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उत्तरकाण्ड, सर्ग 41

विसृज्य च महाबाहुऋर्क्षवानरराक्षसान् । भ्रातृभिः सहितो रामः प्रमुमोद सुखं सुखी ॥ १ ॥

भावार्थ

रीछों, वानरों और राक्षसोंको बिदा करके भाइयोंसहित सुखस्वरूप महाबाहु श्रीराम सुख और आनन्दपूर्वक वहाँ रहने लगे ॥ १ ॥

अथापराह्णसमये भ्रातृभिः सह राघवः । शुश्राव मधुरां वाणीमन्तरिक्षान्महाप्रभुः ॥ २ ॥

भावार्थ

एक दिन अपराह्णकालमें ( दोपहरके बाद ) अपने भाइयोंके साथ बैठे हुए महाप्रभु श्रीरघुनाथजीने आकाशसे यह मधुर वाणी सुनी—॥ २ ॥

सौम्य राम निरीक्षस्व सौम्येन वदनेन माम् । कुबेरभवनात् प्राप्तं विद्धि मां पुष्पकं प्रभो ॥ ३ ॥ तव शासनमाज्ञाय गतोऽस्मि भवनं प्रति । उपस्थातुं नरश्रेष्ठ स च मां प्रत्यभाषत ॥ ४ ॥ निर्जितस्त्वं नरेन्द्रेण राघवेण महात्मना । निहत्य युधि दुर्धर्षं रावणं राक्षसेश्वरम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘सौम्य श्रीराम ! आप मेरी ओर प्रसन्नतापूर्ण मुखसे दृष्टिपात करनेकी कृपा करें । प्रभो ! आपको विदित होना चाहिये कि मैं कुबेरके भवनसे लौटा हुआ पुष्पकविमान हूँ ॥ ‘नरश्रेष्ठ ! आपकी आज्ञा मानकर मैं कुबेरकी सेवाके लिये उनके भवनमें गया था; परंतु उन्होंने मुझसे कहा—॥ ‘‘विमान ! महात्मा महाराज श्रीरामने युद्धमें दुर्धर्ष राक्षसराज रावणको मारकर तुम्हें जीता है ॥ ५ ॥

ममापि परमा प्रीतिर्हते तस्मिन् दुरात्मनि । रावणे सगणे चैव सपुत्रे सहबान्धवे ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘‘पुत्रों, बन्धु-बान्धवों तथा सेवकगणोंसहित उस दुरात्मा रावणके मारे जानेसे मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ ६ ॥

स त्वं रामेण लङ्कायां निर्जितः परमात्मना । वह सौम्य तमेव त्वमहमाज्ञापयामि ते ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘‘सौम्य ! इस तरह परमात्मा श्रीरामने लङ्कामें रावणके साथ-साथ तुमको भी जीत लिया है; अतः मैं आज्ञा देता हूँ, तुम उन्हींकी सवारीमें रहो ॥ ७ ॥

परमो ह्येष मे कामो यत् त्वं राघवनन्दनम् । वहेल्लोकस्य संयानं गच्छस्व विगतज्वरः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम सम्पूर्ण जगत्के आश्रय हैं । तुम उनकी सवारीके काम आओ—यह मेरी सबसे बड़ी कामना है । इसलिये तुम निश्चिन्त होकर जाओ’ ॥ ८ ॥

सोऽहं शासनमाज्ञाय धनदस्य महात्मनः । त्वत्सकाशमनुप्राप्तो निर्विशङ्कः प्रतीच्छ माम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार मैं महात्मा कुबेरकी आज्ञा पाकर ही आपके पास आया हूँ, अतः आप मुझे निःशङ्क होकर ग्रहण करें ॥९॥

अधृष्यः सर्वभूतानां सर्वेषां धनदाज्ञया । चराम्यहं प्रभावेण तवाज्ञां परिपालयन् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘मैं सभी प्राणियोंके लिये अजेय हूँ और कुबेरकी आज्ञाके अनुसार मैं आपके आदेशका पालन करता हुआ अपने प्रभावसे समस्त लोकोंमें विचरण करूँगा’ ॥ १० ॥

एवमुक्तस्तदा रामः पुष्पकेण महाबलः । उवाच पुष्पकं दृष्ट्वा विमानं पुनरागतम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

