उत्तरकाण्ड, सर्ग 112
अध्यर्धयोजनं गत्वा नदीं पश्चान्मुखाश्रिताम् । सरयूं पुण्यसलिलां ददर्श रघुनन्दनः ॥ १ ॥
भावार्थ
अयोध्यासे डेढ़ योजन दूर जाकर रघुकुलनन्दन भगवान् श्रीरामने पश्चिमाभिमुख हो निकट प्राप्त हुई पुण्यसलिला सरयूका दर्शन किया ॥ १ ॥
तां नदीमाकुलावर्तां सर्वतोऽनुसरन् नृपः । आगतः सप्रजो रामस्तं देशं रघुनन्दनः ॥ २ ॥
भावार्थ
सरयूनदीमें सब ओर भँवरें उठ रही थीं । वहाँ सब ओर घूम-फिरकर रघुनन्दन राजा श्रीराम प्रजाजनोंके साथ एक उत्तम स्थानपर आये ॥ २ ॥
अथ तस्मिन् मुहूर्ते तु ब्रह्मा लोकपितामहः । सर्वैः परिवृतो देवैर्ऋषिभिश्च महात्मभिः ॥ ३ ॥ आययौ यत्र काकुत्स्थः स्वर्गाय समुपस्थितः । विमानशतकोटीभिर्दिव्याभिरभिसंवृतः ॥ ४ ॥
भावार्थ
उसी समय लोकपितामह ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओं तथा महात्मा ऋषि-मुनियोंसे घिरे हुए उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ श्रीरघुनाथजी परमधाम पधारनेके लिये उपस्थित थे । उनके साथ करोड़ों दिव्य विमान शोभा पा रहे थे ॥ ३-४ ॥
दिव्यतेजोवृतं व्योम ज्योतिर्भूतमनुत्तमम् । स्वयंप्रभैः खतेजोभिः स्वर्गिभिः पुण्यकर्मभिः ॥ ५ ॥
भावार्थ
सारा आकाशमण्डल दिव्य तेजसे व्याप्त हो अत्यन्त उत्तम ज्योतिर्मय हो रहा था । पुण्यकर्म करनेवाले स्वर्गवासी स्वयं प्रकाशित होनेवाले अपने तेजसे उस स्थानको उद्भासित कर रहे थे ॥ ५ ॥
पुण्या वाता वयुश्चैव गन्धवन्तः सुखप्रदाः । पपात पुष्पवृष्टिश्च देवैर्मुक्ता महौघवत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
परम पवित्र, सुगन्धित एवं सुखदायिनी हवा चलने लगी। देवताओंद्वारा गिराये गये राशि-राशि दिव्य पुष्पोंकी भारी वर्षा होने लगी ॥ ६ ॥
तूर्यैस्तूर्यशतैः कीर्णं गन्धर्वाप्सरसंकुले । सरयूसलिलं रामः पद्भ्यां समुपचक्रमे ॥ ७ ॥
भावार्थ
उस समय सैकड़ों प्रकारके बाजे बजने लगे और गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे वहाँका स्थान भर गया । इतनेमें ही श्रीरामचन्द्रजी सरयूके जलमें प्रवेश करनेके लिये दोनों पैरोंसे आगे बढ़ने लगे ॥ ७ ॥
ततः पितामहो वाणीं त्वन्तरिक्षादभाषत । आगच्छ विष्णो भद्रं ते दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥ ८ ॥
भावार्थ
तब ब्रह्माजी आकाशसे ही बोले—‘श्रीविष्णुस्वरूप रघुनन्दन ! आइये, आपका कल्याण हो । हमारा बड़ा सौभाग्य है, जो आप अपने परमधामको पधार रहे हैं ॥ ८ ॥
भ्रातृभिः सह देवाभैः प्रविशस्व स्विकां तनुम् । यामिच्छसि महाबाहो तां तनुं प्रविश स्विकाम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! आप देवतुल्य तेजस्वी भाइयोंके साथ अपने स्वरूपभूत लोकमें प्रवेश करें । आप जिस स्वरूपमें प्रवेश करना चाहें, अपने उसी स्वरूपमें प्रवेश करें ॥ ९ ॥
वैष्णवीं तां महातेजो यद्वाऽऽकाशं सनातनम् । त्वं हि लोकगतिर्देव न त्वां केचित् प्रजानते ॥ १० ॥ ऋते मायां विशालाक्षीं तव पूर्वपरिग्रहाम् । त्वामचिन्त्यं महद् भूतमक्षयं चाजरं तथा । यामिच्छसि महातेजस्तां तनुं प्रविश स्वयम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘महातेजस्वी परमेश्वर ! आपकी इच्छा हो तो चतुर्भुज विष्णुरूपमें ही प्रवेश करें अथवा अपने सनातन आकाशमय अव्यक्त ब्रह्मरूपमें ही विराजमान हों । देव ! आप ही सम्पूर्ण लोकोंके आश्रय हैं । आपकी पुरातन पत्नी योगमाया ( ह्लादिनी शक्ति )-स्वरूपा जो विशाललोचना सीतादेवी हैं, उनको छोड़कर दूसरे कोई आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं; क्योंकि आप अचिन्त्य, अविनाशी तथा जरा आदि अवस्थाओंसे रहित परब्रह्म हैं, अतः महातेजस्वी राघवेन्द्र ! आप जिसमें चाहें, अपने उसी स्वरूपमें प्रवेश करें (प्रतिष्ठित हों )’ ॥ १०-११ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः । विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः ॥ १२ ॥
भावार्थ
पितामह ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीने कुछ निश्चय करके भाइयोंके साथ शरीरसहित अपने वैष्णव तेजमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥
ततो विष्णुमयं देवं पूजयन्ति स्म देवताः । साध्या मरुद्गणाश्चैव सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
फिर तो इन्द्र और अग्नि आदि सब देवता, साध्य तथा मरुद्गण भी विष्णुस्वरूपमें स्थित हुए भगवान् श्रीरामकी पूजा ( स्तुति-प्रशंसा ) करने लगे ॥ १३ ॥
ये च दिव्या ऋषिगणा गन्धर्वाप्सरसश्च याः । सुपर्णनागयक्षाश्च दैत्यदानवराक्षसाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर जो दिव्य ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव और राक्षस थे, वे भी भगवान्का गुणगान करने लगे ॥ १४ ॥
सर्वं पुष्टं प्रमुदितं सुसम्पूर्णमनोरथम् । साधुसाध्विति तैर्देवैस्त्रिदिवं गतकल्मषम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
( वे बोले—) ‘प्रभो ! यहाँ आपके पदार्पण करनेसे देवलोकवासियोंका यह सारा समुदाय सफलमनोरथ होनेके कारण हृष्ट-पुष्ट एवं आनन्दमग्न हो गया है । सबके पाप-ताप नष्ट हो गये हैं । प्रभो ! आपको हमारा शतशः साधुवाद है ।’ ऐसा उन देवताओंने कहा ॥ १५ ॥
अथ विष्णुर्महातेजाः पितामहमुवाच ह । एषां लोकं जनौघानां दातुमर्हसि सुव्रत ॥ १६ ॥ इमे हि सर्वे स्नेहान्मामनुयाता यशस्विनः । भक्ता हि भजितव्याश्च त्यक्तात्मानश्च मत्कृते ॥ १७ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् विष्णुरूपमें विराजमान महातेजस्वी श्रीराम ब्रह्माजीसे बोले—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पितामह ! इस सम्पूर्ण जनसमुदायको भी आप उत्तम लोक प्रदान करें ॥ ‘ये सब लोग स्नेहवश मेरे पीछे आये हैं । ये सब-के-सब यशस्वी और मेरे भक्त हैं । इन्होंने मेरे लिये अपने लौकिक सुखोंका परित्याग कर दिया है, अतः ये सर्वथा मेरे अनुग्रहके पात्र हैं’ ॥ १७ ॥
तच्छ्रुत्वा विष्णुवचनं ब्रह्मा लोकगुरुः प्रभुः । लोकान् संतानकान् नाम यास्यन्तीमे समागताः ॥ १८॥
भावार्थ
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर लोकगुरु भगवान् ब्रह्माजी बोले—‘भगवन् ! यहाँ आये हुए ये सब लोग ‘संतानक’ नामक लोकोंमें जायँगे ॥ १८ ॥
यच्च तिर्यग्गतं किंचित् त्वामेवमनुचिन्तयत् । प्राणांस्त्यक्ष्यति भक्त्या तत् संतानेषु निवत्स्यति ॥ १९॥ सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्युक्ते ब्रह्मलोकादनन्तरे ।
भावार्थ
‘पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हुए जीवोंमेंसे भी जो कोई आपका ही भक्तिभावसे चिन्तन करता हुआ प्राणोंका परित्याग करेगा, वह भी संतानक-लोकोंमें ही निवास करेगा । यह संतानक-लोक ब्रह्मलोकके ही निकट है ( साकेत-धामका ही अङ्ग है ) । वह ब्रह्माके सत्य-संकल्पत्व आदि सभी उत्तम गुणोंसे युक्त है। उसीमें ये आपके भक्तजन निवास करेंगे’ १९½ ॥
वानराश्च स्विकां योनिमृक्षाश्चैव तथा ययुः ॥ २० ॥ येभ्यो विनिःसृताः सर्वे सुरेभ्यः सुरसम्भवाः । तेषु प्रविविशुश्चैव सुग्रीवः सूर्यमण्डलम् ॥ २१ ॥ पश्यतां सर्वदेवानां स्वान् पितॄन् प्रतिपेदिरे ।
भावार्थ
जिन वानरों और रीछोंकी देवताओंसे उत्पत्ति हुई थी, वे अपनी-अपनी योनिमें ही मिल गये—जिन-जिन देवताओंसे प्रकट हुए थे, उन्हींमें प्रविष्ट हो गये । सुग्रीवने सूर्यमण्डलमें प्रवेश किया । इसी प्रकार अन्य वानर भी सब देवताओंके देखते-देखते अपने-अपने पिताके स्वरूपको प्राप्त हो गये ॥ २०-२१½ ॥
तथा ब्रुवति देवेशे गोप्रतारमुपागताः ॥ २२ ॥ भेजिरे सरयूं सर्वे हर्षपूर्णाश्रुविक्लवाः ।
भावार्थ
देवेश्वर ब्रह्माजीने जब संतानक-लोकोंकी प्राप्तिकी घोषणा की, तब सरयूके गोप्रतारघाटपर आये हुए उन सब लोगोंने आनन्दके आँसू बहाते हुए सरयूके जलमें डुबकी लगायी ॥ २२½ ॥
अवगाह्याप्सु यो यो वै प्राणांस्त्यक्त्वा प्रहृष्टवत् ॥ २३ ॥ मानुषं देहमुत्सृज्य विमानं सोऽध्यरोहत ।
भावार्थ
जिसने-जिसने जलमें गोता लगाया, वही-वही बड़े हर्षके साथ प्राणों और मनुष्य-शरीरको त्यागकर विमानपर जा बैठा ॥ २३½ ॥
तिर्यग्योनिगतानां च शतानि सरयूजलम् ॥ २४ ॥ सम्प्राप्य त्रिदिवं जग्मुः प्रभासुरवपूंषि तु । दिव्या दिव्येन वपुषा देवा दीप्ता इवाभवन् ॥ २५ ॥
भावार्थ
पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए सैकड़ों प्राणी सरयूके जलमें गोता लगाकर तेजस्वी शरीर धारण करके दिव्यलोकमें जा पहुँचे । वे दिव्य शरीर धारण करके दिव्य अवस्थामें स्थित हो देवताओंके समान दीप्तिमान् हो गये ॥ २४-२५ ॥
गत्वा तु सरयूतोयं स्थावराणि चराणि च । प्राप्य तत्तोयविक्लेदं देवलोकमुपागमन् ॥ २६ ॥
भावार्थ
स्थावर और जङ्गम सभी तरहके प्राणी सरयूके जलमें प्रवेश करके उस जलसे अपने शरीरको भिगोकर दिव्य लोकमें जा पहुँचे ॥ २६ ॥
तस्मिन् येऽपि समापन्ना ऋक्षवानरराक्षसाः । तेऽपि स्वर्गं प्रविविशुर्देहान् निक्षिप्य चाम्भसि ॥ २७॥
भावार्थ
उस समय जो कोई भी रीछ, वानर या राक्षस वहाँ आ गये, वे सभी अपने शरीरको सरयूके जलमें डालकर भगवान्के परमधाममें जा पहुँचे ॥ २७ ॥
ततः समागतान् सर्वान् स्थाप्य लोकगुरुर्दिवि । हृष्टैः प्रमुदितैर्देवैर्जगाम त्रिदिवं महत् ॥ २८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वहाँ आये हुए सब प्राणियोंको संतानक-लोकोंमें स्थान देकर लोकगुरु ब्रह्माजी हर्ष और आनन्दसे भरे हुए देवताओंके साथ अपने महान् धाममें चले गये ॥२८॥
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