उत्तरकाण्ड, सर्ग 51
तथा संचोदितः सूतो लक्ष्मणेन महात्मना । तद् वाक्यमृषिणा प्रोक्तं व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १ ॥
भावार्थ
तब महात्मा लक्ष्मणकी प्रेरणासे सुमन्त्रजी दुर्वासाजीकी कही हुई बात उन्हें सुनाने लगे—॥ १ ॥
पुरा नाम्ना हि दुर्वासा अत्रेः पुत्रो महामुनिः । वसिष्ठस्याश्रमे पुण्ये वार्षिक्यं समुवास ह ॥ २ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! पहलेकी बात है, अत्रिके पुत्र महामुनि दुर्वासा वसिष्ठजीके पवित्र आश्रमपर रहकर वर्षाके चार महीने बिता रहे थे ॥ २ ॥
तमाश्रमं महातेजाः पिता ते सुमहायशाः । पुरोहितं महात्मानं दिदृक्षुरगमत् स्वयम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘एक दिन आपके महातेजस्वी और महान् यशस्वी पिता उस आश्रमपर अपने पुरोहित महात्मा वसिष्ठजीका दर्शन करनेके लिये स्वयं ही गये ॥ ३ ॥
स दृष्ट्वा सूर्यसंकाशं ज्वलन्तमिव तेजसा । उपविष्टं वसिष्ठस्य सव्यपार्श्वे महामुनिम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘वहाँ उन्होंने वसिष्ठजीके वामभागमें बैठे हुए एक महा-मुनिको देखा, जो अपने तेजसे मानो सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥ ४ ॥
तौ मुनी तापसश्रेष्ठौ विनीतो ह्यभ्यवादयत् । स ताभ्यां पूजितो राजा स्वागतेनासनेन च ॥ ५ ॥ पाद्येन फलमूलैश्च उवास मुनिभिः सह ।
भावार्थ
‘तब राजाने उन दोनों तापसशिरोमणि महर्षियोंका विनयपूर्वक अभिवादन किया । उन दोनोंने भी स्वागतपूर्वक आसन देकर पाद्य एवं फल-मूल समर्पित करके राजाका सत्कार किया । फिर वे वहाँ मुनियोंके साथ बैठे ॥ ५½ ॥
तेषां तत्रोपविष्टानां तास्ताः सुमधुराः कथाः ॥ ६ ॥ बभूवुः परमर्षीणां मध्यादित्यगतेऽहनि ।
भावार्थ
‘वहाँ बैठे हुए महर्षियोंकी दोपहरके समय तरह-तरहकी अत्यन्त मधुर कथाएँ हुईं ॥ ६½ ॥
ततः कथायां कस्यांचित् प्राञ्जलिः प्रग्रहो नृपः ॥ ७ ॥ उवाच तं महात्मानमत्रेः पुत्रं तपोधनम् ।
भावार्थ
‘तदनन्तर किसी कथाके प्रसङ्गमें महाराजने हाथ जोड़कर अत्रिके तपोधन पुत्र महात्मा दुर्वासाजीसे विनयपूर्वक पूछा—॥ ७½ ॥
भगवन् किंप्रमाणेन मम वंशो भविष्यति ॥ ८ ॥ किमायुश्च हि मे रामः पुत्राश्चान्ये किमायुषः ।
भावार्थ
‘भगवन् ! मेरा वंश कितने समयतक चलेगा ? मेरे रामकी कितनी आयु होगी तथा अन्य सब पुत्रोंकी भी आयु कितनी होगी ? ॥ ८½ ॥
रामस्य च सुता ये स्युस्तेषामायुः कियद् भवेत् ॥ ९ ॥ काम्यया भगवन् ब्रूहि वंशस्यास्य गतिं मम ।
भावार्थ
‘श्रीरामके जो पुत्र होंगे, उनकी आयु कितनी होगी ? भगवन् ! आप इच्छानुसार मेरे वंशकी स्थिति बताइये’॥९½॥
तच्छ्रुत्वा व्याहृतं वाक्यं राज्ञो दशरथस्य तु ॥ १० ॥ दुर्वासाः सुमहातेजा व्याहर्तुमुपचक्रमे ।
भावार्थ
‘राजा दशरथका यह वचन सुनकर महातेजस्वी दुर्वासा-मुनि कहने लगे--॥ १०½ ॥
शृणु राजन् पुरा वृत्तं तदा देवासुरे युधि ॥ ११ ॥ दैत्याः सुरैर्भर्त्स्यमाना भृगुपत्नीं समाश्रिताः । तया दत्ताभयास्तत्र न्यवसन्नभयास्तदा ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! सुनिये, प्राचीन कालकी बात है, एक बार देवासुर-संग्राममें देवताओंसे पीड़ित हुए दैत्योंने महर्षि भृगुकी पत्नीकी शरण ली । भृगुपत्नीने उस समय दैत्योंको अभय दिया और वे उनके आश्रमपर निर्भय होकर रहने लगे ११-१२
तया परिगृहीतांस्तान् दृष्ट्वा क्रुद्धः सुरेश्वरः । चक्रेण शितधारेण भृगुपत्न्याः शिरोऽहरत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘भृगुपत्नीने दैत्योंको आश्रय दिया है, यह देखकर कुपित हुए देवेश्वर भगवान् विष्णुने तीखी धारवाले चक्रसे उनका सिर काट लिया ॥ १३ ॥
ततस्तां निहतां दृष्ट्वा पत्नीं भृगुकुलोद्वहः । शशाप सहसा क्रुद्धो विष्णुं रिपुकुलार्दनम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अपनी पत्नीका वध हुआ देख भार्गववंशके प्रवर्तक भृगुजीने सहसा कुपित हो शत्रुकुलनाशन भगवान् विष्णुको शाप दिया ॥ १४ ॥
यस्मादवध्यां मे पत्नीमवधीः क्रोधमूर्च्छितः । तस्मात् त्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनार्दन ॥ १५ ॥ तत्र पत्नीवियोगं त्वं प्राप्स्यसे बहुवार्षिकम् ।
भावार्थ
‘जनार्दन ! मेरी पत्नी वधके योग्य नहीं थी । परंतु आपने क्रोधसे मूर्छित होकर उसका वध किया है, इसलिये आपको मनुष्यलोकमें जन्म लेना पड़ेगा और वहाँ बहुत वर्षोंतक आपको पत्नी-वियोगका कष्ट सहना पड़ेगा’ ॥ १५½ ॥
शापाभिहतचेतास्तु स्वात्मना भावितोऽभवत् ॥ १६ ॥ अर्चयामास तं देवं भृगुः शापेन पीडितः ।
भावार्थ
‘परंतु इस प्रकार शाप देकर उनके चित्तमें बड़ा पश्चात्ताप हुआ । उनकी अन्तरात्माने भगवान्से उस शापको स्वीकार करानेके लिये उन्हींकी आराधना करनेको प्रेरित किया। इस तरह शापकी विफलताके भयसे पीड़ित हुए भृगुने तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना की ॥ १६½ ॥
तपसाऽऽराधितो देवो ह्यब्रवीद् भक्तवत्सलः ॥ १७ ॥ लोकानां सम्प्रियार्थं तु तं शापं गृह्यमुक्तवान् ।
भावार्थ
‘तपस्याद्वारा उनके आराधना करनेपर भक्तवत्सल भगवान् विष्णुने संतुष्ट होकर कहा——‘महर्षे ! सम्पूर्ण जगत्का प्रिय करनेके लिये मैं उस शापको ग्रहण कर लूँगा’ ॥ १७½॥
इति शप्तो महातेजा भृगुणा पूर्वजन्मनि ॥ १८ ॥ इहागतो हि पुत्रत्वं तव पार्थिवसत्तम । राम इत्यभिविख्यातस्त्रिषु लोकेषु मानद ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इस तरह पूर्वजन्ममें ( विष्णु-नामधारी वामन अवतारके समय ) महातेजस्वी भगवान् विष्णुको भृगु ऋषिका शाप प्राप्त हुआ था । दूसरोंको मान देनेवाले नृपश्रेष्ठ ! वे ही इस भूतलपर आकर तीनों लोकोंमें राम-नामसे विख्यात आपके पुत्र हुए हैं ॥ १८-१९ ॥
तत् फलं प्राप्स्यते चापि भृगुशापकृतं महत् । अयोध्यायाः पती रामो दीर्घकालं भविष्यति ॥ २० ॥
भावार्थ
‘भृगुके शापसे होनेवाला पत्नी-वियोगरूप जो महान् फल है, वह उन्हें अवश्य प्राप्त होगा । श्रीराम दीर्घकालतक अयोध्याके राजा होकर रहेंगे ॥ २० ॥
