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उत्तरकाण्ड, सर्ग 3

अथ पुत्रः पुलस्त्यस्य विश्रवा मुनिपुङ्गवः । अचिरेणैव कालेन पितेव तपसि स्थितः ॥ १ ॥

भावार्थ

पुलस्त्यके पुत्र मुनिवर विश्रवा थोड़े ही समयमें पिताकी भाँति तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ १ ॥

सत्यवाञ्शीलवान् दान्तः स्वाध्यायनिरतः शुचिः । सर्वभोगेष्वसंसक्तो नित्यं धर्मपरायणः ॥ २ ॥

भावार्थ

वे सत्यवादी, शीलवान्, जितेन्द्रिय, स्वाध्यायपरायण, बाहर-भीतरसे पवित्र, सम्पूर्ण भोगोंमें अनासक्त तथा सदा ही धर्ममें तत्पर रहनेवाले थे ॥ २ ॥

ज्ञात्वा तस्यतु तद् वृत्तं भरद्वाजो महामुनिः । ददौ विश्रवसे भार्यां स्वसुतां देववर्णिनीम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

विश्रवाके इस उत्तम आचरणको जानकर महामुनि भरद्वाजने अपनी कन्याका, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी, उनके साथ विवाह कर दिया ॥ ३ ॥

प्रतिगृह्य तु धर्मेण भरद्वाजसुतां तदा । प्रजान्वीक्षिकया बुद्ध्या श्रेयो ह्यस्य विचिन्तयन् ॥ ४ ॥ मुदा परमया युक्तो विश्रवा मुनिपुङ्गवः । स तस्यां वीर्यसम्पन्नमपत्यं परमाद्भुतम् ॥ ५ ॥ जनयामास धर्मज्ञः सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्वृतम् । तस्मिञ्जाते तु संहृष्टः स बभूव पितामहः ॥ ६ ॥ दृष्ट्वा श्रेयस्करीं बुद्धिं धनाध्यक्षो भविष्यति । नाम चास्याकरोत् प्रीतः सार्धं देवर्षिभिस्तदा ॥ ७ ॥

भावार्थ

धर्मके ज्ञाता मुनिवर विश्रवाने बड़ी प्रसन्नताके साथ धर्मानुसार भरद्वाजकी कन्याका पाणिग्रहण किया और प्रजाका हित-चिन्तन करनेवाली बुद्धिके द्वारा लोककल्याणका विचार करते हुए उन्होंने उसके गर्भसे एक अद्भुत और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किया । उसमें सभी ब्राह्मणोचित गुण विद्यमान थे । उसके जन्मसे पितामह पुलस्त्य मुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा—‘इस बालकमें संसारका कल्याण करनेकी बुद्धि है तथा यह आगे चलकर धनाध्यक्ष होगा’ तब उन्होंने बड़े हर्षसे भरकर देवर्षियोंके साथ उसका नामकरण-संस्कार किया ॥ ७ ॥

यस्माद् विश्रवसोऽपत्यं सादृश्याद् विश्रवा इव । तस्माद् वैश्रवणो नाम भविष्यत्येष विश्रुतः ॥ ८ ॥ स तु वैश्रवणस्तत्र तपोवनगतस्तदा । अवर्धताहुतिहुतो महातेजा यथानलः ॥ ९ ॥

भावार्थ

वे बोले—‘विश्रवाका यह पुत्र विश्रवाके ही समान उत्पन्न हुआ है; इसलिये यह वैश्रवण नामसे विख्यात होगा’ ॥ कुमार वैश्रवण वहाँ तपोवनमें रहकर उस समय आहुति डालनेसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान बढ़ने लगे और महान् तेजसे सम्पन्न हो गये ॥ ९ ॥

तस्याश्रमपदस्थस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मनः । चरिष्ये परमं धर्मं धर्मो हि परमा गतिः ॥ १० ॥

भावार्थ

आश्रममें रहनेके कारण उन महात्मा वैश्रवणके मनमें भी यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं उत्तम धर्मका आचरण करूँ; क्योंकि धर्म ही परमगति है ॥ १० ॥

स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने । यन्त्रितो नियमैरुग्रैश्चकार सुमहत्तपः ॥ ११ ॥

भावार्थ

यह सोचकर उन्होंने तपस्याका निश्चय करनेके पश्चात् महान् वनके भीतर सहस्रों वर्षोंतक कठोर नियमोंसे बँधकर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ११ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रान्ते तं तं विधिमकल्पयत् । जलाशी मारुताहारो निराहारस्तथैव च ॥ १२ ॥ एवं वर्षसहस्राणि जग्मुस्तान्येकवर्षवत् ।

भावार्थ

वे एक-एक सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर तपस्याकी नयी-नयी विधि ग्रहण करते थे । पहले तो उन्होंने केवल जलका आहार किया । तत्पश्चात् वे हवा पीकर रहने लगे; फिर आगे चलकर उन्होंने उसका भी त्याग कर दिया और वे एकदम निराहार रहने लगे । इस तरह उन्होंने कई सहस्र वर्षोंको एक वर्षके समान बिता दिया ॥ १२½ ॥

अथ प्रीतो महातेजाः सेन्द्रैः सुरगणैः सह ॥ १३ ॥ गत्वा तस्याश्रमपदं ब्रह्मेदं वाक्यमब्रवीत् ।

भावार्थ

तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर महातेजस्वी ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओंके साथ उनके आश्रमपर पधारे और इस प्रकार बोले—॥ १३½ ॥

परितुष्टोऽस्मि ते वत्स कर्मणानेन सुव्रत ॥ १४ ॥ वरं वृणीष्व भद्रं ते वराहस्त्वं महामते ।

भावार्थ

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वत्स ! मैं तुम्हारे इस कर्मसे-तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ । महामते ! तुम्हारा भला हो । तुम कोई वर माँगो; क्योंकि वर पानेके योग्य हो’ ॥ १४½ ॥

अथाब्रवीद् वैश्रवणः पितामहमुपस्थितम् ॥ १५ ॥ भगवॅल्लोकपालत्वमिच्छेयं लोकरक्षणम् ।

भावार्थ

यह सुनकर वैश्रवणने अपने निकट खड़े हुए पितामहसे कहा—‘भगवन् ! मेरा विचार लोककी रक्षा करनेका है, अतः मैं लोकपाल होना चाहता हूँ’ ॥ १५½ ॥

अथाब्रवीद् वैश्रवणं परितुष्टेन चेतसा ॥ १६ ॥ ब्रह्मा सुरगणैः सार्धं बाढमित्येव हृष्टवत् ।

भावार्थ

वैश्रवणकी इस बातसे ब्रह्माजीके चित्तको और भी संतोष हुआ । उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक कहा-‘बहुत अच्छा’ ॥ १६½ ॥

अहं वै लोकपालानां चतुर्थं स्रष्टुमुद्यतः ॥ १७ ॥ यमेन्द्रवरुणानां च पदं यत् तव चेप्सितम् ।

भावार्थ

इसके बाद वे फिर बोले—‘बेटा ! मैं चौथे लोकपालकी सृष्टि करनेके लिये उद्यत था । यम, इन्द्र और वरुणको जो पद प्राप्त है, वैसा ही लोकपाल-पद तुम्हें भी प्राप्त होगा, जो तुमको अभीष्ट है ॥ १७½ ॥

तद् गच्छ बत धर्मज्ञ निधीशत्वमवाप्नुहि ॥ १८ ॥ शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि ।

भावार्थ

‘धर्मज्ञ ! तुम प्रसन्नतापूर्वक उस पदको ग्रहण करो और अक्षय निधियोंके स्वामी बनो । इन्द्र, वरुण और यमके साथ तुम चौथे लोकपाल कहलाओगे ॥ १८½ ॥

एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसंनिभम् ॥ १९ ॥ प्रतिगृह्णीष्व यानार्थं त्रिदशैः समतां व्रज ।

भावार्थ

‘यह सूर्यतुल्य तेजस्वी पुष्पकविमान है । इसे अपनी सवारीके लिये ग्रहण करो और देवताओंके समान हो जाओ ॥ १९½ ॥

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामः सर्वे एव यथागतम् ॥ २० ॥ कृतकृत्या वयं तात दत्त्वा तव वरद्वयम् ।

भावार्थ

‘तात ! तुम्हारा कल्याण हो । अब हम सब लोग जैसे आये हैं, वैसे लौट जायँगे । तुम्हें ये दो वर देकर हम अपनेको कृतकृत्य समझते हैं’ ॥ २०½ ॥

इत्युक्त्वा स गतो ब्रह्मा स्वस्थानं त्रिदशैः सह ॥ २१ ॥ गतेषु ब्रह्मपूर्वेषु देवेष्वथ नभस्तलम् । धनेशः पितरं प्राह प्राञ्जलिः प्रयतात्मवान् ॥ २२ ॥ भगवँल्लब्धवानस्मि वरमिष्टं पितामहात् ।

भावार्थ

ऐसा कहकर ब्रह्माजी देवताओंके साथ अपने स्थानको चले गये । ब्रह्मा आदि देवताओंके आकाशमें चले जानेपर अपने मनको संयममें रखनेवाले धनाध्यक्षने पितासे हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन् ! मैंने पितामह ब्रह्माजीसे मनोवाञ्छित फल प्राप्त किया है ॥ २१-२२½ ॥

निवासनं न मे देवो विदधे स प्रजापतिः ॥ २३ ॥ तं पश्य भगवन् कंचिन्निवासं साधु मे प्रभो । न च पीडा भवेद् यत्र प्राणिनो यस्य कस्यचित् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘परंतु उन प्रजापतिदेवने मेरे लिये कोई निवास-स्थान नहीं बताया । अतः भगवन् ! अब आप ही मेरे रहनेके योग्य किसी ऐसे स्थानकी खोज कीजिये, जो सभी दृष्टियोंसे अच्छा हो । प्रभो ! वह स्थान ऐसा होना चाहिये, जहाँ रहनेसे किसी भी प्राणीको कष्ट न हो’ ॥ २३-२४ ॥

एवमुक्तस्तु पुत्रेण विश्रवा मुनिपुंगवः । वचनं प्राह धर्मज्ञ श्रूयतामिति सत्तम ॥ २५ ॥ दक्षिणस्योदधेस्तीरे त्रिकूटो नाम पर्वतः । तस्याग्रे तु विशाला सा महेन्द्रस्य पुरी यथा ॥ २६ ॥ लङ्का नाम पुरी रम्या निर्मिता विश्वकर्मणा । राक्षसानां निवासार्थं यथेन्द्रस्यामरावती ॥ २७ ॥

भावार्थ

अपने पुत्रके ऐसा कहनेपर मुनिवर विश्रवा बोले— ‘धर्मज्ञ ! साधुशिरोमणे ! सुनो—दक्षिण समुद्रके तटपर एक त्रिकूट नामक पर्वत है । उसके शिखरपर एक विशाल पुरी है, जो देवराज इन्द्रकी अमरावती पुरीके समान शोभा पाती है ॥ ‘उसका नाम लङ्का है । इन्द्रकी अमरावतीके समान उस रमणीय पुरीका निर्माण विश्वकर्माने राक्षसोंके रहनेके लिये किया है ॥ २७ ॥

तत्र त्वं वस भद्रं ते लङ्कायां नात्र संशयः । हेमप्राकारपरिखा यन्त्रशस्त्रसमावृता ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘बेटा ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम निःसंदेह उस लङ्कापुरीमें ही जाकर रहो । उसकी चहारदीवारी सोनेकी बनी हुई है । उसके चारों ओर चौड़ी खाइयाँ खुदी हुई हैं और वह अनेकानेक यन्त्रों तथा शस्त्रोंसे सुरक्षित है ॥ २८ ॥

रमणीया पुरी सा हि रुक्मवैदूर्यतोरणा । राक्षसैः सा परित्यक्ता पुरा विष्णुभयार्दितैः ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘वह पुरी बड़ी ही रमणीय है । उसके फाटक सोने और नीलमके बने हुए हैं । पूर्वकालमें भगवान् विष्णुके भयसे पीड़ित हुए राक्षसोंने उस पुरीको त्याग दिया था ॥ २९ ॥

शून्या रक्षोगणैः सर्वै रसातलतलं गतैः । शून्या सम्प्रति लङ्का सा प्रभुस्तस्या न विद्यते ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘वे समस्त राक्षस रसातलको चले गये थे, इसलिये लङ्कापुरी सूनी हो गयी । इस समय भी लङ्कापुरी सूनी ही है, उसका कोई स्वामी नहीं है ॥ ३० ॥

स त्वं तत्र निवासाय गच्छ पुत्र यथासुखम् । निर्दोषस्तत्र ते वासो न बाधस्तत्र कस्यचित् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘अतः बेटा ! तुम वहाँ निवास करनेके लिये सुखपूर्वक जाओ । वहाँ रहनेमें किसी प्रकारका दोष या खटका नहीं है । वहाँ किसीकी ओरसे कोई विघ्न-बाधा नहीं आ सकती’ ॥३१॥

एतच्छ्रुत्वा स धर्मात्मा धर्मिष्ठं वचनं पितुः । निवासयामास तदा लङ्कां पर्वतमूर्धनि ॥ ३२ ॥

भावार्थ

अपने पिताके इस धर्मयुक्त वचनको सुनकर धर्मात्मा वैश्रवणने त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बनी हुई लङ्कापुरीमें निवास किया ॥ ३२ ॥

नैर्ऋतानां सहस्रैस्तु हृष्टैः प्रमुदितैः सदा । अचिरेणैव कालेन सम्पूर्णा तस्य शासनात् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उनके निवास करनेपर थोड़े ही दिनोंमें वह पुरी सहस्रों हृष्टपुष्ट राक्षसोंसे भर गयी । उनकी आज्ञासे वे राक्षस वहाँ आकर आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ३३ ॥

स तु तत्रावसत् प्रीतो धर्मात्मा नैर्ऋतर्षभः । समुद्रपरिखायां स लङ्कायां विश्रवात्मजः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

समुद्र जिसके लिये खाईका काम देता था, उस लङ्का-नगरीमें विश्रवाके धर्मात्मा पुत्र वैश्रवण राक्षसोंके राजा हो बड़ी प्रसन्नताके साथ निवास करने लगे ॥ ३४ ॥

काले काले तु धर्मात्मा पुष्पकेण धनेश्वरः । अभ्यागच्छद् विनीतात्मा पितरं मातरं च हि ॥ ३५ ॥

भावार्थ

धर्मात्मा धनेश्वर समय-समयपर पुष्पकविमानके द्वारा आकर अपने माता-पितासे मिल जाया करते थे । उनका हृदय बड़ा ही विनीत था ॥ ३५ ॥

स देवगन्धर्वगणैरभिष्टुत- स्तथाप्सरोनृत्यविभूषितालयः । गभस्तिभिः सूर्य इवावभासयन् पितुः समीपं प्रययौ स वित्तपः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

देवता और गन्धर्व उनकी स्तुति करते थे । उनका भव्य भवन अप्सराओंके नृत्यसे सुशोभित होता था । वे धनपति कुबेर अपनी किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्यकी भाँति सब ओर प्रकाश बिखेरते हुए अपने पिताके समीप गये ॥ ३६ ॥

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