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युद्धकाण्ड, सर्ग 119

एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं राघवेणानुभाषितम् । ततः शुभतरं वाक्यं व्याजहार महेश्वरः ॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीके कहे हुए इन शुभ वचनोंको सुनकर श्रीमहादेवजी और भी शुभतर वचन बोले— ॥ १ ॥

पुष्कराक्ष महाबाहो महावक्षः परंतप । दिष्ट्या कृतमिदं कर्म त्वया धर्मभृतां वर ॥ २ ॥

भावार्थ

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, महाबाहु कमलनयन ! आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं । आपने रावण-वधरूप कार्य सम्पन्न कर दिया—यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ २ ॥

दिष्ट्या सर्वस्य लोकस्य प्रवृद्धं दारुणं तमः । अपवृत्तं त्वया संख्ये राम रावणजं भयम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! रावणजनित भय और दुःख सारे लोकोंके लिये बढ़े हुए घोर अन्धकारके समान था, जिसे आपने युद्धमें मिटा दिया ॥ ३ ॥

आश्वास्य भरतं दीनं कौसल्यां च यशस्विनीम् । कैकेयीं च सुमित्रां च दृष्ट्वा लक्ष्मणमातरम् ॥ ४ ॥ प्राप्य राज्यमयोध्यायां नन्दयित्वा सुहृज्जनम् । इक्ष्वाकूणां कुले वंशं स्थापयित्वा महाबल ॥ ५ ॥ इष्ट्वा तुरगमेधेन प्राप्य चानुत्तमं यशः । ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा त्रिदिवं गन्तुमर्हसि ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘महाबली वीर ! अब दुखी भरतको धीरज बँधाकर, यशस्विनी कौसल्या, कैकेयी तथा लक्ष्मणजननी सुमित्रासे मिलकर, अयोध्याका राज्य पाकर, सुहृदोंको आनन्द देकर, इक्ष्वाकु-कुलमें अपना वंश स्थापित करके, अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान कर, सर्वोत्तम यशका उपार्जन करके तथा ब्राह्मणोंको धन देकर आपको अपने परम धाममें जाना चाहिये ॥४–६॥

एष राजा दशरथो विमानस्थः पिता तव । काकुत्स्थ मानुषे लोके गुरुस्तव महायशाः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलनन्दन ! देखिये, ये आपके पिता राजा दशरथ विमानपर बैठे हुए हैं । मनुष्यलोकमें ये ही आपके महायशस्वी गुरु थे ॥ ७ ॥

इन्द्रलोकं गतः श्रीमांस्त्वया पुत्रेण तारितः । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा त्वमेनमभिवादय ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘ये श्रीमान् नरेश इन्द्रलोकको प्राप्त हुए हैं । आप-जैसे सुपुत्रने इन्हें तार दिया । आप भाई लक्ष्मणके साथ इन्हें नमस्कार करें’ ॥ ८ ॥

महादेववचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः । विमानशिखरस्थस्य प्रणाममकरोत् पितुः ॥ ९ ॥

भावार्थ

महादेवजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीने विमानमें उच्चस्थानपर बैठे हुए अपने पिताजीको प्रणाम किया ॥ ९ ॥

दीप्यमानं स्वया लक्ष्म्या विरजोऽम्बरधारिणम् । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा ददर्श पितरं प्रभुः ॥ १० ॥

भावार्थ

भाई लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामने पिताको अच्छी तरह देखा । वे निर्मल वस्त्र धारण करके अपनी दिव्य शोभासे देदीप्यमान थे ॥ १० ॥

हर्षेण महताऽऽविष्टो विमानस्थो महीपतिः । प्राणैः प्रियतरं दृष्ट्वा पुत्रं दशरथस्तदा ॥ ११ ॥

भावार्थ

विमानपर बैठे हुए महाराज दशरथ अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्र श्रीरामको देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ११ ॥

आरोप्याङ्के महाबाहुर्वरासनगतः प्रभुः । बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य ततो वाक्यं समाददे ॥ १२ ॥

भावार्थ

श्रेष्ठ आसनपर बैठे हुए उन महाबाहु नरेशने उन्हें गोदमें बिठाकर दोनों बाँहोंमें भर लिया और इस प्रकार कहा—॥ १२ ॥

न मे स्वर्गो बहु मतः सम्मानश्च सुरर्षिभिः । त्वया राम विहीनस्य सत्यं प्रतिशृणोमि ते ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘राम ! मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुमसे बिलग होकर मुझे स्वर्गका सुख तथा देवताओंद्वारा प्राप्त हुआ सम्मान भी अच्छा नहीं लगता ॥ १३ ॥

अद्य त्वां निहतामित्रं दृष्ट्वा सम्पूर्णमानसम् । निस्तीर्णवनवासं च प्रीतिरासीत् परा मम ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘आज तुम शत्रुओंका वध करके पूर्णमनोरथ हो गये और तुमने वनवासकी अवधि भी पूरी कर ली, यह सब देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥१४ ॥

कैकेय्या यानि चोक्तानि वाक्यानि वदतां वर । तव प्रव्राजनार्थानि स्थितानि हृदये मम ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! तुम्हें वनमें भेजनेके लिये कैकेयीने जो-जो बातें कही थीं, वे सब आज भी मेरे हृदयमें बैठी हुई हैं ॥ १५ ॥

त्वां तु दृष्ट्वा कुशलिनं परिष्वज्य सलक्ष्मणम् । अद्य दुःखाद् विमुक्तोऽस्मि नीहारादिव भास्करः॥ १६ ॥

भावार्थ

‘आज लक्ष्मणसहित तुमको सकुशल देखकर और हृदयसे लगाकर मैं समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा गया हूँ । ठीक उसी तरह, जैसे चन्द्रमा कुहरेसे निकल आये हों ॥ १६ ॥

तारितोऽहं त्वया पुत्र सुपुत्रेण महात्मना । अष्टावक्रेण धर्मात्मा कहोलो ब्राह्मणो यथा ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘बेटा ! जैसे अष्टावक्रने अपने धर्मात्मा पिता कहोल नामक ब्राह्मणको तार दिया था, वैसे ही तुम-जैसे महात्मा पुत्रने मेरा उद्धार कर दिया ॥ १७ ॥

इदानीं च विजानामि यथा सौम्य सुरेश्वरैः । वधार्थं रावणस्येह पिहितं पुरुषोत्तमम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! आज इन देवताओंके द्वारा मुझे मालूम हुआ कि रावणका वध करनेके लिये स्वयं पुरुषोत्तम भगवान् ही तुम्हारे रूपमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ १८ ॥

सिद्धार्था खलु कौसल्याया त्वां राम गृहं गतम् । वनान्निवृत्तं संहृष्टा द्रक्ष्यते शत्रुसूदनम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! कौसल्याका जीवन सार्थक है, जो वनसे लौटनेपर तुम-जैसे शत्रुसूदन वीर पुत्रको अपने घरमें हर्ष और उल्लासके साथ देखेंगी ॥ १९ ॥

सिद्धार्थाः खलु ते राम नरा ये त्वां पुरीं गतम् । राज्ये चैवाभिषिक्तं च द्रक्ष्यन्ते वसुधाधिपम् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! वे प्रजाजन भी कृतार्थ हैं, जो अयोध्या पहुँचनेपर तुम्हें राज्यसिंहासनपर भूमिपालके रूपमें अभिषिक्त होते देखेंगे ॥ २० ॥

अनुरक्तेन बलिना शुचिना धर्मचारिणा । इच्छेयं त्वामहं द्रष्टुं भरतेन समागतम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘भरत बड़ा ही धर्मात्मा, पवित्र और बलवान् है । वह तुममें सच्चा अनुराग रखता है । मैं उसके साथ तुम्हारा शीघ्र ही मिलन देखना चाहता हूँ ॥ २१ ॥

चतुर्दश समाः सौम्य वने निर्यातितास्त्वया । वसता सीतया सार्धं मत्प्रीत्या लक्ष्मणेन च ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! तुमने मेरी प्रसन्नताके लिये लक्ष्मण और सीताके साथ रहते हुए वनमें चौदह वर्ष व्यतीत किये ॥ २२ ॥

निवृत्तवनवासोऽसि प्रतिज्ञा पूरिता त्वया । रावणं च रणे हत्वा देवताः परितोषिताः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘अब तुम्हारे वनवासकी अवधि पूरी हो गयी। मेरी प्रतिज्ञा भी तुमने पूर्ण कर दी तथा संग्राममें रावणको मारकर देवताओंको भी संतुष्ट कर दिया ॥ २३ ॥

कृतं कर्म यशः श्लाघ्यं प्राप्तं ते शत्रुसूदन । भ्रातृभिः सह राज्यस्थो दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘शत्रुसूदन ! ये सभी काम तुम कर चुके । इससे तुम्हें स्पृहणीय यश प्राप्त हुआ है । अब तुम भाइयोंके साथ राज्यपर प्रतिष्ठित हो दीर्घ आयु प्राप्त करो’ ॥ २४ ॥

इति ब्रुवाणं राजानं रामः प्राञ्जलिरब्रवीत् । कुरु प्रसादं धर्मज्ञ कैकेय्या भरतस्य च ॥ २५ ॥

भावार्थ

जब राजा इस प्रकार कह चुके, तब श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर उनसे बोले—‘धर्मज्ञ महाराज ! आप कैकेयी और भरतपर प्रसन्न हों—उन दोनोंपर कृपा करें ॥ २५ ॥

सपुत्रां त्वां त्यजामीति यदुक्ता कैकयी त्वया । स शापः कैकयीं घोरः सपुत्रां न स्पृशेत् प्रभो ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘प्रभो ! आपने जो कैकेयीसे कहा था कि मैं पुत्रसहित तेरा त्याग करता हूँ, आपका वह घोर शाप पुत्रसहित कैकेयीका स्पर्श न करे’ ॥ २६ ॥

तथेति स महाराजो राममुक्त्वा कृताञ्जलिम् । लक्ष्मणं च परिष्वज्य पुनर्वाक्यमुवाच ह ॥ २७ ॥

भावार्थ

तब श्रीरामसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर महाराज दशरथने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और हाथ जोड़े खड़े हुए लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर फिर यह बात कही--॥ २७ ॥

रामं शुश्रूषता भक्त्या वैदेह्या सह सीतया । कृता मम महाप्रीतिः प्राप्तं धर्मफलं च ते ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘वत्स ! तुमने विदेहनन्दिनी सीताके साथ श्रीरामकी भक्तिपूर्वक सेवा करके मुझे बहुत प्रसन्न किया है । तुम्हें धर्मका फल प्राप्त हुआ है ॥ २८ ॥

धर्मं प्राप्स्यसि धर्मज्ञ यशश्च विपुलं भुवि । रामे प्रसन्ने स्वर्गं च महिमानं तथोत्तमम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘धर्मज्ञ ! भविष्यमें भी तुम्हें धर्मका फल प्राप्त होगा और भूमण्डलमें महान् यशकी उपलब्धि होगी । श्रीरामकी प्रसन्नतासे तुम्हें उत्तम स्वर्ग और महत्त्व प्राप्त होगा ॥ २९ ॥

रामं शुश्रूष भद्रं ते सुमित्रानन्दवर्धन । रामः सर्वस्य लोकस्य हितेष्वभिरतः सदा ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम श्रीरामकी निरन्तर सेवा करते रहो । ये श्रीराम सदा सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ ३० ॥

