युद्धकाण्ड, सर्ग 114
तमुवाच महाप्राज्ञः सोऽभिवाद्य प्लवङ्गमः । रामं कमलपत्राक्षं वरं सर्वधनुष्मताम् ॥ १ ॥ यन्निमित्तोऽयमारम्भः कर्मणां यः फलोदयः । तां देवीं शोकसंतप्तां द्रष्टुमर्हसि मैथिलीम् ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर परम बुद्धिमान् वानरवीर हनुमान्जीने सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कमलनयन श्रीरामको प्रणाम करके कहा—।१। ‘भगवन् ! जिनके लिये इन युद्ध आदि कर्मोंका सारा उद्योग आरम्भ किया गया था, उन शोकसंतप्त मिथिलेशकुमारी सीतादेवीको आप दर्शन दें ॥ २ ॥
सा हि शोकसमाविष्टा बाष्पपर्याकुलेक्षणा । मैथिली विजयं श्रुत्वा द्रष्टुं त्वामभिकाङ्क्षति ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वे शोकमें डूबी रहती हैं । उनके नेत्र आँसुओंसे भरे हुए हैं । आपकी विजयका समाचार सुनकर वे मिथिलेशकुमारी आपका दर्शन करना चाहती हैं ॥ ३ ॥
पूर्वकात् प्रत्ययाच्चाहमुक्तो विश्वस्तया तया । द्रष्टुमिच्छामि भर्तारमिति पर्याकुलेक्षणा ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘पहली बार जो मैं आपका संदेश लेकर आया था, तभीसे उनका मेरे ऊपर विश्वास हो गया है कि यह मेरे स्वामीका आत्मीयजन है । उसी विश्वाससे युक्त हो उन्होंने नेत्रोंमें आँसू भरकर मुझसे कहा है कि मैं प्राणनाथका दर्शन करन। चाहती हूँ’ ॥ ४ ॥
एवमुक्तो हनुमता रामो धर्मभृतां वरः । आगच्छत् सहसा ध्यानमीषद्वाष्पपरिप्लुतः ॥ ५ ॥ स दीर्घमभिनिःश्वस्य जगतीमवलोकयन् । उवाच मेघसंकाशं विभीषणमुपस्थितम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी सहसा ध्यानस्थ हो गये । उनकी आँखें डबडबा आयीं और वे लंबी साँस खींचकर भूमिकी ओर देखते हुए पास ही खड़े मेघके समान श्याम कान्तिवाले विभीषणसे बोले—॥५-६॥
दिव्याङ्गरागां वैदेहीं दिव्याभरणभूषिताम् । इह सीतां शिरःस्नातामुपस्थापय मा चिरम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘तुम विदेहनन्दिनी सीताको मस्तकपरसे स्नान कराकर दिव्य अङ्गराग तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित करके शीघ्र मेरे पास ले आओ’ ॥ ७ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण त्वरमाणो विभीषणः । प्रविश्यान्तःपुरं सीतां स्त्रीभिः स्वाभिरचोदयत् ॥ ८ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषण बड़ी उतावलीके साथ अन्तःपुरमें गये और पहले अपनी स्त्रियोंको भेजकर उन्होंने सीताको अपने आनेकी खबर दी ॥ ८ ॥
ततः सीतां महाभागां दश्ग्रोवाच विभीषणः । मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिः श्रीमान् विनीतो राक्षसेश्वरः ॥ ९ ॥
भावार्थ
इसके बाद श्रीमान् राक्षसराज विभीषणने स्वयं ही जाकर महाभाग सीताका दर्शन किया और मस्तकपर अञ्जलि बाँध विनीतभावसे कहा –॥ ९ ॥
दिव्याङ्गरागा वैदेहि दिव्याभरणभूषिता । यानमारोह भद्रं ते भर्ता त्वां द्रष्टुमिच्छति ॥ १० ॥
भावार्थ
‘विदेहराजकुमारी ! आप स्नान करके दिव्य अङ्गराग तथा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे भूषित होकर सवारीपर बैठिये । आपका कल्याण हो । आपके स्वामी आपको देखना चाहते हैं’ ॥ १० ॥
एवमुक्ता तु वैदेही प्रत्युवाच विभीषणम् । अस्नात्वा द्रष्टुमिच्छामि भर्तारं राक्षसेश्वर ॥ ११ ॥
भावार्थ
उनके ऐसा कहनेपर वैदेहीने विभीषणको उत्तर दिया— ‘राक्षसराज ! मैं बिना स्नान किये ही अभी पतिदेवका दर्शन करना चाहती हूँ’ ॥ ११ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच विभीषणः । यथाऽऽह रामो भर्ता ते तत् तथा कर्तुमर्हसि ॥ १२ ॥
भावार्थ
सीताकी यह बात सुनकर विभीषण बोले–‘देवि ! आपके पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीने जैसी आज्ञा दी है, आपको वैसा ही करना चाहिये’ ॥१२ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा मैथिली पतिदेवता । भर्तृभक्त्यावृता साध्वी तथेति प्रत्यभाषत ॥ १३ ॥
भावार्थ
उनका यह वचन सुनकर पतिभक्तिसे सुरक्षित तथा पतिको ही देवता माननेवाली सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीताने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वामीकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली ॥ १३ ॥
ततः सीतां शिरःस्नातां संयुक्तां प्रतिकर्मणा । महार्हाभरणोपेतां महार्हाम्बरधारिणीम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् विदेहकुमारीने सिरसे स्नान करके सुन्दर शृङ्गार किया तथा बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण पहनकर वे चलनेको तैयार हो गयीं ॥ १४ ॥
आरोप्य शिबिकां दीप्तां परार्ध्याम्बरसंवृताम् । रक्षोभिर्बहुभिर्गुप्तामाजहार विभीषणः ॥ १५ ॥
भावार्थ
तब विभीषण बहुमूल्य वस्त्रोंसे आवृत दीप्तिमती सीता देवीको शिबिकामें बिठाकर भगवान् श्रीरामके पास ले आये । उस समय बहुत-से निशाचर चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा कर रहे थे ॥ १५ ॥
सोऽभिगम्य महात्मानं ज्ञात्वापि ध्यानमास्थितम् । प्रणतश्च प्रहृष्टश्च प्राप्तां सीतां न्यवेदयत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
भगवान् श्रीराम ध्यानस्थ हैं, यह जानकर भी विभीषण उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोले— ‘प्रभो ! सीतादेवी आ गयी हैं’ ॥ १६ ॥
तामागतामुपश्रुत्य रक्षोगृहचिरोषिताम् । रोषं हर्षं च दैन्यं च राघवः प्राप शत्रुहा ॥ १७ ॥
भावार्थ
राक्षसके घरमें बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद आज सीताजी आयी हैं, यह सोच उनके आगमनका समाचार सुनकर शत्रुसूदन श्रीरघुनाथजीको एक ही समय रोष, हर्ष और दुःख प्राप्त हुआ ॥ १७ ॥
ततो यानगतां सीतां सविमर्शं विचारयन् । विभीषणमिदं वाक्यमहृष्टो राघवोऽब्रवीत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर ‘सीता सवारीपर आयी हैं’ इस बातपर तर्क-बितर्कपूर्ण विचार करके श्रीरघुनाथजीको प्रसन्नता नहीं हुई । बे विभीषणसे इस प्रकार बोले—॥ १८ ॥
राक्षसाधिपते सौम्य नित्यं मद्विजये रत । वैदेही संनिकर्षं मे क्षिप्रं समभिगच्छतु ॥ १९ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य विभीषणः । तूर्णमुत्सारणं तत्र कारयामास धर्मवित् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘सदा मेरी विजयके लिये तत्पर रहनेवाले सौम्य राक्षसराज ! तुम विदेहकुमारीसे कहो, वे शीघ्र मेरे पास आयें ॥’ श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ विभीषणने तुरंत वहाँसे दूसरे लोगोंको हटाना प्रारम्भ किया ॥ २० ॥
कञ्चुकोष्णीषिणस्तत्र वेत्रझर्झरपाणयः । उत्सारयन्तस्तान् योधान् समन्तात् परिचक्रमुः ॥ २१ ॥
भावार्थ
पगड़ी बाँधे और अङ्गा पहिने हुए बहुत-से सिपाही हाथोंमें झाँझकी तरह बजती हुई छड़ी लिये उन वानर-योद्धाओंको हटाते हुए चारों ओर घूमने लगे ॥ २१ ॥
ऋक्षाणां वानराणां च राक्षसानां च सर्वशः । वृन्दान्युत्सार्यमाणानि दूरमुत्तस्थुरन्ततः ॥ २२ ॥
भावार्थ
उनके द्वारा हटाये जाते हुए रीछों, वानरों और राक्षसोंके समुदाय अन्ततोगत्वा दूर जाकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥
तेषामुत्सार्यमाणानां निःस्वनः सुमहानभूत् । वायुनोद्धूयमानस्य सागरस्येव निःस्वनः ॥ २३ ॥
भावार्थ
जैसे वायुके थपेड़े खाकर उद्वेलित हुए समुद्रकी गर्जना बढ़ जाती है, उसी प्रकार वहाँसे हटाये जाते हुए उन वानर आदिके हटनेसे वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥ २३ ॥
उत्सार्यमाणांस्तान् दृष्ट्वा समन्ताज्जातसम्भ्रमान् । दाक्षिण्यात्तदमर्षाच्च वारयामास राघवः ॥ २४ ॥
भावार्थ
जिन्हें हटाया जाता था, उनके मनमें बड़ा उद्वेग होता था, सब ओर यह उद्वेग देखकर श्रीरघुनाथजीने अपनी सहज उदारताके कारण उन हटानेवालोंको रोषपूर्वक रोका—॥ २४ ॥
संरम्भाच्चाब्रवीद् रामश्चक्षुषा प्रदहन्निव । विभीषणं महाप्राज्ञं सोपालम्भमिदं वचः ॥ २५ ॥
भावार्थ
उस समय श्रीराम हटानेवाले सिपाहियोंकी ओर इस तरह रोषपूर्ण दृष्टिसे देख रहे थे, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर डालेंगे । उन्होंने परम बुद्धिमान् विभीषणको उलाहना देते हुए क्रोधपूर्वक कहा—॥ २५ ॥
किमर्थं मामनादृत्य क्लिश्यतेऽयं त्वया जनः । निवर्तयैनमुद्वेगं जनोऽयं स्वजनो मम ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘तुम किसलिये मेरा अनादर करके इन सब लोगोंको कष्ट दे रहे हो । रोक दो इस उद्वेगजनक कार्यको । यहाँ जितने लोग हैं सब मेरे आत्मीय जन हैं ॥ २६ ॥
न गृहाणि न वस्त्राणि न प्राकारस्तिरस्क्रिया । नेदृशा राजसत्कारा वृत्तमावरणं स्त्रियाः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘घर, वस्त्र ( कनात आदि ) और चहारदीवारी आदि वस्तुएँ स्त्रीके लिये परदा नहीं हुआ करती हैं । इस तरह लोगोंको दूर हटानेके जो निष्ठुरतापूर्ण व्यवहार हैं, ये भी स्त्रीके लिये आवरण या पर्देका काम नहीं देते हैं । पतिसे प्राप्त होनेवाले सत्कार तथा नारीके अपने सदाचार—ये ही उसके लिये आवरण हैं ॥ २७ ॥
व्यसनेषु न कृच्छ्रेषु न युद्धेषु स्वयंवरे । न क्रतौ नो विवाहे वा दर्शनं दुष्यते स्त्रियाः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘विपत्तिकालमें, शारीरिक या मानसिक पीड़ाके अवसरोंपर, युद्धमें, स्वयंवरमें, यज्ञमें अथवा विवाहमें स्त्रीका दीखना ( या दूसरोंकी दृष्टिमें आना ) दोषकी बात नहीं है ॥ २८ ॥
सैषा विपद्गता चैव कृच्छ्रेण च समन्विता । दर्शने नास्ति दोषोऽस्या मत्समीपे विशेषतः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘यह सीता इस समय विपत्तिमें है । मानसिक कष्टसे भी युक्त है और विशेषतः मेरे पास है; इसलिये इसका परदेके बिना सबके सामने आना दोषकी बात नहीं है ॥ २९ ॥
विसृज्य शिबिकां तस्मात् पद्भ्यामेवापसर्पतु । समीपे मम वैदेहीं पश्यन्त्वेते वनौकसः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘अतः जानकी शिबिका ( पालकी ) छोड़कर पैदल ही मेरे पास आयें और ये सभी वानर उनका दर्शन करें’ ॥३०॥
एवमुक्तस्तु रामेण सविमर्शो विभीषणः । रामस्योपानयत् सीतां संनिकर्षं विनीतवत् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषण बड़े विचारमें पड़ गये और विनीतभावसे सीताको उनके समीप ले आये ॥ ३१ ॥
ततो लक्ष्मणसुग्रीवौ हनूमांश्च प्लवङ्गमः । निशम्य वाक्यं रामस्य बभूवुर्व्यथिता भृशम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
उस समय श्रीरामचन्द्रजीका पूर्वोक्त वचन सुनकर लक्ष्मण, सुग्रीव तथा कपिवर हनुमान् तीनों ही अत्यन्त व्यथित हो उठे ॥ ३२ ॥
कलत्रनिरपेक्षैश्च इङ्गितैरस्य दारुणैः । अप्रीतमिव सीतायां तर्कयन्ति स्म राघवम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी भयंकर चेष्टाएँ यह सूचित कर रही थीं कि वे पत्नीकी ओरसे निरपेक्ष हो गये हैं । इसीलिये उन तीनोंने यह अनुमान किया कि श्रीरघुनाथजी सीतापर अप्रसन्न-से जान पड़ते हैं ॥ ३३ ॥
लज्जया त्ववलीयन्ती स्वेषु गात्रेषु मैथिली । विभीषणेनानुगता भर्तारं साभ्यवर्तत ॥ ३४ ॥
भावार्थ
आगे-आगे सीता थीं और पीछे विभीषण । वे लज्जासे अपने अङ्गोंमें ही सिकुड़ी जा रही थीं । इस तरह वे अपने पतिदेवके सामने उपस्थित हुईं ॥ ३४ ॥
विस्मयाच्च प्रहर्षाच्च स्नेहाच्च पतिदेवता । उदैक्षत मुखं भर्तुः सौम्यं सौम्यतरानना ॥ ३५ ॥
भावार्थ
सीताजीका मुख अत्यन्त सौम्यभावसे युक्त था । वे पतिको ही देवता माननेवाली थीं । उन्होंने बड़े विस्मय, हर्ष और स्नेहके साथ अपने स्वामीके सौम्य ( मनोहर ) मुखका दर्शन किया ॥ ३५ ॥
अथ समुपनुदन्मनःक्रमं सा सुचिरमदृष्टमुदीक्ष्य वै प्रियस्य । वदनमुदितपूर्णचन्द्रकान्तं विमलशशाङ्कनिभाननातदाऽऽसीत् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उदयकालीन पूर्ण चन्द्रमाको भी लज्जित करनेवाले प्रियतमके सुन्दर मुखको, जिसके दर्शनसे वे बहुत दिनोंसे वञ्चित थीं, सीताने जी भरकर निहारा और अपने मनकी पीड़ा दूर की । उस समय उनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और निर्मल चन्द्रमाके समान शोभा पाने लगा ॥ ३६ ॥
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