युद्धकाण्ड, सर्ग 120
प्रतिप्रयाते काकुत्स्थे महेन्द्रः पाकशासनः । अब्रवीत् परमप्रीतो राघवं प्राञ्जलिं स्थितम् ॥ १ ॥
भावार्थ
महाराज दशरथके लौट जानेपर पाकशासन इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़े खड़े हुए श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥ १ ॥
अमोघं दर्शनं राम तवास्माकं नरर्षभ । प्रीतियुक्ताः स्म तेन त्वं ब्रूहि यन्मनसेप्सितम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम ! तुम्हें जो हमारा दर्शन हुआ, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये और हम तुमपर बहुत प्रसन्न हैं।’ इसलिये तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह मुझसे कहो’ ॥ २ ॥
एवमुक्तो महेन्द्रेण प्रसन्नेन महात्मना । सुप्रसन्नमना हृष्टो वचनं प्राह राघवः ॥ ३ ॥
भावार्थ
महात्मा इन्द्रने जब प्रसन्न होकर ऐसी बात कही, तब श्रीरघुनाथजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने हर्षसे भरकर कहा—॥ ३ ॥
यदि प्रीतिः समुत्पन्ना मयि ते विबुधेश्वर । वक्ष्यामि कुरु मे सत्यं वचनं वदतां वर ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक प्रार्थना करूँगा। आप मेरी उस प्रार्थनाको सफल करें ॥ ४ ॥
मम हेतोः पराक्रान्ता ये गता यमसादनम् । ते सर्वे जीवितं प्राप्य समुत्तिष्ठन्तु वानराः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मेरे लिये युद्धमें पराक्रम करके जो यमलोकको चले गये हैं, वे सब वानर नया जीवन पाकर उठ खड़े हों ॥ ५ ॥
मत्कृते विप्रयुक्ता ये पुत्रैर्दारैश्च वानराः । तान् प्रीतमनसः सर्वान् द्रष्टुमिच्छामि मानद ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘मानद ! जो वानर मेरे लिये अपने स्त्री-पुत्रोंसे बिछुड़ गये हैं, उन सबको मैं प्रसन्नचित्त देखना चाहता हूँ ॥६॥
विक्रान्ताश्चापि शूराश्च न मृत्युं गणयन्ति च । कृतयत्ना विपन्नाश्च जीवयैतान् पुरंदर ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘पुरंदर ! वे पराक्रमी और शूरवीर थे तथा मृत्युको कुछ भी नहीं गिनते थे । उन्होंने मेरे लिये बड़ा प्रयत्न किया है और अन्तमें कालके गालमें चले गये हैं । आप उन सबको जीवित कर दें ॥ ७ ॥
मत्प्रियेष्वभिरक्ताश्च न मृत्युं गणयन्ति ये । त्वत्प्रसादात् समेयुस्ते वरमेतमहं वृणे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जो वानर सदा मेरा प्रिय करनेमें लगे रहते थे और मौतको कुछ नहीं समझते थे, वे सब आपकी कृपासे फिर मुझसे मिलें —यह वर मैं चाहता हूँ ॥ ८ ॥
नीरुजो निर्व्रणांश्चैव सम्पन्नबलपौरुषान् । गोलाङ्गूलांस्तथर्क्षांश्च द्रष्टुमिच्छामि मानद ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘दूसरोंको मान देनेवाले देवराज ! मैं उन वानर, लंगूर और भालुओंको नीरोग, व्रणहीन और बल-पौरुषसे सम्पन्न देखना चाहता हूँ ॥ ९ ॥
अकाले चापि पुष्पाणि मूलानि च फलानि च । नद्यश्च विमलास्तत्र तिष्ठेयुर्यत्र वानराः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘ये वानर जिस स्थानपर रहें, वहाँ असमयमें भी फल-मूल और पुष्पोंकी भरमार रहे तथा निर्मल जलवाली नदियाँ बहती रहें’ ॥ १० ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्य राघवस्य महात्मनः । महेन्द्रः प्रत्युवाचेदं वचनं प्रीतिसंयुतम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
महात्मा श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर महेन्द्रने प्रसन्नतापूर्वक यों उत्तर दिया—॥ ११ ॥
महानयं वरस्तात यस्त्वयोक्तो रघूत्तम । द्विर्मया नोक्तपूर्वं च तस्मादेतद् भविष्यति ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘तात ! रघुवंशविभूषण ! आपने जो वर माँगा है, यह बहुत बड़ा है, तथापि मैंने कभी दो तरहकी बात नहीं की है; इसलिये यह वर अवश्य सफल होगा ॥ १२ ॥
