Ramayana.com

युद्धकाण्ड, सर्ग 115

तां तु पार्श्वे स्थितां प्रह्वां रामः सम्प्रेक्ष्य मैथिलीम् । हृदयान्तर्गतं भावं व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १ ॥

भावार्थ

मिथिलेशकुमारी सीताको विनयपूर्वक अपने समीप खड़ी देख श्रीरामचन्द्रजीने अपना हार्दिक अभिप्राय बताना आरम्भ किया—॥ १ ॥

एषासि निर्जिता भद्रे शत्रुं जित्वा रणाजिरे । पौरुषाद् यदनुष्ठेयं मयैतदुपपादितम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘भद्रे ! समराङ्गणमें शत्रुको पराजित करके मैंने तुम्हें उसके चंगुलसे छुड़ा लिया । पुरुषार्थके द्वारा जो कुछ किया जा सकता था, वह सब मैंने किया ॥ २ ॥

गतोऽस्यन्तममर्षस्य धर्षणा सम्प्रमार्जिता । अवमानश्च शत्रुश्च युगपन्निहतौ मया ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘अब मेरे अमर्षका अन्त हो गया । मुझपर जो कलङ्क लगा था, उसका मैंने मार्जन कर दिया । शत्रुजनित अपमान और शत्रु दोनोंको एक साथ ही नष्ट कर डाला ॥ ३ ॥

अद्य मे पौरुषं दृष्टमद्य मे सफलः श्रमः । अद्य तीर्णप्रतिज्ञोऽहं प्रभवाम्यद्य चात्मनः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘आज सबने मेरा पराक्रम देख लिया । अब मेरा परिश्रम सफल हो गया और इस समय प्रतिज्ञा पूर्ण करके मैं उसके भारसे मुक्त एवं स्वतन्त्र हो गया ॥ ४ ॥

या त्वं विरहिता नीता चलचित्तेन रक्षसा । दैवसम्पादितो दोषो मानुषेण मया जितः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘जब तुम आश्रममें अकेली थीं, उस समय वह चञ्चल चित्तवाला राक्षस तुम्हें हर ले गया । यह दोष मेरे ऊपर दैववश प्राप्त हुआ था, जिसका मैंने मानवसाध्य पुरुषार्थके द्वारा मार्जन कर दिया ॥ ५ ॥

सम्प्रातमवमानं यस्तेजसा न प्रमार्जति । कस्तस्य पौरुषेणार्थो महताप्यल्पचेतसः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘जो पुरुष प्राप्त हुए अपमानका अपने तेज या बलसे मार्जन नहीं कर देता है, उस मन्दबुद्धि मानवके महान् पुरुषार्थसे भी क्या लाभ हुआ ? ॥ ६ ॥

लङ्घनं च समुद्रस्य लङ्कायाश्चापि मर्दनम् । सफलं तस्य च श्लाघ्यमद्य कर्म हनूमतः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘हनुमान्ने जो समुद्रको लाँघा और लङ्काका विध्वंस किया, उनका वह प्रशंसनीय कर्म आज सफल हो गया ॥७॥

युद्धे विक्रमतश्चैव हितं मन्त्रयतस्तथा । सुग्रीवस्य ससैन्यस्य सफलोऽद्य परिश्रमः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘सेनासहित सुग्रीवने युद्धमें पराक्रम दिखाया तथा समय-समयपर ये मुझे हितकर सलाह देते रहे हैं, इनका परिश्रम भी अब सार्थक हो गया ॥ ८ ॥

विभीषणस्य च तथा सफलोऽद्य परिश्रमः । विगुणं भ्रातरं त्यक्त्वा यो मां स्वयमुपस्थितः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘ये विभीषण दुर्गुणोंसे भरे हुए अपने भाईका परित्याग करके स्वयं ही मेरे पास उपस्थित हुए थे । अबतकका किया हुआ इनका परिश्रम भी निष्फल नहीं हुआ’ ॥ ९ ॥

इत्येवं वदतः श्रुत्वा सीता रामस्य तद् वचः । मृगीवोत्फुल्लनयना बभूवाश्रुपरिप्लुता ॥ १० ॥

भावार्थ

इस तरह कहते हुए श्रीरामजीकी बातें सुनकर मृगीके समान विकसित नेत्रोंवाली सीताकी आँखोंमें आँसू भर आया ॥ १० ॥

पश्यतस्तां तु रामस्य समीपे हृदयप्रियाम् । जनवादभयाद् राज्ञो बभूव हृदयं द्विधा ॥ ११ ॥

भावार्थ

वे अपने स्वामीकी हृदयवल्लभा थीं । उनके प्राणवल्लभ उन्हें अपने समीप देख रहे थे; परंतु लोकापवादके भयसे राजा श्रीरामका हृदय उस समय विदीर्ण हो रहा था ॥ ११ ॥

सीतामुत्पलपत्राक्षीं नीलकुञ्चितमूर्धजाम् । अवदद् वै वरारोहां मध्ये वानरराक्षसाम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘वे काले-काले घुँघराले बालोंवाली कमललोचना सुन्दरी सीतासे वानर और राक्षसोंकी भरी सभामें पुनः इस प्रकार कहने लगे—॥ १२ ॥

यत् कर्तव्यं मनुष्येण धर्षणां प्रतिमार्जता । तत् कृतं रावणं हत्वा मयेदं मानकाङ्क्षिणा ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘अपने तिरस्कारका बदला चुकानेके लिये मनुष्यका जो कर्तव्य है, वह सब मैंने अपनी मानरक्षाकी अभिलाषासे रावणका वध करके पूर्ण किया ॥ १३ ॥

निर्जिता जीवलोकस्य तपसा भावितात्मना । अगस्त्येन दुराधर्षा मुनिना दक्षिणेव दिक् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘जैसे तपस्यासे भावित अन्तःकरणवाले अथवा तपस्या-पूर्वक परमात्मस्वरूपका चिन्तन करनेवाले महर्षि अगस्त्यने वातापि और इल्वलके भयसे जीवजगत्के लिये दुर्गम हुई दक्षिण दिशाको जीता था, उसी प्रकार मैंने रावणके वशमें पड़ी हुई तुमको जीता है ॥ १४ ॥

विदितश्चास्तु भद्रं ते योऽयं रणपरिश्रमः । सुतीर्णः सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थं मया कृतः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैंने जो यह युद्धका परिश्रम उठाया है तथा इन मित्रोंके पराक्रमसे जो इसमें विजय पायी है, यह सब तुम्हें पानेके लिये नहीं किया गया है ॥ १५ ॥

रक्षता तु मया वृत्तमपवादं च सर्वतः । प्रख्यातस्यात्मवंशस्य न्यङ्गं च परिमार्जता ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘सदाचारकी रक्षा, सब ओर फैले हुए अपवादका निवारण तथा अपने सुविख्यात वंशपर लगे हुए कलंकका परिमार्जन करनेके लिये ही यह सब मैंने किया है ॥ १६ ॥

प्राप्तचारित्रसंदेहा मम प्रतिमुखे स्थिता । दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि मे दृढा ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारे चरित्रमें संदेहका अवसर उपस्थित है; फिर भी तुम मेरे सामने खड़ी हो । जैसे आँखके रोगीको दीपककी ज्योति नहीं सुहाती, उसी प्रकार आज तुम मुझे अत्यन्त अप्रिय जान पड़ती हो ॥ १७ ॥

तद् गच्छ त्वानुजानेऽद्य यथेष्टं जनकात्मजे । एता दश दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘अतः जनककुमारी ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ । मैं अपनी ओरसे तुम्हें अनुमति देता हूँ । भद्रे ! ये दसों दिशाएँ तुम्हारे लिये खुली हैं । अब तुमसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ १८ ॥

कः पुमांस्तु कुले जातः स्त्रियं परगृहोषिताम् । तेजस्वी पुनरादद्यात् सुहृल्लोभेन चेतसा ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘कौन ऐसा कुलीन पुरुष होगा, जो तेजस्वी होकर भी दूसरेके घरमें रही हुई स्त्रीको, केवल इस लोभसे कि यह मेरे साथ बहुत दिनोंतक रहकर सौहार्द स्थापित कर चुकी है, मनसे भी ग्रहण कर सकेगा ॥ १९ ॥

रावणाङ्कपरिक्लिष्टां दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा । कथं त्वां पुनरादद्यां कुलं व्यपदिशन्महत् ॥ २० ॥ यदर्थं निर्जिता मे त्वं सोऽयमासादितो मया । नास्ति मे त्वय्यभिष्वङ्गो यथेष्टं गम्यतामिति ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘रावण तुम्हें अपनी गोदमें उठाकर ले गया और तुमपर अपनी दूषित दृष्टि डाल चुका है, ऐसी दशामें अपने कुलको महान् बताता हुआ मैं फिर तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ॥ ‘अतः जिस उद्देश्यसे मैंने तुम्हें जीता था, वह सिद्ध हो गया—मेरे कुलके कलंकका मार्जन हो गया । अब मेरी तुम्हारे प्रति ममता या आसक्ति नहीं है; अतः तुम जहाँ जाना चाहो, जा सकती हो ॥ २१ ॥

तदद्य व्याहृतं भद्रे मयैतत् कृतबुद्धिना । लक्ष्मणे वाथ भरते कुरु बुद्धिं यथासुखम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘भद्रे ! मेरा यह निश्चित विचार है । इसके अनुसार ही आज मैंने तुम्हारे सामने ये बातें कही हैं । तुम चाहो तो भरत या लक्ष्मणके संरक्षणमें सुखपूर्वक रहनेका विचार कर सकती हो ॥ २२ ॥

शत्रुघ्ने वाथ सुग्रीवे राक्षसे वा विभीषणे । निवेशय मनः सीते यथा वा सुखमात्मना ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘सीते ! तुम्हारी इच्छा हो तो तुम शत्रुघ्न, वानरराज सुग्रीव अथवा राक्षसराज विभीषणके पास भी रह सकती हो । जहाँ तुम्हें सुख मिले, वहीं अपना मन लगाओ ॥ २३ ॥

नहि त्वां रावणो दृष्ट्वा दिव्यरूपां मनोरमाम् । मर्षयेत चिरं सीते स्वगृहे पर्यवस्थिताम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘सीते ! तुम-जैसी दिव्यरूप-सौन्दर्यसे सुशोभित मनोरम नारीको अपने घरमें स्थित देखकर रावण चिरकालतक तुमसे दूर रहनेका कष्ट नहीं सह सका होगा’ ॥ २४ ॥

ततः प्रियार्हश्रवणा तदप्रियं प्रियादुपश्रुत्य चिरस्य मानिनी । मुमोच बाष्पं रुदती तदा भृशं गजेन्द्रहस्ताभिहतेव वल्लरी ॥ २५ ॥

भावार्थ

जो सदा प्रिय वचन सुननेके ही योग्य थीं, वे मानिनी सीता चिरकालके बाद मिले हुए प्रियतमके मुखसे ऐसी अप्रिय बात सुनकर उस समय हाथीकी सूँड़से आहत हुई लताके समान आँसू बहाने और रोने लगीं ॥ २५ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें