Ramayana.com

उत्तरकाण्ड, सर्ग 72

हते तु लवणे देवाः सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः। ऊचुः सुमधुरां वाणीं शत्रुघ्नं शत्रुतापनम् ॥ १ ॥

भावार्थ

लवणासुरके मारे जानेपर इन्द्र और अग्नि आदि देवता आकर शत्रुओंको संताप देनेवाले शत्रुघ्नसे अत्यन्त मधुर बाणीमें बोले—॥ १ ॥

दिष्ट्या ते विजयो वत्स दिष्ट्या लवणराक्षसः। हतः पुरुषशार्दूल वरं वरय सुव्रत ॥ २ ॥

भावार्थ

‘वत्स ! सौभाग्यकी बात है कि तुम्हें विजय प्राप्त हुई और लवणासुर मारा गया । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुषसिंह ! तुम वर माँगो ॥ २ ॥

वरदास्तु महाबाहो सर्व एव समागताः। विजयाकाङ्क्षिणस्तुभ्यममोघं दर्शनं हि नः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! हम सब लोग तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आये हैं । हम तुम्हारी विजय चाहते थे । हमारा दर्शन अमोघ है ( अतएव तुम कोई वर माँगो )’ ॥ ३ ॥

देवानां भाषितं श्रुत्वा शूरो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः। प्रत्युवाच महाबाहुः शत्रुघ्नः प्रयतात्मवान् ॥ ४ ॥

भावार्थ

देवताओंका यह वचन सुनकर मनको वशमें रखनेवाले शूरवीर महाबाहु शत्रुघ्न मस्तकपर अञ्जलि बाँध इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥

इयं मधुपुरी रम्या मधुरा देवनिर्मिता। निवेशं प्राप्नुयाच्छीघ्रमेष मेऽस्तु वरः परः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘देवताओ ! यह देवनिर्मित रमणीय मधुपुरी शीघ्र ही मनोहर राजधानीके रूपमें बस जाय । यही मेरे लिये श्रेष्ठ वर है’ ॥ ५ ॥

तं देवाः प्रीतमनसो बाढमित्येव राघवम् । भविष्यति पुरी रम्या शूरसेना न संशयः ॥ ६ ॥

भावार्थ

तब देवताओंने उन रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नसे प्रसन्न होकर कहा—‘बहुत अच्छा ऐसा ही हो । यह रमणीय पुरी निःसंदेह शूर-वीरोंकी सेनासे सम्पन्न हो जायगी’ ॥ ६ ॥

ते तथोक्त्वा महात्मानो दिवमारुरुहुस्तदा । शत्रुघ्नोऽपि महातेजास्तां सेनां समुपानयत् ॥ ७ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर महामनस्वी देवता उस समय स्वर्गको चले गये । महातेजस्वी शत्रुघ्नने भी गङ्गातटसे अपनी उस सेनाको बुलवाया ॥ ७ ॥

सा सेना शीघ्रमागच्छच्छ्रुत्वा शत्रुघ्नशासनम् । निवेशनं च शत्रुघ्नः श्रावणेन समारभत् ॥ ८ ॥ स पुरा दिव्यसंकाशो वर्षे द्वादशमे शुभे । निविष्टः शूरसेनानां विषयश्चाकुतोभयः ॥ ९ ॥

भावार्थ

शत्रुघ्नजीका आदेश पाकर वह सेना शीघ्र चली आयी । शत्रुघ्नने श्रावणमाससे उस पुरीको बसाना आरम्भ किया ॥ तबसे बारहवें वर्षतक वह पुरी तथा वह शूरसेन जनपद पूर्णरूपसे बस गया । वहाँ कहीं किसीसे भय नहीं था । वह देश दिव्य सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न था ॥ ९ ॥

क्षेत्राणि सस्ययुक्तानि काले वर्षति वासवः । अरोगवीरपुरुषा शत्रुघ्नभुजपालिता ॥ १० ॥

भावार्थ

वहाँके खेत खेतीसे हरे-भरे हो गये । इन्द्र वहाँ समयपर वर्षा करने लगे । शत्रुघ्नजीके बाहुबलसे सुरक्षित मधुपुरी नीरोग तथा वीर पुरुषोंसे भरी थी ॥ १० ॥

अर्धचन्द्रप्रतीकाशा यमुनातीरशोभिता । शोभिता गृहमुख्यैश्च चत्वरापणवीथिकैः । चातुर्वर्ण्यसमायुक्ता नानावाणिज्यशोभिता ॥ ११ ॥ यच्च तेन पुरा शुभ्रं लवणेन कृतं महत् । तच्छोभयति शत्रुघ्नो नानावर्णोपशोभिताम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

वह पुरी यमुनाके तटपर अर्धचन्द्राकार बसी थी और अनेकानेक सुन्दर गृहों, चौराहों, बाजारों तथा गलियोंसे सुशोभित होती थी । उसमें चारों वर्णोंके लोग निवास करते थे तथा नाना प्रकारके वाणिज्य-व्यवसाय उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ पूर्वकालमें लवणासुरने जिन विशाल गृहोंका निर्माण कराया था, उनमें सफेदी कराकर उन्हें नाना प्रकारके चित्रोंसे सुसज्जित करके शत्रुघ्नजी उनकी शोभा बढ़ाने लगे ॥ १२ ॥

आरामैश्च विहारैश्च शोभमानां समन्ततः । शोभितां शोभनीयैश्च तथान्यैर्दैवमानुषैः ॥ १३ ॥

भावार्थ

अनेकानेक उद्यान और विहारस्थल सब ओरसे उस पुरीको सुशोभित करते थे । देवताओं और मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य शोभनीय पदार्थ भी उस नगरीकी शोभावृद्धि करते थे ॥ १३ ॥

तां पुरीं दिव्यसंकाशां नानापण्योपशोभिताम् । नानादेशागतैश्चापि वणिग्भिरुपशोभिताम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

नाना प्रकारकी क्रय-विक्रय योग्य वस्तुओंसे सुशोभित वह दिव्य पुरी अनेकानेक देशोंसे आये हुए वणिग्जनोंसे शोभा पा रही थी ॥ १४ ॥

तां समृद्धां समृद्धार्थः शत्रुघ्नो भरतानुजः । निरीक्ष्य परमप्रीतः परं हर्षमुपागमत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

उसे पूर्णतः समृद्धिशालिनी देख सफलमनोरथ हुए भरतानुज शत्रुघ्न अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े हर्षका अनुभव करने लगे ॥ १५ ॥

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना निवेश्य मधुरां पुरीम् । रामपादौ निरीक्षेऽहं वर्षे द्वादश आगते ॥ १६ ॥

भावार्थ

मधुरापुरीको बसाकर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि अयोध्यासे आये बारहवाँ वर्ष हो गया, अब मुझे वहाँ चलकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दोंका दर्शन करना चाहिये ॥ १६ ॥

ततः स ताममरपुरोपमां पुरीं निवेश्य वै विविधजनाभिसंवृताम् । नराधिपो रघुपतिपाददर्शने दधे मतिं रघुकुलवंशवर्धनः ॥ १७ ॥

भावार्थ

इस प्रकार नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरी हुई उस देवपुरीके समान मनोहर मधुरापुरीको बसाकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले राजा शत्रुघ्नने श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शनका विचार किया ॥ १७ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें