उत्तरकाण्ड, सर्ग 2
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः । कुम्भयोनिर्महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥
भावार्थ
महात्मा रघुनाथजीका वह प्रश्न सुनकर महातेजस्वी कुम्भयोनि अगस्त्यने उनसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
शृणु राम तथा वृत्तं तस्य तेजोबलं महत् । जघान शत्रून् येनासौ न च वध्यः स शत्रुभिः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! इन्द्रजित्के महान् बल और तेजके उद्देश्यसे जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे बताता हूँ, सुनो । जिस बलके कारण वह तो शत्रुओंको मार गिराता था, परंतु स्वयं किसी शत्रुके हाथसे मारा नहीं जाता था; उसका परिचय दे रहा हूँ ॥ २ ॥
तावत् ते रावणस्येदं कुलं जन्म च राघव । वरप्रदानं च तथा तस्मै दत्तं ब्रवीमि ते ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! इस प्रस्तुत विषयका वर्णन करनेके लिये मैं पहले आपको रावणके कुल, जन्म तथा वरदान-प्राप्ति आदिका प्रसङ्ग सुनाता हूँ ॥ ३ ॥
पुरा कृतयुगे राम प्रजापतिसुतः प्रभुः । पुलस्त्यो नाम ब्रह्मर्षिः साक्षादिव पितामहः ॥ ४ ॥ नानुकीर्त्या गुणास्तस्य धर्मतः शीलतस्तथा । प्रजापतेः पुत्र इति वक्तुं शक्यं हि नामतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! प्राचीनकाल--सत्ययुगकी बात है, प्रजापति ब्रह्माजीके एक प्रभावशाली पुत्र हुए, जो ब्रह्मर्षि पुलस्त्यके नामसे प्रसिद्ध हैं । वे साक्षात् ब्रह्माजीके समान ही तेजस्वी हैं॥ ‘उनके गुण, धर्म और शीलका पूरा-पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता । उनका इतना ही परिचय देना पर्याप्त होगा कि वे प्रजापतिके पुत्र हैं ॥ ५ ॥
प्रजापतिसुतत्वेन देवानां वल्लभो हि सः । इष्टः सर्वस्य लोकस्य गुणैः शुभ्रैर्महामतिः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘प्रजापति ब्रह्माके पुत्र होनेके कारण ही देवतालोग उनसे बहुत प्रेम करते हैं । वे बड़े बुद्धिमान् हैं और अपने उज्ज्वल गुणोंके कारण ही सब लोगोंके प्रिय हैं ॥ ६ ॥
स तु धर्मप्रसङ्गेन मेरोः पार्श्वे महागिरेः । तृणबिन्द्वाश्रमं गत्वाप्यवसन्मुनिपुङ्गवः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘एक बार मुनिवर पुलस्त्य धर्माचरणके प्रसङ्गसे महागिरि मेरुके निकटवर्ती राजर्षि तृणबिन्दुके आश्रममें गये और वहीं रहने लगे ॥ ७ ॥
तपस्तेपे स धर्मात्मा स्वाध्यायनियतेन्द्रियः । गत्वाऽऽश्रमपदं तस्य विघ्नं कुर्वन्ति कन्यकाः ॥ ८ ॥ ऋषिपन्नगकन्याश्च राजर्षितनयाश्च याः । क्रीडन्त्योऽप्सरसश्चैव तं देशमुपपेदिरे ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता था । वे इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए प्रतिदिन वेदोंका स्वाध्याय करते और तपस्यामें लगे रहते थे । परंतु कुछ कन्याएँ उनके आश्रममें जाकर उनकी तपस्यामें विघ्न डालने लगीं । ऋषियों, नागों तथा राजर्षियोंकी कन्याएँ और जो अप्सराएँ हैं, वे भी प्रायः क्रीड़ा करती हुई उनके आश्रमकी ओर आ जाती थीं ॥८-९॥
सर्वर्तुषूपभोग्यत्वाद् रम्यत्वात् काननस्य च । नित्यशस्तास्तु तं देशं गत्वा क्रीडन्ति कन्यकाः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वहाँका वन सभी ऋतुओंमें उपभोगमें लानेके योग्य और रमणीय था, इसलिये वे कन्याएँ प्रतिदिन उस प्रदेशमें जाकर भाँति-भाँतिकी क्रीडाएँ करती थीं ॥ १० ॥
देशस्य रमणीयत्वात् पुलस्त्यो यत्र स द्विजः । गायन्त्यो वादयन्त्यश्च लासयन्त्यस्तथैव च ॥ ११ ॥ मुनेस्तपस्विनस्तस्य विघ्नं चक्रुरनिन्दिताः ।
भावार्थ
‘जहाँ ब्रह्मर्षि पुलस्त्य रहते थे, वह स्थान तो और भी रमणीय था; इसलिये वे सती-साध्वी कन्याएँ प्रतिदिन वहाँ आकर गाती, बजाती तथा नाचती थीं । इस प्रकार उन तपस्वी मुनिके तपमें विघ्न डाला करती थीं ॥ ११½ ॥
अथ रुष्टो महातेजा व्याजहार महामुनिः ॥ १२ ॥ या मे दर्शनमागच्छेत् सा गर्भं धारयिष्यति ।
भावार्थ
‘इससे वे महातेजस्वी महामुनि पुलस्त्य कुछ रुष्ट हो गये और बोले--‘कलसे जो लड़की यहाँ मेरे दृष्टिपथमें आयेगी, वह निश्चय ही गर्भ धारण कर लेगी’ ॥ १२½ ॥
तास्तु सर्वाः प्रतिश्रुत्य तस्य वाक्यं महात्मनः ॥ १३ ॥ ब्रह्मशापभयाद् भीतास्तं देशं नोपचक्रमुः ।
भावार्थ
‘उन महात्माकी यह बात सुनकर वे सब कन्याएँ ब्रह्म-शापके भयसे डर गयीं और उन्होंने उस स्थानपर आना छोड़ दिया ॥ १३½ ॥
तृणबिन्दोस्तु राजर्षेस्तनया न शृणोति तत् ॥ १४ ॥ गत्वाऽऽश्रमपदं तत्र विचचार सुनिर्भया ।
भावार्थ
‘परंतु राजर्षि तृणबिन्दुकी कन्याने इस शापको नहीं सुना था; इसलिये वह दूसरे दिन भी बेखटके आकर उस आश्रममें विचरने लगी ॥ १४½ ॥
न चापश्यच्च सा तत्र काचिद्भ्यागतां सखीम्॥ १५ ॥ तस्मिन् काले महातेजाः प्राजापत्यो महानृषिः । स्वाध्यायमकरोत् तत्र तपसा भावितः स्वयम् ॥ १६ ॥ सा तु वेदश्रुतिं श्रुत्वा द्रष्टा वै तपसो निधिम् । अभवत् पाण्डुदेहा सा सुव्यञ्जितशरीरजा ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘वहाँ उसने अपनी किसी सखीको आयी हुई नहीं देखा । उस समय प्रजापतिके पुत्र महातेजस्वी महर्षि पुलस्त्य अपनी तपस्यासे प्रकाशित हो वहाँ वेदोंका स्वाध्याय कर रहे थे ॥ ‘उस वेदध्वनिको सुनकर वह कन्या उसी ओर गयी और उसने तपोनिधि पुलस्त्यजीका दर्शन किया । महर्षिकी दृष्टि पड़ते ही उसके शरीरपर पीलापन छा गया और गर्भके लक्षण प्रकट हो गये ॥ १७ ॥
बभूव च समुद्विग्ना द्रष्टा तद्दोषमात्मनः । इदं मे किंचिदिति ज्ञात्वा पितुर्गत्वाऽऽश्रमे स्थिता ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘अपने शरीरमें यह दोष देखकर वह घबरा उठी और ‘मुझे यह क्या हो गया ?’ इस प्रकार चिन्ता करती हुई पिताके आश्रमपर जाकर खड़ी हुई ॥ १८ ॥
तां तु दृष्ट्वा तथाभूतां तृणबिन्दुरथाब्रवीत् । किं त्वमेतत्त्वसदृशं धारयस्यात्मनो वपुः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘अपनी कन्याको उस अवस्थामें देखकर तृणबिन्दुने पूछा--‘तुम्हारे शरीरकी ऐसी अवस्था कैसे हुई ? तुम अपने शरीरको जिस रूपमें धारण कर रही हो, यह तुम्हारे लिये सर्वथा अयोग्य एवं अनुचित है’ ॥ १९ ॥
सा तु कृत्वाञ्जलिं दीना कन्योवाच तपोधनम् । न जाने कारणं तात येन मे रूपमीदृशम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘वह बेचारी कन्या हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनिसे बोली—‘पिताजी ! मैं उस कारणको नहीं समझ पाती, जिससे मेरा रूप ऐसा हो गया है ॥ २० ॥
किं तु पूर्वं गतास्म्येका महर्षेर्भावितात्मनः । पुलस्त्यस्याश्रमं दिव्यमन्वेष्टुं स्वसखीजनम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘‘अभी थोड़ी देर पहले मैं पवित्र अन्तःकरणवाले महर्षि पुलस्त्यके दिव्य आश्रमपर अपनी सखियोंको खोजनेके लिये अकेली गयी थी ॥ २१ ॥
न च पश्याम्यहं तत्र काञ्चिद्भ्यागतां सखीम् । रूपस्य तु विपर्यासं दृष्ट्वा त्रासादिहागता ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘‘वहाँ देखती हूँ तो कोई भी सखी उपस्थित नहीं है । साथ ही मेरा रूप पहलेसे विपरीत अवस्थामें पहुँच गया है; यह सब देखकर मैं भयभीत हो यहाँ आ गयी हूँ’ ॥ २२ ॥
तृणबिन्दुस्तु राजर्षिस्तपसा द्योतितप्रभः । ध्यानं विवेश तच्चापि अपश्यदृषिकर्मजम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘राजर्षि तृणबिन्दु अपनी तपस्यासे प्रकाशमान थे । उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो ज्ञात हुआ कि यह सब कुछ महर्षि पुलस्त्यके ही करनेसे हुआ है ॥ २३ ॥
स तु विज्ञाय तं शापं महर्षेर्भावितात्मनः । गृहीत्वा तनयां गत्वा पुलस्त्यमिदमब्रवीत् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘उन पवित्रात्मा महर्षिके उस शापको जानकर वे अपनी पुत्रीको साथ लिये पुलस्त्यजीके पास गये और इस प्रकार बोले—॥ २४ ॥
भगवंस्तनयां मे त्वं गुणैः स्वैरेव भूषिताम् । भिक्षां प्रतिगृहाणेमां महर्षे स्वयमुद्यताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘‘भगवन् ! मेरी यह कन्या अपने गुणोंसे ही विभूषित है । महर्षे ! आप इसे स्वयं प्राप्त हुई भिक्षाके रूपमें ग्रहण कर लें ॥ २५ ॥
तपश्चरणयुक्तस्य श्राम्यमाणेन्द्रियस्य ते । शुश्रूषणपरा नित्यं भविष्यति न संशयः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘‘आप तपस्यामें लगे रहनेके कारण थक जाते होंगे; अतः यह सदा साथ रहकर आपकी सेवा-शुश्रूषा किया करेगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ २६ ॥
तं ब्रुवाणं तु तद् वाक्यं राजर्षिं धार्मिकं तदा । जिघृक्षुरब्रवीत् कन्यां बाढमित्येव स द्विजः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘ऐसी बात कहते हुए उन धर्मात्मा राजर्षिको देखकर उनकी कन्याको ग्रहण करनेकी इच्छासे उन ब्रह्मर्षिने कहा--‘बहुत अच्छा’ ॥ २७ ॥
दत्त्वा तु तनयां राजा स्वमाश्रमपदं गतः । सापि तत्रावसत् कन्या तोषयन्ती पतिं गुणैः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘तब उन महर्षिको अपनी कन्या देकर राजर्षि तृणबिन्दु अपने आश्रमपर लौट आये और वह कन्या अपने गुणोंसे पतिको संतुष्ट करती हुई वहीं रहने लगी ॥ २८ ॥
तस्यास्तु शीलवृत्ताभ्यां तुतोष मुनिपुङ्गवः । प्रीतः स तु महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २९ ॥ परितुष्टोऽस्मि सुश्रोणि गुणानां सम्पदा भृशम् । तस्माद् देवि ददाम्यद्य पुत्रमात्मसमं तव ॥ ३० ॥ उभयोर्वंशकर्तारं पौलस्त्य इति विश्रुतम् ।
भावार्थ
‘उसके शील और सदाचारसे वे महातेजस्वी मुनिवर पुलस्त्य बहुत संतुष्ट हुए और प्रसन्नतापूर्वक यों बोले--॥ ‘‘सुन्दरि ! मैं तुम्हारे गुणोंके वैभवसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ । देवि ! इसीलिये आज मैं तुम्हें अपने समान पुत्र प्रदान करता हूँ, जो माता और पिता दोनोंके कुलकी प्रतिष्ठा बढ़ायेगा और पौलस्त्य नामसे विख्यात होगा ॥ ३०½ ॥
यस्मात् तु विश्रुतो वेदस्त्वयेहाध्ययतो मम ॥ ३१ ॥ तस्मात् स विश्रवा नाम भविष्यति न संशयः ।
भावार्थ
‘‘देवि ! मैं यहाँ वेदका स्वाध्याय कर रहा था, उस समय तुमने आकर उसका विशेषरूपसे श्रवण किया, इसलिये तुम्हारा वह पुत्र विश्रवा या विश्रवण कहलायेगा; इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३१½ ॥
एवमुक्ता तु सा देवी प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ३२ ॥ अचिरेणैव कालेनासूत विश्रवसं सुतम् । त्रिषु लोकेषु विख्यातं यशोधर्मसमन्वितम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘पतिके प्रसन्नचित्त होकर ऐसी बात कहनेपर उस देवीने बड़े हर्षके साथ थोड़े ही समयमें विश्रवा नामक पुत्रको जन्म दिया, जो यश और धर्मसे सम्पन्न होकर तीनों लोकोंमें विख्यात हुआ ॥ ३२-३३ ॥
श्रुतिमान् समदर्शी च व्रताचाररतस्तथा । पितेव तपसा युक्तो ह्यभवद् विश्रवा मुनिः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘विश्रवा मुनि वेदके विद्वान्, समदर्शी, व्रत और आचारका पालन करनेवाले तथा पिताके समान ही तपस्वी हुए’ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें