सुन्दरकाण्ड, सर्ग 64
सुग्रीवेणैवमुक्तस्तु हृष्टो दधिमुखः कपिः । राघवं लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं चाभ्यवादयत् ॥ १ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके ऐसा कहनेपर प्रसन्नचित्त वानर दधिमुखने श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवको प्रणाम किया ॥ १ ॥
स प्रणम्य च सुग्रीवं राघवौ च महाबलौ । वानरैः सहितः शूरैर्दिवमेवोत्पपात ह ॥ २ ॥
भावार्थ
सुग्रीव तथा उन महाबली रघुवंशी बन्धुओंको प्रणाम करके वे शूरवीर वानरोंके साथ आकाशमार्गसे उड़ चले ॥२॥
स यथैवागतः पूर्वं तथैव त्वरितं गतः । निपत्य गगनाद् भूमौ तद् वनं प्रविवेश ह ॥ ३ ॥
भावार्थ
जैसे पहले आये थे, उतनी ही शीघ्रतासे वे वहाँ जा पहुँचे और आकाशसे पृथ्वीपर उतरकर उन्होंने उस मधुवनमें प्रवेश किया ॥ ३ ॥
स प्रविष्टो मधुवनं ददर्श हरियूथपान् । विमदानुद्धतान् सर्वान् मेहमानान् मधूदकम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
मधुवनमें प्रविष्ट होकर उन्होंने देखा कि समस्त वानरयूथपति जो पहले उद्दण्ड हो रहे थे, अब मदरहित हो गये हैं—इनका नशा उतर गया है और ये मधुमिश्रित जलका मेहन ( मूत्रेन्द्रियद्वारा त्याग ) कर रहे हैं ॥ ४ ॥
स तानुपागमद् वीरो बद्ध्वा करपुटाञ्जलिम् । उवाच वचनं श्लक्ष्णमिदं हृष्टवदङ्गदम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
वीर दधिमुख उनके पास गये और दोनों हाथोंकी अञ्जलि बाँध अङ्गदसे हर्षयुक्त मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले—॥ ५ ॥
सौम्य रोषो न कर्तव्यो यदेभिः परिवारणम् । अज्ञानाद् रक्षिभिःक्रोधाद् भवन्तः प्रतिषेधिताः॥ ६ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! इन रक्षकोंने जो अज्ञानवश आपको रोका था, क्रोधपूर्वक आपलोगोंको मधु पीनेसे मना किया था, इसके लिये आप अपने मनमें क्रोध न करें ॥ ६ ॥
श्रान्तो दूरादनुप्राप्तो भक्षयस्व स्वकं मधु । युवराजस्त्वमीशश्च वनस्यास्य महाबल ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘आपलोग दूरसे थके-माँदे आये हैं, अतः फल खाइये और मधु पीजिये । यह सब आपकी ही सम्पत्ति है। महाबली वीर ! आप हमारे युवराज और इस वनके स्वामी हैं ॥ ७ ॥
मौर्ख्यात् पूर्वं कृतो रोषस्तद् भवान् क्षन्तुमर्हति। यथैव हि पिता तेऽभूत् पूर्वं हरिगणेश्वरः ॥ ८ ॥ तथा त्वमपि सुग्रीवो नान्यस्तु हरिसत्तम ।
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ ! मैंने पहले मूर्खतावश जो रोष प्रकट किया था, उसे आप क्षमा करें; क्योंकि पूर्वकालमें जैसे आपके पिता वानरोंके राजा थे, उसी प्रकार आप और सुग्रीव भी हैं । आपलोगोंके सिवा दूसरा कोई हमारा स्वामी नहीं है।८½॥
आख्यातं हि मया गत्वा पितृव्यस्य तवानघ ॥ ९ ॥ इहोपयानं सर्वेषामेतेषां वनचारिणाम् । भवदागमनं श्रुत्वा सहैभिर्वनचारिभिः ॥ १० ॥ प्रहृष्टो न तु रुष्टोऽसौ वनं श्रुत्वा प्रधर्षितम् ।
भावार्थ
‘निष्पाप युवराज ! मैंने यहाँसे जाकर आपके चाचा सुग्रीवसे इन सब वानरोंके यहाँ पधारनेका हाल कहा था । इन वानरोंके साथ आपका आगमन सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए । इस वनके विध्वंसका समाचार सुनकर भी उन्हें रोष नहीं हुआ ॥ ९-१०½ ॥
प्रहृष्टो मां पितृव्यस्ते सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ ११ ॥ शीघ्रं प्रेषय सर्वांस्तानिति होवाच पार्थिवः ।
भावार्थ
‘आपके चाचा वानरराज सुग्रीवने बड़े हर्षके साथ मुझसे कहा है कि उन सबको शीघ्र यहाँ भेजो’ ॥ ११½ ॥
श्रुत्वा दधिमुखस्यैतद् वचनं श्लक्ष्णमङ्गदः ॥ १२ ॥ अब्रवीत् तान् हरिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारदः ।
भावार्थ
दधिमुखकी यह बात सुनकर बातचीत करनेमें कुशल कपिश्रेष्ठ अङ्गदने उन सबसे मधुर वाणीमें कहा—॥ १२½ ॥
शङ्के श्रुतोऽयं वृत्तान्तो रामेण हरियूथपाः ॥ १३ ॥ अयं च हर्षादाख्याति तेन जानामि हेतुना । तत् क्षमं नेह नः स्थातुं कृते कार्ये परंतपाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘वानरयूथपतियो ! जान पड़ता है भगवान् श्रीरामने हम लोगोंके लौटनेका समाचार सुन लिया; क्योंकि ये बहुत प्रसन्न होकर वहाँकी बात सुना रहे हैं । इसीसे मुझे ऐसा ज्ञात होता है । अतः शत्रुओंको संताप देनेवाले वीरो ! कार्य पूरा हो जानेपर अब हमलोगोंको यहाँ अधिक नहीं ठहरना चाहिये ॥ १३-१४ ॥
पीत्वा मधु यथाकामं विक्रान्ता वनचारिणः । किं शेषं गमनं तत्र सुग्रीवो यत्र वानरः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘पराक्रमी वानर इच्छानुसार मधु पी चुके । अब यहाँ कौन-सा कार्य शेष है । इसलिये वहीं चलना चाहिये, जहाँ वानरराज सुग्रीव हैं ॥ १५ ॥
सर्वे यथा मां वक्ष्यन्ति समेत्य हरिपुङ्गवाः । तथास्मि कर्ता कर्तव्ये भवद्भिः परवानहम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘वानरपुङ्गवो ! आप सब लोग मिलकर मुझसे जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा; क्योंकि कर्तव्यके विषयमें मैं आप लोगोंके अधीन हूँ ॥ १६ ॥
नाज्ञापयितुमीशोऽहं युवराजोऽस्मि यद्यपि । अयुक्तं कृतकर्माणो यूयं धर्षयितुं बलात् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘यद्यपि मैं युवराज हूँ तो भी आपलोगोंपर हुक्म नहीं चला सकता । आपलोग बहुत बड़ा कार्य पूरा करके आये हैं, अतः बलपूर्वक आपपर शासन चलाना कदापि उचित नहीं है’ ॥ १७ ॥
ब्रुवतश्चाङ्गदस्यैवं श्रुत्वा वचनमुत्तमम् । प्रहृष्टमनसो वाक्यमिदमूचुर्वनौकसः ॥ १८ ॥
भावार्थ
उस समय इस तरह बोलते हुए अङ्गदका उत्तम वचन सुनकर सब वानरोंका चित्त प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले—॥ १८ ॥
एवं वक्ष्यति को राजन् प्रभुः सन् वानरर्षभ । ऐश्वर्यमदमत्तो हि सर्वोऽहमिति मन्यते ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! कपिश्रेष्ठ ! स्वामी होकर भी अपने अधीन रहनेवाले लोगोंसे कौन इस तरहकी बात करेगा ? प्राय: सब लोग ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो अहंकारवश अपनेको ही सर्वोपरि मानने लगते हैं ॥ १९ ॥
तव चेदं सुसदृशं वाक्यं नान्यस्य कस्यचित् । सन्नतिर्हि तवाख्याति भविष्यच्छुभयोग्यताम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘आपकी यह बात आपके ही योग्य है । दूसरे किसीके मुँहसे प्रायः ऐसी बात नहीं निकलती । यह नम्रता आपकी भावी शुभयोग्यताका परिचय दे रही है ॥ २० ॥
सर्वे वयमपि प्राप्तास्तत्र गन्तुं कृतक्षणाः । स यत्र हरिवीराणां सुग्रीवः पतिरव्ययः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘हम सब लोग भी जहाँ वानरवीरोंके अविनाशी पति सुग्रीव विराजमान हैं, वहाँ चलनेके लिये उत्साहित हो यहाँ आपके समीप आये हैं ॥ २१ ॥
त्वया ह्यनुक्तैर्हरिभिर्नैव शक्यं पदात् पदम् । कर्तुं गन्तुं हरिश्रेष्ठ ब्रूमः सत्यमिदं तु ते ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘वानरश्रेष्ठ ! आपकी आज्ञा प्राप्त हुए बिना हम वानरगण कहीं एक पग भी नहीं जा सकते, यह आपसे सच्ची बात कहते हैं’ ॥ २२ ॥
एवं तु वदतां तेषामङ्गदः प्रत्यभाषत । साधु गच्छाम इत्युक्त्वा खमुत्पेतुर्महाबलाः ॥ २३ ॥
भावार्थ
वे वानरगण जब ऐसी बातें कहने लगे, तब अङ्गद बोले—‘बहुत अच्छा, अब हमलोग चलें ।’ इतना कहकर वे महाबली वानर आकाशमें उड़ चले ॥ २३ ॥
उत्पतन्तमनूत्पेतुः सर्वे ते हरियूथपाः । कृत्वाऽऽकाशं निराकाशं यन्त्रोत्क्षिप्ता इवोपलाः ॥ २४ ॥
भावार्थ
आगे-आगे अङ्गद और उनके पीछे वे समस्त वानरयूथपति उड़ने लगे । वे आकाशको आच्छादित करके गुलेल-से फेंके गये पत्थरोंकी भाँति तीव्रगतिसे जा रहे थे ॥ २४ ॥
अङ्गदं पुरतः कृत्वा हनूमन्तं च वानरम् । तेऽम्बरं सहसोत्पत्य वेगवन्तः प्लवङ्गमाः ॥ २५ ॥ विनदन्तो महानादं घना वातेरिता यथा ।
भावार्थ
अङ्गद और वानरवीर हनुमान्को आगे करके सभी वेगवान् वानर सहसा आकाशमें उछलकर वायुसे उड़ाये गये बादलोंकी भाँति बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हुए किष्किन्धाके निकट जा पहुँचे ॥ २५½ ॥
अङ्गदे समनुप्राप्ते सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ २६ ॥ उवाच शोकसंतप्तं रामं कमललोचनम् ।
भावार्थ
अङ्गदके निकट पहुँचते ही वानरराज सुग्रीवने शोकसंतप्त कमलनयन श्रीरामसे कहा—॥ २६½ ॥
समाश्वसिहि भद्रं ते दृष्टा देवी न संशयः ॥ २७ ॥ नागन्तुमिह शक्यं तैरतीतसमयैरिह ।
भावार्थ
‘प्रभो ! धैर्य धारण कीजिये । आपका कल्याण हो । सीतादेवीका पता लग गया है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि कृतकार्य हुए बिना दिये हुए समयकी अवधिको बिताकर ये वानर कदापि यहाँ नहीं आ सकते थे ॥ २७½ ॥
अङ्गदस्य प्रहर्षाच्च जानामि शुभदर्शन ॥ २८ ॥ न मत्सकाशमागच्छेत् कृत्ये हि विनिपातिते । युवराजो महाबाहुः प्लवतामङ्गदो वरः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘शुभदर्शन श्रीराम ! अङ्गदकी अत्यन्त प्रसन्नतासे भी मुझे इसी बातकी सूचना मिल रही है । यदि काम बिगाड़ दिया गया होता तो वानरोंमें श्रेष्ठ युवराज महाबाहु अङ्गद मेरे पास कदापि लौटकर नहीं आते ॥ २८-२९ ॥
यद्यप्यकृतकृत्यानामीदृशः स्यादुपक्रमः । भवेत् तु दीनवदनो भ्रान्तविप्लुतमानसः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘यद्यपि कार्य सिद्ध न होनेपर भी इस तरह लोगोंका अपने घर लौटना देखा गया है, तथापि उस दशामें अङ्गदके मुखपर उदासी छायी होती और उनके चित्तमें घबराहटके कारण उथल-पुथल मचा होता ॥ ३० ॥
पितृपैतामहं चैतत् पूर्वकैरभिरक्षितम् । न मे मधुवनं हन्यादद्दृष्ट्वा जनकात्मजाम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘मेरे बाप-दादोंके इस मधुवनका, जिसकी पूर्वजोंने भी सदा रक्षा की है, कोई जनककिशोरीका दर्शन किये बिना विध्वंस नहीं कर सकता था ॥ ३१ ॥
कौसल्या सुप्रजा राम समाश्वसिहि सुव्रत । दृष्टा देवी न संदेहो न चान्येन हनूमता ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीराम ! आपको पाकर माता कौसल्या उत्तम संतानकी जननी हुई है । आप धैर्य धारण कीजिये । इसमें कोई संदेह नहीं कि देवीसीताका दर्शन हो गया । किसी औरने नहीं, हनुमान्जीने ही उनका दर्शन किया है ॥ ३२ ॥
नह्यन्यः कर्मणो हेतुः साधनेऽस्य हनूमतः । हनूमतीह सिद्धिश्च मतिश्च मतिसत्तम ॥ ३३ ॥ व्यवसायश्च शौर्यं च श्रुतं चापि प्रतिष्ठितम् । जाम्बवान् यत्र नेता स्यादङ्गदश्च हरीश्वरः ॥ ३४ ॥ हनूमांश्चाप्यधिष्ठाता न तत्र गतिरन्यथा ।
भावार्थ
‘मतिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! इस कार्यको सिद्ध करनेमें हनुमान्जीके सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है । वानरशिरोमणि हनुमान्में ही कार्यसिद्धिकी शक्ति और बुद्धि है । उन्हींमें उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है । जिस दलके नेता जाम्बवान् और महाबली अङ्गद हों तथा अधिष्ठाता हनुमान् हों, उस दलको विपरीत परिणाम— असफलता मिले, यह सम्भव नहीं है ॥ ३३-३४½ ॥
मा भूद्विचिन्तासमायुक्तः सम्प्रत्यमितविक्रम ॥ ३५ ॥ यदा हि दर्पितोद्ग्राः संगताः काननौकसः । नैषामकृतकार्याणामीदृशः स्यादुपक्रमः ॥ ३६ ॥ वनभङ्गेन जानामि मधूनां भक्षणेन च ।
भावार्थ
‘अमित पराक्रमी श्रीराम ! अब आप चिन्ता न करें । ये वनवासी वानर जो इतने अहंकारमें भरे हुए आ रहे हैं, कार्य सिद्ध हुए बिना इनका इस तरह आना सम्भव नहीं था । इनके मधु पीने और वन उजाड़नेसे भी मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है’ ॥ ३५-३६½ ॥
ततः किलकिलाशब्दं शुश्रुवासन्नमम्बरे ॥ ३७ ॥ हनूमत्कर्मदृप्तानां नदतां काननौकसाम् । किष्किन्धामुपयातानां सिद्धिं कथयतामिव ॥ ३८ ॥
भावार्थ
वे इस प्रकार कह ही रहे थे कि उन्हें आकाशमें निकटसे वानरोंकी किलकारियाँ सुनायी दीं । हनुमान्जीके पराक्रमपर गर्व करके किष्किन्धाके पास आ गर्जना करनेवाले वे वनवासी वानर मानो सिद्धिकी सूचना दे रहे थे ॥ ३७-३८ ॥
ततः श्रुत्वा निनादं तं कपीनां कपिसत्तमः । आयताञ्चितलाङ्गूलः सोऽभवद्धृष्टमानसः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
उन वानरोंका वह सिंहनाद सुनकर कपिश्रेष्ठ सुग्रीवका हृदय हर्षसे खिल उठा । उन्होंने अपनी पूँछ लंबी एवं ऊँची कर दी ॥ ३९ ॥
आजग्मुस्तेऽपि हरयो रामदर्शनकाङ्क्षिणः । अङ्गदं पुरतः कृत्वा हनूमन्तं च वानरम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
इतनेमें ही श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी इच्छासे अङ्गद और वानरवीर हनुमान्को आगे करके वे सब वानर वहाँ आपहुँचे ॥ ४० ॥
तेऽङ्गदप्रमुखा वीराः प्रहृष्टाश्च मुदान्विताः । निपेतुर्हरिराजस्य समीपे राघवस्य च ॥ ४१ ॥
भावार्थ
वे अङ्गद आदि वीर आनन्द और उत्साहसे भरकर वानरराज सुग्रीव तथा रघुनाथजीके समीप आवासले नीचे उतरे ॥ ४१ ॥
हनूमांश्च महाबाहुः प्रणम्य शिरसा ततः । नियतामक्षतां देवीं राघवाय न्यवेदयत् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
महाबाहु हनुमान्ने श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और उन्हें यह बताया कि ‘देवी सीता पातिव्रत्यके कठोर नियमोंका पालन करती हुई शरीरसे सकुशल हैं’ ॥ ४२ ॥
दृष्टा देवीति हनुमद्वदनादमृतोपमम् । आकर्ण्य वचनं रामो हर्षमापसलक्ष्मणः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘मैंने देवी सीताका दर्शन किया है’ हनुमान्जीके मुखसे यह अमृतके समान मधुर वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४३ ॥
निश्चितार्थं ततस्तस्मिन् सुग्रीवं पवनात्मजे । लक्ष्मणः प्रीतिमान् प्रीतं बहुमानादवैक्षत ॥ ४४ ॥
भावार्थ
पवनपुत्र हनुमान्के विषयमें सुग्रीवने पहलेसे ही निश्चय कर लिया था कि उन्हींके द्वारा कार्य सिद्ध हुआ है । इसलिये प्रसन्न हुए लक्ष्मणने प्रीतियुक्त सुग्रीवकी ओर बड़े आदरसे देखा ॥ ४४ ॥
प्रीत्या च परयोपेतो राघवः परवीरहा । बहुमानेन महता हनूमन्तमवैक्षत ॥ ४५ ॥
भावार्थ
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्रीरघुनाथजीने परम प्रीति और महान् सम्मानके साथ हनुमान्जीकी ओर देखा ॥४५॥
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