समुत्तिष्ठन्तु ते सर्वे हता ये युधि राक्षसैः । ऋक्षाश्च सह गोपुच्छैर्निकृत्ताननबाहवः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘जो युद्धमें मारे गये हैं और राक्षसोंने जिनके मस्तक तथा भुजाएँ काट डाली हैं, वे सब वानर, भालू और लंगूर जी उठें ॥ १३ ॥
नीरुजो निर्व्रणाश्चैव सम्पन्नबलपौरुषाः । समुत्थास्यन्ति हरयः सुप्ता निद्राक्षये यथा ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘नींद टूटनेपर सोकर उठे हुए मनुष्योंकी भाँति वे सभी वानर नीरोग, व्रणहीन तथा बल-पौरुषसे सम्पन्न होकर उठ बैठेंगे ॥ १४ ॥
सुहृद्भिर्बान्धवैश्चैव ज्ञातिभिः स्वजनेन च । सर्वे एव समेष्यन्ति संयुक्ताः परया मुदा ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सभी परमानन्दसे युक्त हो अपने सुहृदों, बान्धवों, जाति-भाइयों तथा स्वजनोंसे मिलेंगे ॥ १५ ॥
अकाले पुष्पशबलाः फलवन्तश्च पादपाः । भविष्यन्ति महेष्वास नद्यश्च सलिलायुताः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘महाधनुर्धर वीर ! ये वानर जहाँ रहेंगे, वहाँ असमयमें भी वृक्ष फल-फूलोंसे लद जायँगे और नदियाँ जलसे भरी रहेंगी’ ॥ १६ ॥
सव्रणैः प्रथमं गात्रैरिदानीं निर्व्रणैः समैः । ततः समुत्थिताः सर्वे सुप्त्वेव हरिसत्तमाः ॥ १७ ॥ बभूवुर्वानराः सर्वे किं त्वेतदिति विस्मिताः । काकुत्स्थं परिपूर्णार्थं दृष्ट्वा सर्वे सुरोत्तमाः ॥ १८ ॥ अब्रुवन् परमप्रीताः स्तुत्वा रामं सलक्ष्मणम् । गच्छायोध्यामितो राजन् विसर्जय च वानरान् ॥१९॥
भावार्थ
इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर वे सब श्रेष्ठ वानर जिनके सब अङ्ग पहले घावोंसे भरे थे, उस समय घावरहित हो गये और सभी सोकर जगे हुएकी भाँति सहसा उठकर खड़े हो गये ॥ उन्हें इस प्रकार जीवित होते देख सब वानर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे कि यह क्या बात हो गयी ? श्रीरामचन्द्रजीको सफलमनोरथ हुआ देख समस्त श्रेष्ठ देवता अत्यन्त प्रसन्न हो लक्ष्मणसहित श्रीरामकी स्तुति करके बोले–‘राजन् ! अब आप यहाँसे अयोध्याको पधारें और समस्त वानरोंको बिदा कर दें ॥ १८-१९ ॥
मैथिलीं सान्त्वयस्वैनामनुरक्तां यशस्विनीम् । भ्रातरं भरतं पश्य त्वच्छोकाद् व्रतचारिणम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘ये मिथिलेशकुमारी यशस्विनी सीता सदा आपमें अनुराग रखती हैं । इन्हें सान्त्वना दीजिये और भाई भरत आपके शोकसे पीड़ित हो व्रत कर रहे हैं, अतः उनसे जाकर मिलिये ॥ २० ॥
शत्रुघ्नं च महात्मानं मातृः सर्वाः परंतप । अभिषेचय चात्मानं पौरान् गत्वा प्रहर्षय ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘परंतप ! आप महात्मा शत्रुघ्नसे और समस्त माताओंसे भी जाकर मिलें, अपना अभिषेक करावें और पुरवासियोंको हर्ष प्रदान करें’ ॥ २१ ॥
एवमुक्त्वा सहस्राक्षो रामं सौमित्रिणा सह । विमानैः सूर्यसंकाशैर्ययौ हृष्टः सुरैः सह ॥ २२ ॥
भावार्थ
श्रीराम और लक्ष्मणसे ऐसा कहकर देवराज इन्द्र सब देवताओंके साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानोंद्वारा बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने लोकको चले गये ॥ २२ ॥
अभिवाद्य च काकुत्स्थः सर्वांस्तान्त्रिदशोत्तमान् । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वासमाज्ञापयत् तदा ॥ २३ ॥
भावार्थ
उन समस्त श्रेष्ठ देवताओंको नमस्कार करके भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने सबको विश्राम करनेकी आज्ञा दी ॥ २३ ॥
ततस्तु सा लक्ष्मणरामपालिता महाचमूर्हृष्टजना यशस्विनी । श्रिया ज्वलन्ती विरराज सर्वतो निशा प्रणीतेव हि शीतरश्मिना ॥ २४ ॥
भावार्थ
श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सुरक्षित तथा हृष्ट-पुष्ट सैनिकोंसे भरी हुई वह यशस्विनी विशाल सेना चन्द्रमाकी चाँदनीसे प्रकाशित होनेवाली रात्रिके समान अद्भुत शोभासे उद्भासित होती हुई विराज रही थी ॥ २४ ॥
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