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उत्तरकाण्ड, सर्ग 73

ततो द्वादशमे वर्षे शत्रुघ्नो रामपालिताम् । अयोध्यां चकमे गन्तुमल्पभृत्यबलानुगः ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर बारहवें वर्षमें थोड़े से सेवकों और सैनिकोंको साथ ले शत्रुघ्नने श्रीरामपालित अयोध्याको जानेका विचार किया ॥ १ ॥

ततो मन्त्रिपुरोगांश्च बलमुख्यान् निवर्त्य च । जगाम हयमुख्येन रथानां च शतेन सः ॥ २ ॥

भावार्थ

अतः अपने मुख्य-मुख्य मन्त्रियों तथा सेनापतियोंको लौटाकर—पुरीकी रक्षाके लिये वहीं छोड़कर वे अच्छे-अच्छे घोड़ेवाले सौ रथ साथ ले अयोध्याकी ओर चल पड़े ॥ २ ॥

स गत्वा गणितान् वासान् सप्ताष्टौ रघुनन्दनः । वाल्मीकाश्रममागत्य वासं चक्रे महायशाः ॥ ३ ॥ सोऽभिवाद्य ततः पादौ वाल्मीकेः पुरुषर्षभः । पाद्यमर्घ्यं तथातिथ्यं जग्राह मुनिहस्ततः ॥ ४ ॥

भावार्थ

महायशस्वी रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न यात्रा करनेके पश्चात् मार्गमें सात-आठ परिगणित स्थानोंपर पड़ाव डालते हुए वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर आ पहुँचे और रातमें वहीं ठहरे॥ उन पुरुषप्रवर रघुवीरने वाल्मीकिजीके चरणोंमें प्रणाम करके उनके हाथसे पाद्य और अर्घ्य आदि आतिथ्य-सत्कारकी सामग्री ग्रहण की ॥ ४ ॥

बहुरूपाः सुमधुराः कथास्तत्र सहस्रशः । कथयामास स मुनिः शत्रुघ्नाय महात्मने ॥ ५ ॥

भावार्थ

वहाँ महर्षि वाल्मीकिने महात्मा शत्रुघ्नको सुनानेके लिये भाँति भाँतिकी सहस्रों सुमधुर कथाएँ कहीं ॥ ५ ॥

उवाच च मुनिर्वाक्यं लवणस्य वधाश्रितम् । सुदुष्करं कृतं कर्म लवणं निघ्नता त्वया ॥ ६ ॥

भावार्थ

फिर वे लवणवधके विषयमें बोले—‘लवणासुरको मारकर तुमने अत्यन्त दुष्कर कर्म किया है ॥ ६ ॥

बहवः पार्थिवाः सौम्य हताः सबलवाहनाः । लवणेन महाबाहो युध्यमाना महाबलाः ॥ ७ ॥ स त्वया निहतः पापो लीलया पुरुषर्षभ । जगतश्च भयं तत्र प्रशान्तं तव तेजसा ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! महाबाहो ! लवणासुरके साथ युद्ध करके बहुत-से महाबली भूपाल सेना और सवारियोंसहित मारे गये हैं ॥ ‘पुरुषश्रेष्ठ ! वही पापी लवणासुर तुम्हारे द्वारा अनायास ही मार डाला गया । उसके कारण जगत्में जो भय छा गया था, वह तुम्हारे तेजसे शान्त हो गया ॥ ८ ॥

रावणस्य वधो घोरो यत्नेन महता कृतः । इदं च सुमहत्कर्म त्वया कृतमयत्नतः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘रावणका घोर वध महान् प्रयत्नसे किया गया था; परंतु यह महान् कर्म तुमने बिना यत्नके ही सिद्ध कर दिया ॥ ९ ॥

प्रीतिश्चास्मिन् परा जाता देवानां लवणे हते । भूतानां चैव सर्वेषां जगतश्च प्रियं कृतम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘लवणासुरके मारे जानेसे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई है । तुमने समस्त प्राणियों और सारे जगत्का प्रिय कार्य किया है ॥ १० ॥

तच्च युद्धं मया दृष्टं यथावत् पुरुषर्षभ । सभायां वासवस्याथ उपविष्टेन राघव ॥ ११ ॥ ममापि परमा प्रीतिर्हृदि शत्रुघ्न वर्तते । उपाघ्रास्यामि ते मूर्ध्नि स्नेहस्यैषा परा गतिः ॥ १२ ॥ इत्युक्त्वा मूर्ध्नि शत्रुघ्नमुपाघ्राय महामतिः । आतिथ्यमकरोत् तस्य ये च तस्य पदानुगाः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! मैं इन्द्रकी सभामें बैठा था । जब वह विमानाकार सभा युद्ध देखनेके लिये आयी, तब वहीं बैठे-बैठे मैंने भी तुम्हारे और लवणके युद्धको भलीभाँति देखा था॥ ‘शत्रुघ्न ! मेरे हृदयमें भी तुम्हारे लिये बड़ा प्रेम है । अतः मैं तुम्हारा मस्तक सूँघूँगा । यही स्नेहकी पराकाष्ठा है’ ॥ ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् वाल्मीकिने शत्रुघ्नका मस्तक सूँघा और उनका तथा उनके साथियोंका आतिथ्य-सत्कार किया ॥ १३ ॥

स भुक्तवान् नरश्रेष्ठो गीतमाधुर्यमुत्तमम् । शुश्राव रामचरितं तस्मिन् काले यथाक्रमम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नने भोजन किया और उस समय श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रका क्रमशः वर्णन सुना, जो गीतकी मधुरताके कारण बड़ा ही प्रिय एवं उत्तम जान पड़ता था ॥ १४ ॥

तन्त्रीलयसमायुक्तं त्रिस्थानकरणान्वितम् । संस्कृतं लक्षणोपेतं समतालसमन्वितम् ॥ १५ ॥ शुश्राव रामचरितं तस्मिन् काले पुरा कृतम् ।

भावार्थ

उस वेलामें उन्हें जो रामचरित सुननेको मिला, वह पहले ही काव्यबद्ध कर लिया गया था । वह काव्यगान वीणाकी लयके साथ हो रहा था । हृदय, कण्ठ और मूर्धा--इन तीन स्थानोंमें मन्द्र, मध्यम और तार स्वरके भेदसे उच्चारित हो रहा था । संस्कृत भाषामें निर्मित होकर व्याकरण, छन्द, काव्य और संगीत-शास्त्रके लक्षणोंसे सम्पन्न था और गानोचित तालके साथ गाया गया था ॥ १५½ ॥

तान्यक्षराणि सत्यानि यथावृत्तानि पूर्वशः ॥ १६ ॥ श्रुत्वा पुरुषशार्दूलो विसंज्ञो बाष्पलोचनः ।

भावार्थ

उस काव्यके सभी अक्षर एवं वाक्य सच्ची घटनाका प्रतिपादन करते थे और पहले जो वृत्तान्त घटित हो चुके थे, उनका यथार्थ परिचय दे रहे थे । वह अद्भुत काव्यगान सुनकर पुरुषसिंह शत्रुघ्न मूर्छित-से हो गये । उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगी ॥ १६½ ॥

स मुहूर्तमिवासंज्ञो विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥ तस्मिन् गीते यथावृत्तं वर्तमानमिवाशृणोत् ।

भावार्थ

वे दो घड़ीतक अचेत-से होकर बारंबार लंबी साँस खींचते रहे । उस गानमें उन्होंने बीती हुई बातोंको वर्तमानकी भाँति सुना ॥ १७½ ॥

पदानुगाश्च ये राज्ञस्तां श्रुत्वा गीतिसम्पदम् ॥ १८ ॥ अवाङ्मुखाश्च दीनाश्च ह्याश्चर्यमिति चाब्रुवन् ।

भावार्थ

राजा शत्रुघ्नके जो साथी थे, वे भी उस गीत-सम्पत्तिको सुनकर दीन और नतमस्तक हो बोले—‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है‘ ॥ १८½ ॥

परस्परं च ये तत्र सैनिकाः सम्बभाषिरे ॥ १९ ॥ किमिदं क च वर्तामः किमेतत् स्वप्नदर्शनम् । अर्थो यो नः पुरा दृष्टस्तमाश्रमपदे पुनः ॥ २० ॥

भावार्थ

शत्रुघ्नके जो सैनिक वहाँ मौजूद थे, वे परस्पर कहने लगे—‘यह क्या बात है ? हमलोग कहाँ हैं ? यह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहे हैं । जिन बातोंको हम पहले देख चुके हैं, उन्हींको इस आश्रमपर ज्यों-की-त्यों सुन रहे हैं ॥ १९-२० ॥

शृणुमः किमिदं स्वप्ने गीतबन्धनमुत्तमम् । विस्मयं ते परं गत्वा शत्रुघ्नमिदमब्रुवन् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘क्या इस उत्तम गीतबन्धको हमलोग स्वप्नमें सुन रहे हैं ।‘ फिर अत्यन्त विस्मयमें पड़कर वे शत्रुघ्नसे बोले—॥२१॥

साधु पृच्छ नरश्रेष्ठ वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम् । शत्रुघ्नस्त्वब्रवीत् सर्वान् कौतूहलसमन्वितान् ॥ २२ ॥ सैनिकानक्षमोऽस्माकं परिप्रष्टुमिहेदृशः । आश्चर्याणि बहूनीह भवन्त्यस्याश्रमे मुनेः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! आप इस विषयमें मुनिवर वाल्मीकिजीसे भलीभाँति पूछें ।‘ शत्रुघ्नने कौतूहलमें भरे हुए उन सब सैनिकोंसे कहा—‘मुनिके इस आश्रममें ऐसी अनेक आश्चर्यजनक घटनाएँ होती रहती हैं । उनके विषयमें उनसे कुछ पूछताछ करना हमारे लिये उचित नहीं है ॥ २२-२३ ॥

न तु कौतूहलाद् युक्तमन्वेष्टुं तं महामुनिम् । एवं तद् वाक्यमुक्त्वा तु सैनिकान् रघुनन्दनः । अभिवाद्य महर्षिं तं स्वं निवेशं ययौ तदा ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘कौतूहलवश महामुनि वाल्मीकिसे इन बातोंके विषयमें जानना या पूछना उचित न होगा ।‘ अपने सैनिकोंसे ऐसा कहकर रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न महर्षिको प्रणाम करके अपने खेमेमें चले गये ॥ २४ ॥

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