पुष्पकके ऐसा कहनेपर महाबली श्रीरामने उस विमानको पुनः आया देख उससे कहा—॥ ११ ॥

यद्येवं स्वागतं तेऽस्तु विमानवर पुष्पक । आनुकूल्याद् धनेशस्य वृत्तदोषो न नो भवेत् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘विमानराज पुष्पक ! यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ । कुबेरकी अनुकूलता होनेसे हमें मर्यादा-भङ्गका दोष नहीं लगेगा’ ॥ १२ ॥

लाजैश्चैव तथा पुष्पैर्धूपैश्चैव सुगन्धिभिः । पूजयित्वा महाबाहू राघवः पुष्पकं तदा ॥ १३ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर महाबाहु श्रीरामने लावा, फूल, धूप और चन्दन आदिके द्वारा पुष्पकका पूजन किया ॥ १३ ॥

गम्यतामिति चोवाच आगच्छ त्वं स्मरे यदा । सिद्धानां च गतौ सौम्य मा विषादेन योजय ॥ १४ ॥ प्रतिघातश्च ते मा भूद् यथेष्टं गच्छतो दिशः ।

भावार्थ

और कहा—‘अब तुम जाओ । जब मैं स्मरण करूँ, तब आ जाना । आकाशमें रहना और अपनेको मेरे वियोगसे दुखी न होने देना ( मैं यथासमय तुम्हारा उपयोग करता रहूँगा ) । स्वेच्छासे सम्पूर्ण दिशाओंमें जाते समय तुम्हारी किसीसे टक्कर न हो अथवा तुम्हारी गति कहीं प्रतिहत न हो’ ॥ १४½ ॥

एवमस्त्विति रामेण पूजयित्वा विसर्जितम् ॥ १५ ॥ अभिप्रेतां दिशं तस्मात् प्रयात् तत् पुष्पकं तदा ।

भावार्थ

पुष्पकने ‘एवमस्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली । इस प्रकार श्रीरामने उसका पूजन करके जब उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह पुष्पक वहाँसे अपनी अभीष्ट दिशाको चला गया ॥ १५½ ॥

एवमन्तर्हिते तस्मिन् पुष्पके सुकृतात्मनि ॥ १६ ॥ भरतः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच रघुनन्दनम् ।

भावार्थ

इस प्रकार पुण्यमय पुष्पकविमानके अदृश्य हो जानेपर भरतजीने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥ १६½ ॥

त्रिबुधात्मनि दृश्यन्ते त्वयि वीर प्रशासति ॥ १७ ॥ अमानुषाणि सत्त्वानि व्याहृतानि मुहुर्मुहुः।

भावार्थ

‘वीरवर ! आप देवस्वरूप हैं। इसीलिये आपके शासनकालमें मनुष्येतर प्राणी भी बारंबार मनुष्योंके समान सम्भाषण करते देखे जाते हैं ॥ १७½ ॥

अनामयश्च मर्त्यानां साग्रो मासो गतो ह्ययम् ॥ १८ ॥ जीर्णानामपि सत्त्वानां मृत्युर्नायाति राघव। अरोगप्रसवा नार्यो वपुष्मन्तो हि मानवाः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘आपके राज्यपर अभिषिक्त हुए एक माससे अधिक हो गया, तबसे सभी लोग नीरोग दिखायी देते हैं । बूढ़े प्राणियोंके पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियाँ बिना कष्ट सहे प्रसव करती हैं । सभी मनुष्योंके शरीर हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते हैं ॥ १८-१९ ॥

हर्षश्चाभ्यधिको राजन्ननस्य पुरवासिनः। काले वर्षति पर्जन्यः पातयन्नमृतं पयः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘राजन् ! पुरवासियोंमें बड़ा हर्ष छा रहा है। मेघ अमृतके समान जल गिराते हुए समयपर वर्षा करते हैं ॥२०॥

वाताश्चापि प्रवान्त्येते स्पर्शयुक्ताः सुखाः शिवाः। ईदृशो नचिरं राजा भवेदिति नरेश्वरः ॥ २१ ॥ कथयन्ति पुरे राजन् पौरजानपदास्तथा।

भावार्थ

‘हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है। राजन् ! नगर और जनपदके लोग इस पुरीमें कहते हैं कि हमारे लिये चिरकालतक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें’ ॥ २१½ ॥

एता वाचः सुमधुरा भरतेन समीरिताः। श्रुत्वा रामो मुदा युक्तो बभूव नृपसत्तमः ॥ २२ ॥

भावार्थ

भरतकी कही हुई ये सुमधुर बातें सुनकर नृपश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए ॥ २२ ॥

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