उत्तरकाण्ड, सर्ग 50
दृष्ट्वा तु मैथिलीं सीतामाश्रमे सम्प्रवेशिताम् । संतापमगद् घोरं लक्ष्मणो दीनचेतनः ॥ १ ॥
भावार्थ
मिथिलेशकुमारी सीताका मुनिके आश्रममें प्रवेश हो गया, यह देखकर लक्ष्मण मन-ही-मन बहुत दुखी हुए । उन्हें घोर संताप हुआ ॥ १ ॥
अब्रवीच्च महातेजाः सुमन्त्रं मन्त्रसारथिम् । सीतासंतापजं दुःखं पश्य रामस्य सारथे ॥ २ ॥
भावार्थ
उस समय महातेजस्वी लक्ष्मण मन्त्रणामें सहायता देनेवाले सारथि सुमन्त्रसे बोले—‘सूत ! देखो तो सही, श्रीरामको अभीसे सीताजीके विरहजनित संतापका कष्ट भोगना पड़ रहा है ॥ २ ॥
ततो दुःखतरं किं नु राघवस्य भविष्यति । पत्नीं शुद्धसमाचारां विसृज्य जनकात्मजाम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘भला, श्रीरघुनाथजीको इससे बढ़कर दुःख क्या होगा कि उन्हें अपनी पवित्र आचरणवाली धर्मपत्नी जनककिशोरी सीताका परित्याग करना पड़ा ॥ ३ ॥
व्यक्तं दैवादहं मन्ये राघवस्य विनाभवम् । वैदेह्या सारथे नित्यं दैवं हि दुरतिक्रमम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सारथे ! रघुनाथजीको सीताका जो यह नित्य वियोग प्राप्त हुआ है, इसमें मैं दैवको ही कारण मानता हूँ; क्योंकि दैवका विधान दुर्लङ्घ्य होता है ॥ ४॥
यो हि देवान् सगन्धर्वानसुरान् सह राक्षसैः । निहन्याद् राघवः क्रुद्धः स दैवं पर्युपासते ॥ ५ ॥ पुरा रामः पितुर्वाक्याद् दण्डके विजने वने । उषित्वा नव वर्षाणि पञ्च चैव महावने ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘जो श्रीरघुनाथजी कुपित होनेपर देवताओं, गन्धर्वों तथा राक्षसोंसहित असुरोंका भी संहार कर सकते हैं, वे ही दैवकी उपासना कर रहे हैं ( उसका निवारण नहीं कर पा रहे हैं)॥ ‘पहले श्रीरामचन्द्रजीको पिताके कहनेसे चौदह वर्षोंतक विशाल एवं निर्जन दण्डकवनमें रहना पड़ा है ॥ ६ ॥
ततो दुःखतरं भूयः सीताया विप्रवासनम् । पौराणां वचनं श्रुत्वा नृशंसं प्रतिभाति मे ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘अब उससे भी बढ़कर दुःखकी बात यह हुई कि उन्हें सीताजीको निर्वासित करना पड़ा । परंतु पुरवासियोंकी बात सुनकर ऐसा कर बैठना मुझे अत्यन्त निर्दयतापूर्ण कर्म जान पड़ता है ॥ ७ ॥
को नु धर्माश्रयः सूत कर्मण्यस्मिन् यशोहरे । मैथिलीं समनुप्राप्तः पौरैर्हीनार्थवादिभिः ॥ ८ ॥ एता वाचो बहुविधाः श्रुत्वा लक्ष्मणभाषिताः । सुमन्त्रः श्रद्धया प्राज्ञो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘सूत ! सीताजीके विषयमें अन्यायपूर्ण बात कहनेवाले इन पुरवासियोंके कारण ऐसे कीर्तिनाशक कर्ममें प्रवृत्त होकर श्रीरामचन्द्रजीने किस धर्मराशिका उपार्जन कर लिया है ?’ ॥ लक्ष्मणकी कही हुई इन अनेक प्रकारकी बातोंको सुनकर बुद्धिमान् सुमन्त्रने श्रद्धापूर्वक ये वचन कहे—॥ ९ ॥
न संतापस्त्वया कार्यः सौमित्रे मैथिलीं प्रति । दृष्टमेतत् पुरा विप्रैः पितुस्ते लक्ष्मणाग्रतः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! मिथिलेशकुमारी सीताके विषयमें आपको संतप्त नहीं होना चाहिये । लक्ष्मण ! यह बात ब्राह्मणोंने आपके पिताजीके सामने ही जान ली थी ॥ १०॥
भविष्यति दृढं रामो दुःखप्रायो विसौख्यभाक् । प्राप्स्यते च महाबाहुर्विप्रयोगं प्रियैर्द्रुतम् ॥ ११ ॥ त्वां चैव मैथिलीं चैव शत्रुघ्नभरतौ तथा । स त्यजिष्यति धर्मात्मा कालेन महता महान् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘उन दिनों दुर्वासाजीने कहा था कि ‘श्रीराम निश्चय ही अधिक दुःख उठायेंगे । प्रायः उनका सौख्य छिन जायगा । महाबाहु श्रीरामको शीघ्र ही अपने प्रियजनोंसे वियोग प्राप्त होगा॥ ‘सुमित्राकुमार ! धर्मात्मा महापुरुष श्रीराम दीर्घकाल बीतते-बीतते तुमको, मिथिलेशकुमारीको तथा भरत और शत्रुघ्नको भी त्याग देंगे ॥ १२ ॥
इदं त्वयि न वक्तव्यं सौमित्रे भरतेऽपि वा । राज्ञा वो व्याहृतं वाक्यं दुर्वासा यदुवाच ह ॥ १३ ॥ महाजनसमीपे च मम चैव नरर्षभ । ऋषिणा व्याहृतं वाक्यं वसिष्ठस्य च संनिधौ ॥ १४ ॥ ऋषेस्तु वचनं श्रुत्वा मामाह पुरुषर्षभः । सूत न कचिदेवं ते वक्तव्यं जनसंनिधौ ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘दुर्वासाने जो बात कही थी, उसे महाराज दशरथने तुमसे, शत्रुघ्नसे और भरतसे भी कहनेकी मनाही कर दी थी॥ ‘नरश्रेष्ठ ! दुर्वासामुनिने बहुत बड़े जनसमुदायके समीप मेरे समक्ष तथा महर्षि वसिष्ठके निकट वह बात कही थी ॥ ‘दुर्वासा मुनिकी वह बात सुनकर पुरुषप्रवर दशरथने मुझसे कहा था कि ‘सूत ! तुम्हें दूसरे लोगोंके सामने इस तरहकी बात नहीं कहनी चाहिये’ ॥ १५ ॥
तस्याहं लोकपालस्य वाक्यं तत्सुसमाहितः । नैव जात्वनृतं कुर्यामिति मे सौम्य दर्शनम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! उन लोकपालक दशरथके उस वाक्यको मैं झूठा न करूँ’ यह मेरा संकल्प है । इसके लिये मैं सदा सावधान रहता हूँ ॥ १६ ॥
सर्वथैव न वक्तव्यं मया सौम्य तवाग्रतः । यदि ते श्रवणे श्रद्धा श्रूयतां रघुनन्दन ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘सौम्य रघुनन्दन ! यद्यपि यह बात मुझे आपके सामने सर्वथा ही नहीं कहनी चाहिये, तथापि यदि आपके मनमें यह सुननेके लिये श्रद्धा ( उत्सुकता ) हो तो सुनिये ॥ १७ ॥
यद्यप्यहं नरेन्द्रेण रहस्यं श्रावितं पुरा । तथाप्युदाहरिष्यामि दैवं हि दुरतिक्रमम् ॥ १८ ॥ येनेदमीदृशं प्राप्तं दुःखं शोकसमन्वितम् । न त्वया भरतस्याग्रे शत्रुघ्नस्यापि संनिधौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘यद्यपि पूर्वकालमें महाराजने इस रहस्यको दूसरोंपर प्रकट न करनेके लिये आदेश दिया था, तथापि आज मैं वह बात कहूँगा । दैवके विधानको लाँघना बहुत कठिन है; जिससे यह दुःख और शोक प्राप्त हुआ है । भैया ! तुम्हें भी भरत और शत्रुघ्नके सामने यह बात नहीं कहनी चाहिये’ ॥ १८-१९ ॥
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य गम्भीरार्थपदं महत् । तथ्यं ब्रूहीति सौमित्रिः सूतं तं वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥
भावार्थ
सुमन्त्रका यह गम्भीर भाषण सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने कहा—‘सुमन्त्रजी ! जो सच्ची बात हो, उसे आप अवश्य कहिये’ ॥ २० ॥
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