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उत्तरकाण्ड, सर्ग 17

अथ राजन् महाबाहुर्विचरन् पृथिवीतले । हिमवद्वनमासाद्य परिचक्राम रावणः ॥ १ ॥

भावार्थ

( अगस्त्यजी कहते हैं— )‘राजन् ! तत्पश्चात् महाबाहु रावण भूतलपर विचरता हुआ हिमालयके वनमें आकर वहाँ सब ओर चक्कर लगाने लगा ॥ १ ॥

तत्रापश्यत् स वै कन्यां कृष्णाजिनजटाधराम् । आर्षेण विधिना चैनां दीप्यन्तीं देवतामिव ॥ २ ॥

भावार्थ

वहाँ उसने एक तपस्विनी कन्याको देखा, जो अपने अङ्गोंमें काले रंगका मृगचर्म तथा सिरपर जटा धारण किये हुए थी । वह ऋषिप्रोक्त विधिसे तपस्यामें संलग्न हो देवाङ्गनाके समान उद्दीप्त हो रही थी ॥ २ ॥

स दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां कन्यां तां सुमहाव्रताम् । काममोहपरीतात्मा पप्रच्छ प्रहसन्निव ॥ ३ ॥

भावार्थ

उत्तम एवं महान् व्रतका पालन करनेवाली तथा रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित उस कन्याको देखकर रावणका चित्त कामजनित मोहके वशीभूत हो गया । उसने अट्टहास करते हुए-से पूछा—॥ ३ ॥

किमिदं वर्तसे भद्रे विरुद्धं यौवनस्य ते । नहि युक्ता तवैतस्य रूपस्यैवं प्रतिक्रिया ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘भद्रे ! तुम अपनी इस युवावस्थाके विपरीत यह कैसा बर्ताव कर रही हो ? तुम्हारे इस दिव्य रूपके लिये ऐसा आचरण कदापि उचित नहीं है ॥ ४ ॥

रूपं तेऽनुपमं भीरु कामोन्मादकरं नृणाम् । न युक्तं तपसि स्थातुं निर्गतो ह्येष निर्णयः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘भीरु ! तुम्हारे इस रूपकी कहीं तुलना नहीं है । यह पुरुषोंके हृदयमें कामजनित उन्माद पैदा करनेवाला है । अतः तुम्हारा तपमें संलग्न होना उचित नहीं है । तुम्हारे लिये हमारे हृदयसे यही निर्णय प्रकट हुआ है ॥ ५ ॥

कस्यासि किमिदं भद्रे कश्च भर्ता वरानने । येन सम्भुज्यसे भीरु स नरः पुण्यभाग् भुवि ॥ ६ ॥ पृच्छतः शंस मे सर्वं कस्य हेतोः परिश्रमः ।

भावार्थ

‘भद्रे ! तुम किसकी पुत्री हो ? यह कौन-सा व्रत कर रही हो ? सुमुखि ! तुम्हारा पति कौन है ? भीरु ! जिसके साथ तुम्हारा सम्बन्ध है, वह मनुष्य इस भूलोकमें महान् पुण्यात्मा है । मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह सब मुझे बताओ। किस फलके लिये यह परिश्रम किया जा रहा है ?’ ॥ ६½ ॥

एवमुक्ता तु सा कन्या रावणेन यशस्विनी ॥ ७ ॥ अब्रवीद् विधिवत् कृत्वा तस्यातिथ्यं तपोधना ।

भावार्थ

रावणके इस प्रकार पूछनेपर वह यशस्विनी तपोधना कन्या उसका विधिवत् आतिथ्य-सत्कार करके बोली—॥७½॥

कुशध्वजो नाम पिता ब्रह्मर्षिरमितप्रभः ॥ ८ ॥ बृहस्पतिसुतः श्रीमान् बुद्ध्या तुल्यो बृहस्पतेः ।

भावार्थ

‘अमिततेजस्वी ब्रह्मर्षि श्रीमान् कुशध्वज मेरे पिता थे, जो बृहस्पतिके पुत्र थे और बुद्धिमें भी उन्हींके समान माने जाते थे ॥ ८½ ॥

तस्याहं कुर्वतो नित्यं वेदाभ्यासं महात्मनः ॥ ९ ॥ सम्भूता वाङ्मयी कन्या नाम्ना वेदवती स्मृता ।

भावार्थ

‘प्रतिदिन वेदाभ्यास करनेवाले उन महात्मा पितासे वाङ्मयी कन्याके रूपमें मेरा प्रादुर्भाव हुआ था । मेरा नाम वेदवती है ॥ ९½ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ १० ॥ ते चापि गत्वा पितरं वरणं रोचयन्ति मे । न च मां स पिता तेभ्यो दत्तवान् राक्षसेश्वर ॥ ११ ॥ कारणं तद् वदिष्यामि निशामय महाभुज ।

भावार्थ

‘जब मैं बड़ी हुई, तब देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग भी पिताजीके पास जा-जाकर उनसे मुझे माँगने लगे ।१०½। ‘महाबाहु राक्षसेश्वर ! पिताजीने उनके हाथमें मुझे नहीं सौंपा । इसका क्या कारण था, मैं बता रही हूँ, सुनिये ॥११½॥

पितुस्तु मम जामाता विष्णुः किल सुरेश्वरः ॥ १२ ॥ अभिप्रेतस्त्रिलोकेशस्तस्मान्नान्यस्य मे पिता । दातुमिच्छति तस्मै तु तच्छ्रुत्वा बलदर्पितः ॥ १३ ॥ शम्भुर्नाम ततो राजा दैत्यानां कुपितोऽभवत् । तेन रात्रौ शयानो मे पिता पापेन हिंसितः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘पिताजीकी इच्छा थी कि तीनों लोकोंके स्वामी देवेश्वर भगवान् विष्णु मेरे दामाद हों । इसीलिये वे दूसरे किसीके हाथमें मुझे नहीं देना चाहते थे । उनके इस अभिप्रायको सुनकर बलाभिमानी दैत्यराज शम्भु उनपर कुपित हो उठा और उस पापीने रातमें सोते समय मेरे पिताजीकी हत्या कर डाली ॥ १२–१४ ॥

ततो मे जननी दीना तच्छरीरं पितुर्मम । परिष्वज्य महाभागा प्रविष्टा हव्यवाहनम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘इससे मेरी महाभागा माताको बड़ा दुःख हुआ और वे पिताजीके शवको हृदयसे लगाकर चिताकी आगमें प्रविष्ट हो गयीं ॥ १५ ॥

ततो मनोरथं सत्यं पितुर्नारायणं प्रति । करोमीति तमेवाहं हृदयेन समुद्वहे ॥ १६ ॥ इति प्रतिज्ञामारुह्य चरामि विपुलं तपः । एतत् ते सर्वमाख्यातं मया राक्षसपुङ्गव ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘तबसे मैंने प्रतिज्ञा कर ली है कि भगवान् नारायणके प्रति पिताजीका जो मनोरथ था, उसे मैं सफल करूँगी । इसलिये मैं उन्हींको अपने हृदय-मन्दिरमें धारण करती हूँ ॥ ‘यही प्रतिज्ञा करके मैं यह महान् तप कर रही हूँ । राक्षसराज ! आपके प्रश्नके अनुसार यह सब बात मैंने आपको बता दी ॥ १७ ॥

नारायणो मम पतिर्न त्वन्यः पुरुषोत्तमात् । आश्रये नियमं घोरं नारायणपरीप्सया ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘नारायण ही मेरे पति हैं । उन पुरुषोत्तमके सिवा दूसरा कोई मेरा पति नहीं हो सकता । उन नारायणदेवको प्राप्त करनेके लिये ही मैंने इस कठोर व्रतका आश्रय लिया है ॥१८॥

विज्ञातस्त्वं हि मे राजन् गच्छ पौलस्त्यनन्दन । जानामि तपसा सर्वं त्रैलोक्ये यद्धि वर्तते ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! पौलस्त्यनन्दन ! मैंने आपको पहचान लिया है । आप जाइये । त्रिलोकीमें जो कोई भी वस्तु विद्यमान है, वह सब मैं तपस्याद्वारा जानती हूँ’ ॥ १९ ॥

सोऽब्रवीद् रावणो भूयस्तां कन्यां सुमहाव्रताम् । अवरुह्य विमानाग्रात् कन्दर्पशरपीडितः ॥ २० ॥

भावार्थ

यह सुनकर रावण कामबाणसे पीड़ित हो विमानसे उतर गया और उस उत्तम एवं महान् व्रतका पालन करनेवाली कन्यासे फिर बोला—॥ २० ॥

अवलिप्तासि सुश्रोणि यस्यास्ते मतिरीदृशी । वृद्धानां मृगशावाक्षि भ्राजते पुण्यसंचयः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘सुश्रोणि ! तुम गर्वीली जान पड़ती हो, तभी तो तुम्हारी बुद्धि ऐसी हो गयी है । मृगशावकलोचने ! इस तरह पुण्यका संग्रह बूढ़ी स्त्रियोंको ही शोभा देता है. तुम-जैसी युवतीको नहीं ॥ २१॥

त्वं सर्वगुणसम्पन्ना नार्हसे वक्तुमीदृशम् । त्रैलोक्यसुन्दरी भीरु यौवनं तेऽतिवर्तते ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘तुम तो सर्वगुणसम्पन्न एवं त्रिलोकीकी अद्वितीय सुन्दरी हो । तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये । भीरु ! तुम्हारी जवानी बीती जा रही है ॥ २२ ॥

अहं लङ्कापतिर्भद्रे दशग्रीव इति श्रुतः । तस्य मे भव भार्या त्वं भुङ्क्ष्व भोगान् यथासुखम्॥२३॥

भावार्थ

‘भद्रे ! मैं लङ्काका राजा हूँ । मेरा नाम दशग्रीव है । तुम मेरी भार्या हो जाओ और सुखपूर्वक उत्तम भोग भोगो ॥ २३ ॥

कश्च तावदसौ यं त्वं विष्णुरित्यभिभाषसे । वीर्येण तपसा चैव भोगेन च बलेन च ॥ २४ ॥ स मया नो समो भद्रे यं त्वं कामयसेऽङ्गने ।

भावार्थ

‘पहले यह तो बताओ, तुम जिसे विष्णु कहती हो, वह कौन है ? अङ्गने ! भद्रे ! तुम जिसे चाहती हो, वह बल, पराक्रम, तप और भोग-वैभवके द्वारा मेरी समानता नहीं कर सकता’ ॥ २४½ ॥

इत्युक्तवति तस्मिंस्तु वेदवत्यथ साब्रवीत् ॥ २५ ॥ मा मैवमिति सा कन्या तमुवाच निशाचरम् ।

भावार्थ

उसके ऐसा कहनेपर कुमारी वेदवती उस निशाचरसे बोली—‘नहीं, नहीं, ऐसा न कहो ॥ २५½ ॥

त्रैलोक्याधिपतिं विष्णुं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ २६ ॥ त्वदृते राक्षसेन्द्रान्यः कोऽवमन्येत बुद्धिमान् ।

भावार्थ

‘राक्षसराज ! भगवान् विष्णु तीनों लोकोंके अधिपति हैं । सारा संसार उनके चरणोंमें मस्तक झुकाता है । तुम्हारे सिवा दूसरा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान् होकर भी उनकी अवहेलना करेगा’ ॥२६½॥

एवमुक्तस्तया तत्र वेदवत्या निशाचरः ॥ २७ ॥ मूर्धजेषु तदा कन्यां कराग्रेण परामृशत् ।

भावार्थ

वेदवतीके ऐसा कहनेपर उस राक्षसने अपने हाथसे उस कन्याके केश पकड़ लिये ॥ २७½ ॥

ततो वेदवती क्रुद्धा केशान् हस्तेन साच्छिनत् ॥ २८ ॥ असिर्भूत्वा करस्तस्याः केशांश्छिन्नांस्तदाकरोत् ।

भावार्थ

इससे वेदवतीको बड़ा क्रोध हुआ । उसने अपने हाथसे उन केशोंको काट दिया । उसके हाथने तलवार बनकर तत्काल उसके केशोंको मस्तकसे अलग कर दिया ॥ २८½ ॥

सा ज्वलन्तीव रोषेण दहन्तीव निशाचरम् ॥ २९ ॥ उवाचाग्निं समाधाय मरणाय कृतत्वरा ।

भावार्थ

वेदवती रोषसे प्रज्वलित-सी हो उठी । वह जल मरनेके लिये उतावली हो अग्निकी स्थापना करके उस निशाचरको दग्ध करती हुई-सी बोली—॥ २९½ ॥

धर्षितायास्त्वयानार्य न मे जीवितमिष्यते ॥ ३० ॥ रक्षस्तस्मात् प्रवेक्ष्यामि पश्यतस्ते हुताशनम् ।

भावार्थ

‘नीच राक्षस ! तूने मेरा तिरस्कार किया है; अतः अब इस जीवनको सुरक्षित रखना मुझे अभीष्ट नहीं है । इसलिये तेरे देखते-देखते मैं अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगी ॥ ३०½ ॥

यस्मात् तु धर्षिता चाहं त्वया पापात्मना वने ॥ ३१ ॥ तस्मात् तव वधार्थं हि समुत्पत्स्ये ह्यहं पुनः ।

भावार्थ

‘तुझ पापात्माने इस वनमें मेरा अपमान किया है । इसलिये मैं तेरे वधके लिये फिर उत्पन्न होऊँगी ॥ ३१½ ॥

नहि शक्यः स्त्रिया हन्तुं पुरुषः पापनिश्चयः ॥ ३२ ॥ शापे त्वयि मयोत्सृष्टे तपसश्च व्ययो भवेत् ।

भावार्थ

‘स्त्री अपनी शारीरिक शक्तिसे किसी पापाचारी पुरुषका वध नहीं कर सकती । यदि मैं तुझे शाप दूँ तो मेरी तपस्या क्षीण हो जायगी ॥ ३२½ ॥

यदि त्वस्ति मया किंचित् कृतं दत्तं हुतं तथा ॥ ३३ ॥ तस्मात् त्वयोनिजा साध्वी भवेयं धर्मिणः सुता ।

भावार्थ

‘यदि मैंने कुछ भी सत्कर्म, दान और होम किये हों तो अगले जन्ममें मैं सती-साध्वी अयोनिजा कन्याके रूपमें प्रकट होऊँ तथा किसी धर्मात्मा पिताकी पुत्री बनूँ’ ॥ ३३½ ॥

एवमुक्त्वा प्रविष्टा सा ज्वलितं जातवेदसम् ॥ ३४ ॥ पपात च दिवो दिव्या पुष्पवृष्टिः समन्ततः ।

भावार्थ

ऐसा कहकर वह प्रज्वलित अग्निमें समा गयी । उस समय उसके चारों ओर आकाशसे दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३४½ ॥

पुनरेव समुद्भूता पद्मे पद्मसमप्रभा ॥ ३५ ॥ तस्मादपि पुनः प्राप्ता पूर्ववत् तेन रक्षसा ।

भावार्थ

तदनन्तर दूसरे जन्ममें वह कन्या पुनः एक कमलसे प्रकट हुई । उस समय उसकी कान्ति कमलके समान ही सुन्दर थी । उस राक्षसने पहलेकी ही भाँति फिर वहाँसे भी उस कन्याको प्राप्त कर लिया ॥ ३५½ ॥

कन्यां कमलगर्भाभां प्रगृह्य स्वगृहं ययौ ॥ ३६ ॥ प्रगृह्य रावणस्त्वेतां दर्शयामास मन्त्रिणे ।

भावार्थ

कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर कान्तिवाली उस कन्याको लेकर रावण अपने घर गया । वहाँ उसने मन्त्रीको वह कन्या दिखायी ॥ ३६½ ॥

लक्षणज्ञो निरीक्ष्यैव रावणं चैवमब्रवीत् ॥ ३७ ॥ गृहस्थैषा हि सुश्रोणी त्वद्वधायैव दृश्यते ।

भावार्थ

मन्त्री बालक-बालिकाओंके लक्षणोंको जाननेवाला था। उसने उसे अच्छी तरह देखकर रावणसे कहा—‘राजन् ! यह सुन्दरी कन्या यदि घरमें रही तो आपके वधका ही कारण होगी, ऐसा लक्षण देखा जाता है’ ॥ ३७½ ॥

एतच्छ्रुत्वार्णवे राम तां प्रचिक्षेप रावणः ॥ ३८ ॥ सा चैव क्षितिमासाद्य यज्ञायतनमध्यगा । राज्ञो हलमुखोत्कृष्टा पुनरप्युत्थिता सती ॥ ३९ ॥

भावार्थ

श्रीराम ! यह सुनकर रावणने उसे समुद्रमें फेंक दिया । तत्पश्चात् वह भूमिको प्राप्त होकर राजा जनकके यज्ञमण्डपके मध्यवर्ती भूभागमें जा पहुँची । वहाँ राजाके हलके मुखभागसे उस भूभागके जोते जानेपर वह सती साध्वी कन्या फिर प्रकट हो गयी ॥ ३८-३९ ॥

सैषा जनकराजस्य प्रसूता तनया प्रभो । तव भार्या महाबाहो विष्णुस्त्वं हि सनातनः ॥ ४० ॥

भावार्थ

प्रभो ! वही यह वेदवती महाराज जनककी पुत्रीके रूपमें प्रादुर्भूत हो आपकी पत्नी हुई है । महाबाहो ! आप ही सनातन विष्णु हैं ॥ ४० ॥

पूर्वं क्रोधहतः शत्रुर्ययासौ निहतस्तया । उपाश्रयित्वा शैलाभस्तव वीर्यममानुषम् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

उस वेदवतीने पहले ही अपने रोषजनित शापके द्वारा आपके उस पर्वताकार शत्रुको मार डाला था, जिसे अब आपने आक्रमण करके मौतके घाट उतारा है । प्रभो ! आपका पराक्रम अलौकिक है ॥ ४१ ॥

एवमेषा महाभागा मर्त्येषूत्पत्स्यते पुनः । क्षेत्रे हलमुखोत्कृष्टे वेद्यामग्निशिखोपमा ॥ ४२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार यह महाभागा देवी विभिन्न कल्पोंमें पुनः रावणवधके उद्देश्यसे मर्त्यलोकमें अवतीर्ण होती रहेगी। यज्ञवेदीपर अग्निशिखाके समान हलसे जोते गये क्षेत्रमें इसका आविर्भाव हुआ है ॥ ४२ ॥

एषा वेदवती नाम पूर्वमासीत् कृते युगे । त्रेतायुगमनुप्राप्य वधार्थं तस्य रक्षसः ॥ ४३ ॥ उत्पन्ना मैथिलकुले जनकस्य महात्मनः । सीतोत्पन्ना तु सीतेति मानुषैः पुनरुच्यते ॥ ४४ ॥

भावार्थ

यह वेदवती पहले सत्ययुगमें प्रकट हुई थी । फिर त्रेतायुग आनेपर उस राक्षस रावणके वधके लिये मिथिलावर्ती राजा जनकके कुलमें सीतारूपसे अवतीर्ण हुई । सीता ( हल जोतनेसे भूमिपर बनी हुई रेखा ) से उत्पन्न होनेके कारण मनुष्य इस देवीको सीता कहते हैं ॥ ४३-४४ ॥

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