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उत्तरकाण्ड, सर्ग 44

विसृज्य तु सुहृद्वर्गं बुद्ध्या निश्चित्य राघवः । समीपे द्वाःस्थमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

मित्रमण्डलीको विदा करके श्रीरघुनाथजीने बुद्धिसे विचारकर अपना कर्तव्य निश्चित किया और निकटवर्ती द्वारपालसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

शीघ्रमानय सौमित्रिं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् । भरतं च महाभागं शत्रुघ्नमपराजितम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘तुम जाकर शीघ्र ही महाभाग भरत, सुमित्राकुमार शुभलक्षण लक्ष्मण तथा अपराजित वीर शत्रुघ्नको भी यहाँ बुला लाओ’ ॥ २ ॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा द्वाःस्थो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः । लक्ष्मणस्य गृहं गत्वा प्रविवेशानिवारितः ॥ ३ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर द्वारपालने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर उन्हें प्रणाम किया और लक्ष्मणके घर जाकर बेरोक-टोक उसके भीतर प्रवेश किया ॥ ३ ॥

उवाच सुमहात्मानं वर्धयित्वा कृताञ्जलिः । द्रष्टुमिच्छति राजा त्वां गम्यतां तत्र मा चिरम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

वहाँ हाथ जोड़ जय-जयकार करते हुए उसने महात्मा लक्ष्मणसे कहा—‘कुमार ! महाराज आपसे मिलना चाहते हैं । अतः शीघ्र चलिये, विलम्ब न कीजिये’ ॥ ४ ॥

बाढमित्येव सौमित्रिः कृत्वा राघवशासनम् । प्राद्रवद् रथमारुह्य राघवस्य निवेशनम् ॥ ५ ॥ प्रयान्तं लक्ष्मणं दृष्ट्वा द्वाःस्थो भरतमन्तिकात् । उवाच भरतं तत्र वर्धयित्वा कृताञ्जलिः ॥ ६ ॥ विनयावनतो भूत्वा राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ।

भावार्थ

तब सुमित्राकुमार लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीके आदेशको शिरोधार्य किया और तत्काल रथपर बैठकर वे श्रीरघुनाथजीके महलकी ओर तीव्रगतिसे चले ॥ लक्ष्मणको जाते देख द्वारपाल भरतके पास गया और उन्हें हाथ जोड़ वहाँ जय-जयकार करके विनीतभावसे बोला— ‘प्रभो ! महाराज आपसे मिलना चाहते हैं’ ॥ ६½ ॥

भरतस्तु वचः श्रुत्वा द्वाःस्थाद् रामसमीरितम् ॥ ७ ॥ उत्पपातासनात् तूर्णं पद्भ्यामेव महाबलः ।

भावार्थ

श्रीरामके भेजे हुए द्वारपालके मुखसे यह बात सुनकर महाबली भरत तुरंत अपने आसनसे उठ खड़े हुए और पैदल ही चल दिये ॥ ७½ ॥

दृष्ट्वा प्रयान्तं भरतं त्वरमाणः कृताञ्जलिः ॥ ८ ॥ शत्रुघ्नभवनं गत्वा ततो वाक्यमुवाच ह ।

भावार्थ

भरतको जाते देख द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ शत्रुघ्नके भवनमें गया और हाथ जोड़कर बोला—॥ ८½ ॥

पद्यागच्छ रघुश्रेष्ठ राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ॥ ९ ॥ गतो हि लक्ष्मणः पूर्वं भरतश्च महायशाः ।

भावार्थ

‘रघुश्रेष्ठ ! आइये, चलिये, राजा श्रीराम आपको देखना चाहते हैं । श्रीलक्ष्मणजी और महायशस्वी भरतजी पहले ही जा चुके हैं’ ॥ ९½ ॥

श्रुत्वा तु वचनं तस्य शत्रुघ्नः परमासनात् ॥ १० ॥ शिरसा वन्द्य धरणीं प्रययौ यत्र राघवः ।

भावार्थ

द्वारपालकी बात सुनकर शत्रुघ्न अपने उत्तम आसनसे उठे और धरतीपर माथा टेककर मन-ही-मन श्रीरामकी वन्दना करके तुरंत उनके निवासस्थानकी ओर चल दिये ॥१०½॥

द्वाःस्थस्त्वागम्य रामाय सर्वानेव कृताञ्जलिः ॥ ११ ॥ निवेदयामास तथा भ्रातॄन् स्वान् समुपस्थितान् ।

भावार्थ

द्वारपालने आकर श्रीरामसे हाथ जोड़कर निवेदन किया कि ‘प्रभो ! आपके सभी भाई द्वारपर उपस्थित हैं’ ॥ ११½ ॥

कुमारानागतान्छ्रुत्वा चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः ॥ १२ ॥ अवाङ्मुखो दीनमना द्वाःस्थं वचनमब्रवीत् । प्रवेशय कुमारांस्त्वं मत्समीपं त्वरान्वितः ॥ १३ ॥ एतेषु जीवितं मह्यमेते प्राणाः प्रिया मम ।

भावार्थ

कुमारोंका आगमन सुनकर चिन्तासे व्याकुल इन्द्रियवाले श्रीरामने नीचे मुख किये दुखी मनसे द्वारपालको आदेश दिया—‘तुम तीनों राजकुमारोंको जल्दी मेरे पास ले आओ । मेरा जीवन इन्हींपर अवलम्बित है । ये मेरे प्यारे प्राणस्वरूप हैं’ ॥ १२–१३½ ॥

आज्ञप्तास्तु नरेन्द्रेण कुमाराः शुक्लवाससः ॥ १४ ॥ प्रह्वाः प्राञ्जलयो भूत्वा विविशुस्ते समाहिताः ।

भावार्थ

महाराजकी आज्ञा पाकर वे श्वेत वस्त्रधारी कुमार सिर झुकाये हाथ जोड़े एकाग्रचित्त हो भवनके भीतर गये ॥१४½॥

ते तु दृष्ट्वा मुखं तस्य सग्रहं शशिनं यथा ॥ १५ ॥ संध्यागतमिवादित्यं प्रभया परिवर्जितम् ।

भावार्थ

उन्होंने श्रीरामका मुख इस तरह उदास देखा, मानो चन्द्रमापर ग्रह लग गया हो । वह संध्याकालके सूर्यकी भाँति प्रभाशून्य हो रहा था ॥ १५½ ॥

बाष्पपूर्णे च नयने दृष्ट्वा रामस्य धीमतः । हतशोभं यथा पद्मं मुखं वीक्ष्य च तस्य ते ॥ १६ ॥

भावार्थ

उन्होंने बारबार देखा बुद्धिमान् श्रीरामके दोनों नेत्रोंमें आँसू भर आये थे और उनके मुखारविन्दकी शोभा छिन गयी थी ॥ १६ ॥

ततोऽभिवाद्य त्वरिताः पादौ रामस्य मूर्धभिः । तस्थुः समाहिताः सर्वे रामस्त्वश्रूण्यवर्तयत् ॥ १७ ॥

भावार्थ

तदनन्तर उन तीनों भाइयोंने तुरंत श्रीरामके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया । फिर वे सब-के-सब प्रेममें समाधिस्थ-से होकर पड़ गये । उस समय श्रीराम आँसू बहा रहे थे ॥ १७ ॥

तान् परिष्वज्य बाहुभ्यामुत्थाप्य च महाबलः । आसनेष्वासतेत्युक्त्वा ततो वाक्यं जगाद ह ॥ १८ ॥

भावार्थ

महाबली रघुनाथजीने दोनों भुजाओंसे उठाकर उन सबका आलिङ्गन किया और कहा—‘इन आसनोंपर बैठो ।’ जब वे बैठ गये, तब उन्होंने फिर कहा—॥ १८ ॥

भवन्तो मम सर्वस्वं भवन्तो जीवितं मम । भवद्भिश्च कृतं राज्यं पालयामि नरेश्वराः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘राजकुमारो ! तुमलोग मेरे सर्वस्व हो । तुम्हीं मेरे जीवन हो और तुम्हारे द्वारा सम्पादित इस राज्यका मैं पालन करता हूँ ॥ १९ ॥

भवन्तः कृतशास्त्रार्था बुद्ध्या च परिनिष्ठिताः । सम्भूय च मदर्थोऽयमन्वेष्टव्यो नरेश्वराः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘नरेश्वरो ! तुम सभी शास्त्रोंके ज्ञाता और उनमें बताये कर्तव्यका पालन करनेवाले हो । तुम्हारी बुद्धि भी परिपक्व है । इस समय मैं जो कार्य तुम्हारे सामने उपस्थित करनेवाला हूँ, उसका तुम सबको मिलकर सम्पादन करना चाहिये’ ॥ २० ॥

तथा वदति काकुत्स्थे अवधानपरायणाः । उद्विग्नमनसः सर्वे किं नु राजाभिधास्यति ॥ २१ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सभी भाई चौकन्ने हो गये । सबका चित्त उद्विग्न हो गया और सभी सोचने लगे— ‘न जाने महाराज हमसे क्या कहेंगे ?’ ॥ २१ ॥

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