सुखिनश्च समृद्धाश्च भविष्यन्त्यस्य येऽनुगाः । दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥ २१ ॥ रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं गमिष्यति । समृद्धैरश्वमेधैश्च इष्ट्वा परमदुर्जयः ॥ २२ ॥ राजवंशांश्च बहुशो बहून् संस्थापयिष्यति । द्वौ पुत्रौ तु भविष्येते सीतायां राघवस्य तु ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘उनके अनुयायी भी बहुत सुखी और धन-धान्यसे सम्पन्न होंगे । श्रीराम ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य करके अन्तमें ब्रह्मलोक ( वैकुण्ठ या साकेत-धाम ) को पधारेंगे ॥ ‘परम दुर्जय वीर श्रीराम समृद्धिशाली अश्वमेध-यज्ञोंका बारंबार अनुष्ठान करके बहुत-से राजवंशोंकी स्थापना करेंगे । श्रीरघुनाथजीको सीताके गर्भसे दो पुत्र प्राप्त होंगे’ ॥२२-२३॥
स सर्वमखिलं राज्ञो वंशस्याह गतागतम् । आख्याय सुमहातेजास्तूष्णीमासीन्महामुनिः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘ये सब बातें कहकर उन महातेजस्वी महामुनिने राजवंश-के विषयमें भूत और भविष्यकी सारी बातें बतायीं । इसके बाद वे चुप हो गये ॥ २४॥
तूष्णींभूते तदा तस्मिन् राजा दशरथो मुनौ । अभिवाद्य महात्मानौ पुनरायात् पुरोत्तमम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘उन दुर्वासा मुनिके चुप हो जानेपर महाराज दशरथ भी दोनों महात्माओंको प्रणाम करके फिर अपने उत्तम नगरमें लौट आये ॥ २५ ॥
एतद् वचो मया तत्र मुनिना व्याहृतं पुरा । श्रुतं हृदि च निक्षिप्तं नान्यथा तद् भविष्यति ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार पूर्वकालसे दुर्वासा मुनिकी कही हुई ये सब बातें मैंने वहाँ सुनीं और अपने हृदयमें धारण कर लीं ( उन्हें किसीपर प्रकट नहीं किया )। वे बातें असत्य नहीं होंगी ॥२६॥
सीतायाश्च ततः पुत्रावभिषेक्ष्यति राघवः । अन्यत्र न त्वयोध्यायां मुनेस्तु वचनं यथा ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘जैसा दुर्वासा मुनिका वचन है, उसके अनुसार श्रीरघुनाथजी सीताके दोनों पुत्रोंका अयोध्यासे बाहर अभिषेक करेंगे, अयोध्यामें नहीं ॥ २७ ॥
एवं गते न संतापं कर्तुमर्हसि राघव । सीतार्थे राघवार्थे वा दृढो भव नरोत्तम ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन ! विधाताका ऐसा ही विधान होनेके कारण आपको सीता तथा रघुनाथजीके लिये संताप नहीं करना चाहिये । आप धैर्य धारण करें’ ॥ २८ ॥
श्रुत्वा तु व्याहृतं वाक्यं सूतस्य परमाद्भुतम् । प्रहर्षमतुलं लेभे साधु साध्विति चाब्रवीत् ॥ २९ ॥
भावार्थ
सूत सुमन्त्रके मुखसे यह अत्यन्त अद्भुत बात सुनकर लक्ष्मणको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ । वे बोले—‘बहुत ठीक, बहुत ठीक’ ॥ २९ ॥
ततः संवदतोरेवं सूतलक्ष्मणयोः पथि । अस्तमर्कं गते वासं केशिन्यां तावथोषतुः ॥ ३० ॥
भावार्थ
मार्गमें सुमन्त्र और लक्ष्मण इस प्रकारकी बातें कर ही रहे थे कि सूर्य अस्ताचलको चले गये । तब उन दोनोंने केशिनी नदीके तटपर रात बितायी ॥ ३० ॥
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