उत्तरकाण्ड, सर्ग 113
एतावदेतदाख्यानं सोत्तरं ब्रह्मपूजितम् । रामायणमिति ख्यातं मुख्यं वाल्मीकिना कृतम् ॥ १ ॥
भावार्थ
( कुश और लव कहते हैं— ) महर्षि वाल्मीकिद्वारा निर्मित यह रामायण नामक श्रेष्ठ आख्यान उत्तरकाण्डसहित इतना ही है । ब्रह्माजीने भी इसका आदर किया है ॥ १ ॥
ततः प्रतिष्ठितो विष्णुः स्वर्गलोके यथा पुरा । येन व्याप्तमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २ ॥
भावार्थ
इस प्रकार भगवान् श्रीराम पहलेकी ही भाँति अपने विष्णुस्वरूपसे परमधाममें प्रतिष्ठित हुए । उनके द्वारा चराचर प्राणियोंसहित यह समस्त त्रिलोकी व्याप्त है ॥ २ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । नित्यं शृण्वन्ति संहृष्टाः काव्यं रामायणं दिवि ॥ ३ ॥
भावार्थ
उन भगवान्के पावन चरित्रसे युक्त होनेके कारण देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि सदा प्रसन्नतापूर्वक देवलोकमें इस रामायणकाव्यका श्रवण करते हैं ॥ ३ ॥
इदमाख्यानमायुष्यं सौभाग्यं पापनाशनम् । रामायणं वेदसमं श्राद्धेषु श्रावयेद् बुधः ॥ ४ ॥
भावार्थ
यह प्रबन्धकाव्य आयु तथा सौभाग्यको बढ़ाता और पापोंका नाश करता है । रामायण वेदके समान है । विद्वान् पुरुषको श्राद्धोंमें इसे पढ़कर सुनाना चाहिये ॥ ४ ॥
अपुत्रो लभते पुत्रमधनो लभते धनम् । सर्वपापैः प्रमुच्येत पादमप्यस्य यः पठेत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
इसके पाठसे पुत्रहीनको पुत्र और धनहीनको धन मिलता है । जो प्रतिदिन इसके श्लोकके एक चरणका भी पाठ करता है, वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५ ॥
पापान्यपि च यः कुर्यादहन्यहनि मानवः । पठत्येकमपि श्लोकं पापात् स परिमुच्यते ॥ ६ ॥
भावार्थ
जो मनुष्य प्रतिदिन पाप करता है, वह भी यदि इसके एक श्लोकका भी नित्य पाठ करे तो वह सारी पापराशिसे मुक्त हो जाता है ॥ ६ ॥
वाचकाय च दातव्यं वस्त्रं धेनुहिरण्यकम् । वाचके परितुष्टे तु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ ७ ॥
भावार्थ
इसकी कथा सुनानेवाले वाचकको वस्त्र, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये । वाचकके संतुष्ट होनेपर सभी देवता संतुष्ट हो जाते हैं ॥ ७ ॥
एतदाख्यानमायुष्यं पठन् रामायणं नरः । सपुत्रपौत्रो लोकेऽस्मिन् प्रेत्य चेह महीयते ॥ ८ ॥
भावार्थ
यह रामायण नामक प्रबन्धकाव्य आयुकी वृद्धि करनेवाला है । जो मनुष्य प्रतिदिन इसका पाठ करता है, उसे इस लोकमें पुत्र-पौत्रकी प्राप्ति होती है और मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी उसका बड़ा सम्मान होता है ॥ ८ ॥
रामायणं गोविसर्गे मध्याह्ने वा समाहितः । सायाह्ने वापराह्ने च वाचयन् नावसीदति ॥ ९ ॥
भावार्थ
जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो प्रातःकाल, मध्याह्न, अपराह्न अथवा सायंकालमें रामायणका पाठ करता है, उसे कभी कोई दुःख नहीं होता है ॥ ९ ॥
अयोध्यापि पुरी रम्या शून्या वर्षगणान् बहून् । ऋषभं प्राप्य राजानं निवासमुपयास्यति ॥ १० ॥
भावार्थ
( श्रीरघुनाथजीके परमधाम पधारनेके पश्चात् ) रमणीय अयोध्यापुरी भी बहुत वर्षोंतक सूनी पड़ी रहेगी । फिर राजा ऋषभके समय यह आबाद होगी ॥ १० ॥
एतदाख्यानमायुष्यं सभविष्यं सहोत्तरम् । कृतवान् प्रचेतसः पुत्रस्तद् ब्रह्माप्यन्वमन्यत ॥ ११ ॥
भावार्थ
प्रचेताके पुत्र महर्षि वाल्मीकिजीने अश्वमेध यज्ञकी समाप्तिके बादकी कथा एवं उत्तरकाण्डसहित रामायण नामक इस ऐतिहासिक काव्यका निर्माण किया है । ब्रह्माजीने भी इसका अनुमोदन किया था ॥ ११ ॥
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयायुतस्य च । लभते श्रवणादेव सर्गस्यैकस्य मानवः ॥ १२ ॥
भावार्थ
इस काव्यके एक सर्गका श्रवण करनेमात्रसे ही मनुष्य एक हजार अश्वमेध और दस हजार वाजपेय यज्ञोंका फल पा लेता है ॥ १२ ॥
प्रयागादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा । नैमिषादीन्यरण्यानि कुरुक्षेत्रादिकान्यपि ॥ १३ ॥ गतानि तेन लोकेऽस्मिन् येन रामायणं श्रुतम् ।
भावार्थ
जिसने इस लोकमें रामायणकी कथा सुन ली, उसने मानो प्रयाग आदि तीर्थों, गङ्गा आदि पवित्र नदियों, नैमिषा-रण्य आदि वनों और कुरुक्षेत्र आदि पुण्यक्षेत्रोंकी यात्रा पूरी कर ली ॥ १३½ ॥
हेमभारं कुरुक्षेत्रे ग्रस्ते भानौ प्रयच्छति ॥ १४ ॥ यश्च रामायणं लोके शृणोति सदृशावुभौ ।
भावार्थ
जो सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें एक भार सुवर्णका दान करता है और जो लोकमें प्रतिदिन रामायण सुनता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ॥ १४½ ॥
सम्यक्श्रद्धासमायुक्तः शृणुते राघवीं कथाम् ॥ १५ ॥ सर्वपापात् प्रमुच्येत विष्णुलोकं स गच्छति ।
भावार्थ
जो उत्तम श्रद्धासे सम्पन्न हो श्रीरघुनाथजीकी कथा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और विष्णुलोकमें जाता है ॥ १५½ ॥
आदिकाव्यमिदं त्वार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ॥ १६ ॥ यः शृणोति सदा भक्त्या स गच्छेद् वैष्णवीं तनुम् ।
भावार्थ
जो पूर्वकालमें वाल्मीकिद्वारा निर्मित इस आर्षरामायण आदिकाव्यका सदा भक्तिभावसे श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त कर लेता है ॥ १६½ ॥
पुत्रदाराश्च वर्धन्ते सम्पदः संततिस्तथा ॥ १७ ॥ सत्यमेतद् विदित्वा तु श्रोतव्यं नियतात्मभिः । गायत्र्याश्च स्वरूपं तद् रामायणमनुत्तमम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
इसके श्रवणसे स्त्री-पुत्रोंकी प्राप्ति होती है, धन और संतति बढ़ती है । इसे पूर्णतः सत्य समझकर मनको वशमें रखते हुए इसका श्रवण करना चाहिये । यह परम उत्तम रामायणकाव्य गायत्रीका स्वरूप है ॥ १७-१८ ॥
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं चरितं राघवस्य ह । भक्त्या निष्कल्मषो भूत्वा दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ १९ ॥
भावार्थ
जो पुरुष प्रतिदिन भक्तिभावसे श्रीरघुनाथजीके इस चरित्रको सुनता या पढ़ता है, वह निष्पाप होकर दीर्घ आयु प्राप्त कर लेता है ॥ १९ ॥
चिन्तयेद् राघवं नित्यं श्रेयः प्राप्तुं य इच्छति । श्रावयेदिदमाख्यानं ब्राह्मणेभ्यो दिने दिने ॥ २० ॥
भावार्थ
जो कल्याण-प्राप्तिकी इच्छा रखता है, उसे नित्य-निरन्तर श्रीरघुनाथजीका चिन्तन करना चाहिये । ब्राह्मणोंको प्रतिदिन यह प्रबन्धकाव्य सुनाना चाहिये ॥ २० ॥
यस्त्विदं रघुनाथस्य चरितं सकलं पठेत् । सोऽसुक्षये विष्णुलोकं गच्छत्येव न संशयः ॥ २१ ॥
भावार्थ
जो इस श्रीरघुनाथ-चरित्रका पाठ पूर्ण कर लेता है, वह प्राणान्त होनेपर भगवान् विष्णुके ही धाममें जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
पिता पितामहस्तस्य तथैव प्रपितामहः । तत्पिता तत्पिता चैव विष्णुं यान्ति न संशयः ॥ २२ ॥
भावार्थ
इतना ही नहीं, उसके पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध प्रपितामह तथा उनके भी पिता भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २२ ॥
चतुर्वर्गप्रदं नित्यं चरितं राघवस्य तु । तस्माद् यत्नवता नित्यं श्रोतव्यं परमं सदा ॥ २३ ॥
भावार्थ
श्रीराघवेन्द्रका यह चरित्र सदा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है । इसलिये प्रतिदिन यत्नपूर्वक निरन्तर इस उत्तम काव्यका श्रवण करना चाहिये ॥ २३ ॥
शृण्वन् रामायणं भक्त्या यः पादं पदमेव वा । स याति ब्रह्मणः स्थानं ब्रह्मणा पूज्यते सदा ॥ २४ ॥
भावार्थ
जो रामायणकाव्यके श्लोकके एक चरण या एक पदका भक्तिभावसे श्रवण करता है, वह ब्रह्माजीके धाममें जाता है और सदा उनके द्वारा पूजित होता है ॥ २४ ॥
एवमेतत् पुरावृत्तमाख्यानं भद्रमस्तु वः । प्रव्याहरत विस्रब्धं बलं विष्णोः प्रवर्धताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
इस प्रकार इस पुरातन आख्यानका आपलोग विश्वास-पूर्वक पाठ करें । आपका कल्याण हो और भगवान् विष्णुके बलकी जय हो ॥ २५ ॥
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