं तपस्विनीम् ॥ २० ॥ सा तु चिन्तयते नित्यं समाप्तव्रतमागतम्। कदा द्रक्ष्यामि सीतां च लक्ष्मणं च सराघवम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘मैं श्रीराम, महारथी लक्ष्मण, अपने और अपनी माताके लिये भी उतना शोक नहीं करती हूँ जितना अपनी तपस्विनी सासुजीके लिये कर रही हूँ। वे तो प्रतिदिन यही सोचती होंगी कि वह दिन कब आयेगा जब कि वनवासका व्रत समाप्त करके वनसे लौटे हुए श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको मैं देखूँगी’ ॥ २०-२१ ॥
परिदेवयमानां तां राक्षसी त्रिजटाब्रवीत्। मा विषादं कृथा देवि भर्तायं तव जीवति ॥ २२ ॥
भावार्थ
इस प्रकार विलाप करती हुई सीतासे राक्षसी त्रिजटाने कहा—‘देवि ! विषाद न करो। तुम्हारे ये पतिदेव जीवित हैं ॥ २२ ॥
कारणानि च वक्ष्यामि महान्ति सदृशानि च। यथेमौ जीवतो देवि भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘देवि ! मैं तुम्हें कई ऐसे महान् और उचित कारण बताऊँगी, जिनसे यह सूचित होता है कि ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जीवित हैं ॥ २३ ॥
नहि कोपपरीतानि हर्षपर्युत्सुकानि च। भवन्ति युधि योधानां मुखानि निहते पतौ ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘युद्धमें स्वामीके मारे जानेपर योद्धाओंके मुँह क्रोध और हर्षकी उत्सुकतासे युक्त नहीं रहते ( किंतु यहाँ वे दोनों बातें पायी जाती हैं। इसलिये ये दोनों जीवित हैं ) ॥ २४ ॥
इदं विमानं वैदेहि पुष्पकं नाम नामतः। दिव्यं त्वां धारयेन्नेदं यद्येतौ गतजीवितौ ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! यह पुष्पक नामक विमान दिव्य है। यदि इन दोनोंके प्राण चले गये होते तो ( वैधव्यावस्थामें ) यह तुम्हें धारण न करता ॥ २५ ॥
हतवीरप्रधाना हि गतोत्साहा निरुद्यमा। सेना भ्रमति संख्येषु हतकर्णेव नौर्जले ॥ २६ ॥ इयं पुनरसम्भ्रान्ता निरुद्विग्ना तपस्विनि । सेना रक्षति काकुत्स्थौ मया प्रीत्या निवेदितौ ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘इसके सिवा जब प्रधान वीर मारा जाता है, तब उसकी सेना उत्साह और उद्योगसे हीन हो युद्धस्थलमें उसी तरह मारी-मारी फिरती है, जैसे कर्णधारके नष्ट हो जानेपर नौका जलमें ही बहती रहती है । परंतु तपस्विनि ! इस सेनामें किसी प्रकारकी घबराहट या उद्वेग नहीं है । यह इन दोनों राजकुमारोंकी रक्षा कर रही है ! इस प्रकार मैंने प्रेमपूर्वक तुम्हें यह बताया है कि ये दोनों भाई जीवित हैं ॥ २६-२७ ॥
सा त्वं भव सुविस्रब्धा अनुमानैः सुखोदयैः । अहतौ पश्य काकुत्स्थौ स्नेहादेतद् ब्रवीमि ते ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘इसलिये अब तुम इन भावी सुखकी सूचना देनेवाले अनुमानों ( हेतुओं ) से निश्चिन्त हो जाओ-- विश्वास करो कि ये जीवित हैं । तुम इन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंको इसी रूपमें देखो कि ये मारे नहीं गये हैं । यह बात मैं तुमसे स्नेहवश कह रही हूँ ॥ २८ ॥
अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्यामि मैथिलि । चारित्रसुखशीलत्वात् प्रविष्टासि मनो मम ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! तुम्हारा शील-स्वभाव तुम्हारे निर्मल चरित्रके कारण बड़ा सुखदायक जान पड़ता है, इसीलिये तुम मेरे मनमें घर कर गयी हो । अतएव मैंने तुमसे न तो पहले कभी झूठ कहा है और न आगे ही कहूँगी ॥ २९ ॥
नेमौ शक्यौ रणे जेतुं सेन्द्रैरपि सुरासुरैः । तादृशं दर्शनं दृष्ट्वा मया चोदीरितं तव ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘इन दोनों वीरोंको रणभूमिमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी नहीं जीत सकते । वैसा लक्षण देखकर ही मैंने तुमसे ये बातें कही हैं ॥ ३० ॥
इदं तु सुमहच्चित्रं शरैः पश्यस्व मैथिलि । विसंज्ञौ पतितावेतौ नैव लक्ष्मीर्विमुञ्चति ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! यह महान् आश्चर्यकी बात तो देखो । बाणोंके लगनेसे ये अचेत होकर पड़े हैं तो भी लक्ष्मी ( शरीरकी सहज कान्ति ) इनका त्याग नहीं कर रही है ॥३१॥
प्रायेण गतसत्त्वानां पुरुषाणां गतायुषाम् । दृश्यमानेषु वक्त्रेषु परं भवति वैकृतम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘जिनके प्राण निकल जाते हैं अथवा जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, उनके मुखोंपर यदि दृष्टिपात किया जाय तो प्रायः वहाँ बड़ी विकृति दिखायी देती है ( इन दोनोंके मुखोंकी शोभा ज्यों-की-त्यों बनी हुई है; इसलिये ये जीवित हैं ) ॥३२॥
त्यज शोकं च दुःखं च मोहं च जनकात्मजे । रामलक्ष्मणयोरर्थे नाद्य शक्यमजीवितुम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘जनककिशोरी ! तुम श्रीराम और लक्ष्मणके लिये शोक, दुःख और मोह त्याग दो । ये अब मर नहीं सकते’ ॥ ३३ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्याः सीता सुरसुतोपमा । कृताञ्जलिरुवाचेमामेवमस्त्विति मैथिली ॥ ३४ ॥
भावार्थ
त्रिजटाकी यह बात सुनकर देवकन्याके समान सुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीताने हाथ जोड़कर उससे कहा-‘बहिन ! ऐसा ही हो’ ॥ ३४ ॥
विमानं पुष्पकं तत्तु संनिवर्त्य मनोजवम् । दीना त्रिजटया सीता लङ्कामेव प्रवेशिता ॥ ३५ ॥
भावार्थ
फिर मनके समान वेगवाले पुष्पकविमानको लौटाकर त्रिजटा दुःखिनी सीताको लङ्कापुरीमें ही ले आयी ॥ ३५ ॥
ततस्त्रिजटया सार्धं पुष्पकादवरुह्य सा । अशोकवनिकामेव राक्षसीभिः प्रवेशिता ॥ ३६ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् त्रिजटाके साथ विमानसे उतरनेपर राक्षसियोंने उन्हें पुनः अशोकवाटिकामें ही पहुँचा दिया ॥ ३६ ॥
प्रविश्य सीता बहुवृक्षखण्डां तां राक्षसेन्द्रस्य विहारभूमिम् । सम्प्रेक्ष्य संचिन्त्य च राजपुत्रौ परं विषादं समुपाजगाम ॥ ३७ ॥
भावार्थ
बहुसंख्यक वृक्षसमूहोंसे सुशोभित राक्षसराजकी उस विहार-भूमिमें पहुँचकर सीताने उसे देखा और उन दोनों राजकुमारोंका चिन्तन करके वे महान् शोकमें डूब गयीं ॥ ३७ ॥
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