एते सेन्द्रास्त्रयो लोकाः सिद्धाश्च परमर्षयः । अभिवाद्य महात्मानमर्चन्ति पुरुषोत्तमम् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘देखो, इन्द्रसहित ये तीनों लोक, सिद्ध और महर्षि भी परमात्मस्वरूप पुरुषोत्तम रामको प्रणाम करके इनका पूजन कर रहे हैं ॥ ३१ ॥

एतत् तदुक्तमव्यक्तमक्षरं ब्रह्मसम्मितम् । देवानां हृदयं सौम्य गुह्यं रामः परंतपः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! शत्रुओंको संताप देनेवाले ये श्रीराम देवताओंके हृदय और परम गुह्य तत्त्व हैं । ये ही वेदोंद्वारा प्रतिपादित अव्यक्त एवं अविनाशी ब्रह्म हैं ॥ ३२ ॥

अवाप्तधर्माचरणं यशश्च विपुलं त्वया । एवं शुश्रूषताव्यग्रं वैदेह्या सह सीतया ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘विदेहनन्दिनी सीताके साथ शान्तभावसे इनकी सेवा करते हुए तुमने सम्पूर्ण धर्माचरणका फल और महान् यश प्राप्त किया है’ ॥ ३३ ॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं राजा स्नुषां बद्धाञ्जलिं स्थिताम् । पुत्रीत्याभाष्य मधुरं शनैरेनामुवाच ह ॥ ३४ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर राजा दशरथने हाथ जोड़कर खड़ी हुई पुत्रवधू सीताको ‘बेटी’ कहकर पुकारा और धीरे-धीरे मधुर वाणीमें कहा—॥ ३४ ॥

कर्तव्यो न तु वैदेहि मन्युस्त्यागमिमं प्रति । रामेणेदं विशुद्ध्यर्थं कृतं वै त्वद्धितैषिणा ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘विदेहनन्दिनि ! तुम्हें इस त्यागको लेकर श्रीरामपर कुपित नहीं होना चाहिये; क्योंकि ये तुम्हारे हितैषी हैं और संसारमें तुम्हारी पवित्रता प्रकट करनेके लिये ही इन्होंने ऐसा व्यवहार किया है ॥ ३५ ॥

सुदुष्करमिदं पुत्रि तव चारित्रलक्षणम् । कृतं यत् तेऽन्यनारीणां यशो ह्यभिभविष्यति ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘बेटी ! तुमने अपने विशुद्ध चरित्रको परिलक्षित करानेके लिये जो अग्निप्रवेशरूप कार्य किया है, यह दूसरी स्त्रियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है । तुम्हारा यह कर्म अन्य नारियोंके यशको ढक लेगा ॥ ३६ ॥

न त्वं कामं समाधेया भर्तृशुश्रूषणं प्रति । अवश्यं तु मया वाच्यमेष ते दैवतं परम् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘पति-सेवाके सम्बन्धमें भले ही तुम्हें कोई उपदेश देनेकी आवश्यकता न हो; किंतु इतना तो मुझे अवश्य बता देना चाहिये कि ये श्रीराम ही तुम्हारे सबसे बड़े देवता हैं’ ॥३७॥

इति प्रतिसमादिश्य पुत्रौ सीतां च राघवः । इन्द्रलोकं विमानेन ययौ दशरथो नृपः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

इस प्रकार दोनों पुत्रों और सीताको आदेश एवं उपदेश देकर रघुवंशी राजा दशरथ विमानके द्वारा इन्द्रलोकको चले गये ॥ ३८ ॥

विमानमास्थाय महानुभावः श्रिया च संहृष्टतनुर्नृपोत्तमः । आमन्त्र्य पुत्रौ सह सीतया च जगाम देवप्रवरस्य लोकम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

नृपश्रेष्ठ महानुभाव दशरथ अद्भुत शोभासे सम्पन्न थे । उनका शरीर हर्षसे पुलकित हो रहा था । वे विमानपर बैठकर सीतासहित दोनों पुत्रोंसे विदा ले देवराज इन्द्रके लोकमें चले गये ॥ ३९ ॥

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