Ramayana.com

उत्तरकाण्ड, सर्ग 40

तथा स्म तेषां वसतामृक्षवानररक्षसाम् । राघवस्तु महातेजाः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

इस तरह वहाँ सुखपूर्वक निवास करते हुए रीछों, वानरों और राक्षसोंमेंसे सुग्रीवको सम्बोधित करके महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीने इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

गम्यतां सौम्य किष्किन्धां दुराधर्षां सुरासुरैः । पालयस्व सहामात्यै राज्यं निहतकण्टकम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! अब तुम देवताओं तथा असुरोंके लिये भी दुर्जय किष्किन्धापुरीको जाओ और वहाँ मन्त्रियोंके साथ रहकर अपने निष्कण्टक राज्यका पालन करो ॥ २ ॥

अङ्गदं च महाबाहो प्रीत्या परमया युतः । पश्य त्वं हनुमन्तं च नलं च सुमहाबलम् ॥ ३ ॥ सुषेणं श्वशुरं वीरं तारं च बलिनां वरम् । कुमुदं चैव दुर्धर्षं नीलं चैव महाबलम् ॥ ४ ॥ वीरं शतबलिं चैव मैन्दं द्विविदमेव च । गजं गवाक्षं गवयं शरभं च महाबलम् ॥ ५ ॥ ऋक्षराजं च दुर्धर्षं जाम्बवन्तं महाबलम् । पश्य प्रीतिसमायुक्तो गन्धमादनमेव च ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! अङ्गद और हनुमान्को भी तुम अत्यन्त प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखना । महाबली नल, अपने श्वशुर वीर सुषेण, बलवानोंमें श्रेष्ठ तार, दुर्धर्ष वीर कुमुद, महाबली नील, वीर शतबलि, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, महाबली शरभ, महान् बल-पराक्रमसे युक्त दुर्जय वीर ऋक्षराज जाम्बवान् तथा गन्धमादनपर भी तुम प्रेमपूर्ण दृष्टि रखना ॥ ३–६ ॥

ऋषभं च सुविक्रान्तं प्लवङ्गं च सुपाटलम् । केसरिं शरभं शुम्भं शङ्खचूडं महाबलम् ॥ ७ ॥ ये ये मे सुमहात्मानो मदर्थे त्यक्तजीविताः । पश्य त्वं प्रीतिसंयुक्तो मा चैषां विप्रियं कृथाः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘परम पराक्रमी ऋषभ, वानर सुपाटल, केसरी, शरभ, शुम्भ तथा महाबली शंखचूडको भी प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखना ॥ ‘इनके सिवा जिन-जिन महामनस्वी वानरोंने मेरे लिये अपने प्राणोंकी बाजी लगा दी थी, उन सबपर तुम प्रेमदृष्टि रखना । कभी उनका अप्रिय न करना’ ॥ ८ ॥

एवमुक्त्वा च सुग्रीवमाश्लिष्य च पुनः पुनः । विभीषणमुवाचाथ रामो मधुरया गिरा ॥ ९ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर श्रीरामने सुग्रीवको बारंबार हृदयसे लगाया और फिर मधुर वाणीमें विभीषणसे कहा—॥ ९ ॥

लङ्कां प्रशाधि धर्मेण धर्मज्ञस्त्वं मतो मम । पुरस्य राक्षसानां च भ्रातुर्वैश्रवणस्य च ॥ १० ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! तुम धर्मपूर्वक लङ्काका शासन करो । मैं तुम्हें धर्मज्ञ मानता हूँ । तुम्हारे नगरके लोग, सब राक्षस तथा तुम्हारे भाई कुबेर भी तुम्हें धर्मज्ञ ही समझते हैं ॥ १० ॥

मा च बुद्धिमधर्मे त्वं कुर्या राजन् कथंचन । बुद्धिमन्तो हि राजानो ध्रुवमश्नन्ति मेदिनीम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! तुम किसी तरह भी अधर्ममें मन न लगाना । जिनकी बुद्धि ठीक है, वे राजा निश्चय ही दीर्घकालतक पृथ्वीका राज्य भोगते हैं ॥ ११ ॥

अहं च नित्यशो राजन् सुग्रीवसहितस्त्वया । स्मर्तव्यः परया प्रीत्या गच्छ त्वं विगतज्वरः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! तुम सुग्रीवसहित मुझे सदा याद रखना । अब निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे जाओ’ ॥१२ ॥

रामस्य भाषितं श्रुत्वा ऋक्षवानरराक्षसाः । साधुसाध्विति काकुत्स्थं प्रशशंसुः पुनः पुनः ॥ १३ ॥ तव बुद्धिर्महाबाहो वीर्यमद्भुतमेव च । माधुर्यं परमं राम स्वयम्भोरिव नित्यदा ॥ १४ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीका यह भाषण सुनकर रीछों, वानरों और राक्षसोंने ‘धन्य-धन्य’ कहकर उनकी बारंबार प्रशंसा की ॥ वे बोले—‘महाबाहु श्रीराम ! स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान आपके स्वभावमें सदा परम मधुरता रहती है । आपकी बुद्धि और पराक्रम अद्भुत हैं’ ॥ १४ ॥

तेषामेवं ब्रुवाणानां वानराणां च रक्षसाम् । हनूमान् प्रणतो भूत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

वानर और राक्षस जब ऐसा कह रहे थे, उसी समय हनुमान्जी विनम्र होकर श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ १५ ॥

स्नेहो मे परमो राजंस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा । भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! आपके प्रति मेरा महान् स्नेह सदा बना रहे । वीर ! आपमें ही मेरी निश्चल भक्ति रहे । आपके सिवा और कहीं मेरा आन्तरिक अनुराग न हो ॥ १६ ॥

यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले । तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशयः ॥ १७ ॥ यच्चैतच्चरितं दिव्यं कथा ते रघुनन्दन । तन्मम्माप्सरसो राम श्रावयेयुर्नरर्षभ ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘वीर श्रीराम ! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक निःसंदेह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें ॥ ‘रघुकुलनन्दन नरश्रेष्ठ श्रीराम! आपका जो यह दिव्य चरित्र और कथा है, इसे अप्सराएँ मुझे गाकर सुनाया करें ॥१८॥

तच्छ्रुत्वाहं ततो वीर तव चर्यामृतं प्रभो । उत्कण्ठां तां हरिष्यामि मेघलेखामिवानिलः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘वीर प्रभो ! आपके उस चरितामृतको सुनकर मैं अपनी उत्कण्ठाको उसी तरह दूर करता रहूँगा, जैसे वायु बादलोंकी पंक्तिको उड़ाकर दूर ले जाती है’ ॥ १९ ॥

एवं ब्रुवाणं रामस्तु हनूमन्तं वरासनात् । उत्थाय सस्वजे स्नेहाद् वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २० ॥

भावार्थ

हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने श्रेष्ठ सिंहासनसे उठकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और स्नेहपूर्वक इस प्रकार कहा—॥ २० ॥

एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः । चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका ॥ २१ ॥ तावत् ते भविता कीर्तिः शरीरेऽप्यसवस्तथा । लोका हि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति मे कथाः ॥

भावार्थ

‘कपिश्रेष्ठ ! ऐसा ही होगा, इसमें संशय नहीं है। संसारमें मेरी कथा जबतक प्रचलित रहेगी, तबतक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीरमें प्राण भी रहेंगे ही। जबतक ये लोक बने रहेंगे, तबतक मेरी कथाएँ भी स्थिर रहेंगी ॥ २१-२२ ॥

एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे । शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘कपे ! तुमने जो उपकार किये हैं, उनमेंसे एक-एकके लिये मैं अपने प्राण निछावर कर सकता हूँ । तुम्हारे शेष उपकारोंके लिये तो मैं ऋणी ही रह जाऊँगा ॥ २३ ॥

मदङ्गे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे । नरः प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘कपिश्रेष्ठ ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो-जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीरमें ही पच जायँ । उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि पुरुषमें उपकारका बदला पानेकी योग्यता आपत्तिकालमें ही आती है ( मैं नहीं चाहता कि तुम भी संकटमें पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ )’ ॥२४॥

ततोऽस्य हारं चन्द्राभं मुच्य कण्ठात् स राघवः। वैदूर्यतरलं कण्ठे बबन्ध च हनूमतः ॥ २५ ॥

भावार्थ

इतना कहकर श्रीरघुनाथजीने अपने कण्ठसे एक चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हार निकाला, जिसके मध्यभागमें वैदूर्यमणि थी । उसे उन्होंने हनुमान्जीके गलेमें बाँध दिया ॥२५॥

तेनोरसि निबद्धेन हारेण महता कपिः । रराज हेमशैलेन्द्रश्चन्द्रेणाक्रान्तमस्तकः ॥ २६ ॥

भावार्थ

वक्षःस्थलसे सटे हुए उस विशाल हारसे हनुमान्जी उसी तरह सुशोभित हुए, जैसे सुवर्णमय गिरिराज सुमेरुके शिखरपर चन्द्रमाका उदय हुआ हो ॥ २६ ॥

श्रुत्वा तु राघवस्यैतदुत्थायोत्थाय वानराः । प्रणम्य शिरसा पादौ निर्जग्मुस्ते महाबलाः ॥ २७ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीके ये विदाईके शब्द सुनकर वे महाबली वानर एक-एक करके उठे और उनके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करके वहाँसे चल दिये ॥ २७ ॥

सुग्रीवः स च रामेण निरन्तरमुरोगतः । विभीषणश्च धर्मात्मा सर्वे ते बाष्पविक्लवाः ॥ २८ ॥

भावार्थ

सुग्रीव और धर्मात्मा विभीषण श्रीरामके हृदयसे लग गये और उनका गाढ़ आलिंगन करके बिदा हुए । उस समय वे सब-के-सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए श्रीरामके भावी विरहसे व्यथित हो उठे थे ॥ २८ ॥

सर्वे च ते बाष्पकलाः साश्रुनेत्रा विचेतसः । सम्मूढा इव दुःखेन त्यजन्तो राघवं तदा ॥ २९ ॥

भावार्थ

श्रीरामको छोड़कर जाते समय वे सभी दुःखसे किंकर्तव्यविमूढ़ तथा अचेत-से हो रहे थे । किसीके गलेसे आवाज नहीं निकलती थी और सभीके नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे ॥ २९ ॥

कृतप्रसादास्तेनैवं राघवेण महात्मना । जग्मुः स्वं स्वं गृहं सर्वे देही देहमिव त्यजन् ॥ ३० ॥

भावार्थ

महात्मा श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार कृपा एवं प्रसन्नतापूर्वक विदा देनेपर वे सब वानर विवश हो उसी प्रकार अपने-अपने घरको गये, जैसे जीवात्मा विवशतापूर्वक शरीर छोड़कर परलोकको जाता है ॥ ३० ॥

ततस्तु ते राक्षसऋक्षवानराः प्रणम्य रामं रघुवंशवर्धनम् । वियोगजाश्रुप्रतिपूर्णलोचनाः प्रतिप्रयातास्तु यथानिवासिनः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

वे राक्षस, रीछ और वानर रघुवंशवर्धन श्रीरामको प्रणाम करके नेत्रोंमें वियोगके आँसू लिये अपने-अपने निवासस्थानको लौट गये ॥ ३१ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें