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उत्तरकाण्ड, सर्ग 43

तत्रोपविष्टं राजानमुपासन्ते विचक्षणाः । कथानां बहुरूपाणां हास्यकाराः समन्ततः ॥ १ ॥

भावार्थ

वहाँ बैठे हुए महाराज श्रीरामके पास अनेक प्रकारकी कथाएँ कहनेमें कुशल हास्यविनोद करनेवाले सखा सब ओरसे आकर बैठते थे ॥ १ ॥

विजयो मधुमत्तश्च काश्यपो मङ्गलः कुलः । सुराजिः कालियो भद्रो दन्तवक्त्रः सुमागधः ॥ २ ॥

भावार्थ

उन सखाओंके नाम इस प्रकार हैं—विजय, मधुमत्त, काश्यप, मङ्गल, कुल, सुराजि, कालिय, भद्र, दन्तवक्त्र और सुमागध ॥ २ ॥

एते कथा बहुविधाः परिहाससमन्विताः । कथयन्ति स्म संहृष्टा राघवस्य महात्मनः ॥ ३ ॥ ततः कथायां कस्यांचिद् राघवः समभाषत । काः कथा नगरे भद्र वर्तन्ते विषयेषु च ॥ ४ ॥

भावार्थ

ये सब लोग बड़े हर्षसे भरकर महात्मा श्रीरघुनाथजीके सामने अनेक प्रकारकी हास्य-विनोदपूर्ण कथाएँ कहा करते थे ॥ इसी समय किसी कथाके प्रसङ्गमें श्रीरघुनाथजीने पूछा— ‘भद्र ! आजकल नगर और राज्यमें किस बातकी चर्चा विशेष रूपसे होती है ॥ ४ ॥

मामाश्रितानि कान्याहुः पौरजानपदा जनाः । किं च सीतां समाश्रित्य भरतं किं च लक्ष्मणम् ॥ ५ ॥ किं नु शत्रुघ्नमुद्दिश्य कैकेयीं किं नु मातरम् । वक्तव्यतां च राजानो वने राज्ये व्रजन्ति च ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘नगर और जनपदके लोग मेरे, सीताके, भरतके, लक्ष्मणके तथा शत्रुघ्न और माता कैकेयीके विषयमें क्या-क्या बातें करते हैं ? क्योंकि राजा यदि आचार-विचारसे हीन हों तो वे अपने राज्यमें तथा वनमें ( ऋषि-मुनियोंके आश्रममें ) भी निन्दाके विषय बन जाते हैं—सर्वत्र उन्हींकी बुराइयोंकी चर्चा होती है’ ॥ ५-६ ॥

एवमुक्ते तु रामेण भद्रः प्राञ्जलिरब्रवीत् । स्थिताः शुभाः कथा राजन् वर्तन्ते पुरवासिनाम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भद्र हाथ जोड़कर बोला— ‘महाराज ! आजकल पुरवासियोंमें आपको लेकर सदा अच्छी ही चर्चाएँ चलती हैं’ ॥ ७ ॥

अमुं तु विजयं सौम्य दशग्रीववधार्जितम् । भूयिष्ठं स्वपुरे पौरैः कथ्यन्ते पुरुषर्षभ ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! पुरुषोत्तम ! दशग्रीव-वधसम्बन्धी जो आपकी विजय है, उसको लेकर नगरमें सब लोग अधिक बातें किया करते हैं’ ॥ ८ ॥

एवमुक्तस्तु भद्रेण राघवो वाक्यमब्रवीत् । कथयस्व यथातत्त्वं सर्वं निरवशेषतः ॥ ९ ॥ शुभाशुभानि वाक्यानि कान्याहुः पुरवासिनः । श्रुत्वेदानीं शुभं कुर्यां न कुर्यामशुभानि च ॥ १० ॥

भावार्थ

भद्रके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने कहा—‘पुरवासी मेरे विषयमें कौन-कौन-सी शुभ या अशुभ बातें कहते हैं, उन सबको यथार्थरूपसे पूर्णतः बताओ । इस समय उनकी शुभ बातें सुनकर जिन्हें वे शुभ मानते हैं उनका मैं आचरण करूँगा और अशुभ बातें सुनकर जिन्हें वे अशुभ समझते हैं, उन कृत्योंको त्याग दूँगा ॥ ९-१० ॥

कथयस्व च विस्रब्धो निर्भयं विगतज्वरः । कथयन्ति यथा पौराः पापा जनपदेषु च ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘तुम विश्वस्त और निश्चिन्त होकर बेखटके कहो । पुरवासी और जनपदके लोग मेरे विषयमें किस प्रकार अशुभ चर्चाएँ करते हैं’ ॥ ११ ॥

राघवेणैवमुक्तस्तु भद्रः सुरुचिरं वचः । प्रत्युवाच महाबाहुं प्राञ्जलिः सुसमाहितः ॥ १२ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भद्रने हाथ जोड़कर एकाग्रचित्त हो उन महाबाहु श्रीरामसे यह परम सुन्दर बात कही—॥ १२ ॥

शृणु राजन् यथा पौराः कथयन्ति शुभाशुभम् । चत्वरापणरथ्यासु वनेषूपवनेषु च ॥ १३ ॥ दुष्करं कृतवान् रामः समुद्रे सेतुबन्धनम् । अश्रुतं पूर्वकैः कैश्चिद् देवैरपि सदानवैः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! सुनिये, पुरवासी मनुष्य चौराहोंपर, बाजारमें, सड़कोंपर तथा वन और उपवनमें भी आपके विषयमें किस प्रकार शुभ और अशुभ बातें कहते हैं ! यह बता रहा हूँ।१३। ‘वे कहते हैं ‘श्रीरामने समुद्रपर पुल बाँधकर दुष्कर कर्म किया है । ऐसा कर्म तो पहलेके किन्हीं देवताओं और दानवोंने भी नहीं सुना होगा ॥ १४ ॥

रावणश्च दुराधर्षो हतः सबलवाहनः । वानराश्च वशं नीता ऋक्षाश्च सह राक्षसैः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामद्वारा दुर्धर्ष रावण सेना और सवारियोंसहित मारा गया तथा राक्षसोंसहित रीछ और वानर भी वशमें कर लिये गये ॥ १५ ॥

हत्वा च रावणं संख्ये सीतामाहृत्य राघवः । अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा स्ववेश्म पुनरानयत् ॥ १६ ॥

भावार्थ

“परंतु एक बात खटकती है, युद्धमें रावणको मारकर श्रीरघुनाथजी सीताको अपने घर ले आये । उनके मनमें सीताके चरित्रको लेकर रोष या अमर्ष नहीं हुआ ॥ १६ ॥

कीदृशं हृदये तस्य सीतासम्भोगजं सुखम् । अङ्कमारोप्य तु पुरा रावणेन बलाद्धृताम् ॥ १७ ॥ लङ्कामपि पुरा नीतामशोकवनिकां गताम् । रक्षसां वशमापन्नां कथं रामो न कुत्स्यति ॥ १८ ॥ अस्माकमपि दारेषु सहनीयं भविष्यति । यथा हि कुरुते राजा प्रजास्तमनुवर्तते ॥ १९ ॥

भावार्थ

“उनके हृदयमें सीता-सम्भोगजनित सुख कैसा लगता होगा ? पहले रावणने बलपूर्वक सीताको गोदमें उठाकर उनका अपहरण किया था; फिर वह उन्हें लङ्कामें भी ले गया और वहाँ उसने अन्तःपुरके क्रीडा-कानन अशोकवनिकामें रक्खा । इस प्रकार राक्षसोंके वशमें होकर वे बहुत दिनोंतक रहीं तो भी श्रीराम उनसे घृणा क्यों नहीं करते हैं । अब हमलोगोंको भी स्त्रियोंकी ऐसी बातें सहनी पड़ेंगी; क्योंकि राजा जैसा करता है, प्रजा भी उसीका अनुकरण करने लगती है’ ॥१७–१९॥

एवं बहुविधा वाचो वदन्ति पुरवासिनः । नगरेषु च सर्वेषु राजन् जनपदेषु च ॥ २० ॥

भावार्थ

‘राजन् ! इस प्रकार सारे नगर और जनपदमें पुरवासी मनुष्य बहुत-सी बातें कहते हैं’ ॥ २० ॥

तस्यैवं भाषितं श्रुत्वा राघवः परमार्तवत् । उवाच सुहृदः सर्वान् कथमेतद् वदन्तु माम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

भद्रकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त पीड़ित होकर समस्त सुहृदोंसे पूछा—‘आपलोग भी मुझे बतावें, यह कहाँतक ठीक है’ ॥ २१ ॥

सर्वे तु शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च । प्रत्यूचू राघवं दीनमेवमेतन्न संशयः ॥ २२ ॥

भावार्थ

तब सबने घरतीपर मस्तक टेककर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके दीनतापूर्ण वाणीमें कहा—‘प्रभो ! भद्रका यह कथन ठीक है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है’ ॥२२ ॥

श्रुत्वा तु वाक्यं काकुत्स्थः सर्वेषां समुदीरितम् । विसर्जयामास तदा वयस्यांश्छत्रुसूदनः ॥ २३ ॥

भावार्थ

सबके मुखसे यह बात सुनकर शत्रुसूदन श्रीरामने तत्काल उन सब सुहृदोंको विदा कर दिया ॥ २३ ॥

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