सुन्दरकाण्ड, सर्ग 63
ततो मूर्ध्ना निपतितं वानरं वानरर्षभः। दृष्ट्वोद्विग्नहृदयो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥
भावार्थ
वानर दधिमुखको माथा टेक प्रणाम करते देख वानरशिरोमणि सुग्रीवका हृदय उद्विग्न हो उठा। वे उनसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कस्मात् त्वं पादयोः पतितो मम । अभयं ते प्रदास्यामि सत्यमेवाभिधीयताम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘उठो-उठो । तुम मेरे पैरोंपर कैसे पड़े हो ? मैं तुम्हें अभयदान देता हूँ । तुम सच्ची बात बताओ ॥ २ ॥
किं सम्भ्रमाद्भितं कृत्स्नं ब्रूहि यद् वक्तुमर्हसि । कच्चिन्मधुवने स्वस्ति श्रोतुमिच्छामि वानर ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘कहो, किसके भयसे यहाँ आये हो । जो पूर्णतः हितकर बात हो, उसे बताओ; क्योंकि तुम सब कुछ कहनेके योग्य हो । मधुवनमें कुशल तो है न ? वानर ! मैं तुम्हारे मुखसे यह सब सुनना चाहता हूँ’ ॥ ३ ॥
स समाश्वासितस्तेन सुग्रीवेण महात्मना । उत्थाय स महाप्राज्ञो वाक्यं दधिमुखोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
महात्मा सुग्रीवके इस प्रकार आश्वासन देनेपर महाबुद्धिमान् दधिमुख खड़े होकर बोले—॥ ४ ॥
नैवर्क्षरजसा राजन् न त्वया न च वालिना। वनं निसृष्टपूर्वं ते नाशितं तत्तु वानरैः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! आपके पिता ऋक्षरजाने, वालीने और आपने भी पहले कभी जिस वनके मनमाने उपभोगके लिये किसीको आज्ञा नहीं दी थी, उसीका हनूमान् आदि वानरोंने आज नाश कर दिया ॥ ५ ॥
न्यवारयमहं सर्वान् सहैभिर्वनचारिभिः । अचिन्तयित्वा मां हृष्टा भक्षयन्ति पिबन्ति च ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘मैंने इन वनरक्षक वानरोंके साथ उन सबको रोकनेकी बहुत चेष्टा की, परंतु वे मुझे कुछ भी न समझकर बड़े हर्षके साथ फल खाते और मधु पीते हैं ॥ ६ ॥
एभिः प्रधर्षणायां च वारितं वनपालकैः । मामप्यचिन्तयन् देव भक्षयन्ति वनौकसः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘देव ! इन हनुमान् आदि वानरोंने जब मधुवनमें लूट मचाना आरम्भ किया, तब हमारे इन वनरक्षकोंने उन सबको रोकनेकी चेष्टा की; परंतु वे वानर इनको और मुझे भी कुछ नहीं गिनते हुए वहाँके फल आदिका भक्षण कर रहे हैं ॥ ७ ॥
शिष्टमत्रापविध्यन्ति भक्षयन्ति तथापरे । निवार्यमाणास्ते सर्वे भ्रुकुटिं दर्शयन्ति हि ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘दूसरे, वानर वहाँ खाते-पीते तो हैं ही, उनके सामने जो कुछ बच जाता है, उसे उठाकर फेंक देते हैं और जब हमलोग रोकते हैं, तब वे हमें टेढ़ी भौंहें दिखाते हैं ॥८॥
इमे हि संरब्धतरास्तदा तैः सम्प्रधर्षिताः । निवार्यन्ते वनात् तस्मात् क्रुद्धैर्वानरपुङ्गवैः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जब ये रक्षक उनपर अधिक कुपित हुए, तब उन्होंने इनपर आक्रमण कर दिया । इतना ही नहीं, क्रोधसे भरे हुए उन वानरपुङ्गवोंने इन रक्षकोंको उस वनसे बाहर निकाल दिया ॥ ९ ॥
ततस्तैर्बहुभिर्वीरैर्वानरैर्वानरर्षभाः । संरक्तनयनैः क्रोधाद्वरयः सम्प्रधर्षिताः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘बाहर निकालकर उन बहुसंख्यक वीर वानरोंने क्रोधसे लाल आँखें करके वनकी रक्षा करनेवाले इन श्रेष्ठ वानरोंको घर दबाया ॥ १० ॥
पाणिभिर्निहताः केचित् केचिज्जानुभिराहताः । प्रकृष्टाश्च तदा कामं देवमार्गं च दर्शिताः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘किन्हींको थप्पड़ोंसे मारा, किन्हींको घुटनोंसे रगड़ दिया, बहुतोंको इच्छानुसार घसीटा और कितनोंको पीठके बल पटककर आसमान दिखा दिया ॥ ११ ॥
एवमेते हताः शूरास्त्वयि तिष्ठति भर्तरि । कृत्स्नं मधुवनं चैव प्रकामं तैश्च भक्ष्यते ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! आप-जैसे स्वामीके रहते हुए ये शूरवीर वनरक्षक उनके द्वारा इस तरह मारे-पीटे गये हैं और वे अपराधी वानर अपनी इच्छाके अनुसार सारे मधुवनका उपभोग कर रहे हैं’ ॥ १२ ॥
एवं विज्ञाप्यमानं तं सुग्रीवं वानरर्षभम् । अपृच्छत् तं महाप्राज्ञो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ १३ ॥
भावार्थ
वानरशिरोमणि सुग्रीवको जब इस प्रकार मधुवनके लूटे जानेका वृत्तान्त बताया जा रहा था, उस समय शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परम बुद्धिमान् लक्ष्मणने उनसे पूछा—॥ १३ ॥
किमयं वानरो राजन् वनपः प्रत्युपस्थितः । किं चार्थमभिनिर्दिश्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! वनकी रक्षा करनेवाला यह वानर यहाँ किस लिये उपस्थित हुआ है ? और किस विषयकी ओर संकेत करके इसने दुखी होकर बात की है ?’ ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवो लक्ष्मणेन महात्मना । लक्ष्मणं प्रत्युवाचेदं वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ १५ ॥
भावार्थ
महात्मा लक्ष्मणके इस प्रकार पूछनेपर बातचीत करनेमें कुशल सुग्रीवने उन्हें यों उत्तर दिया—॥ १५ ॥
आर्य लक्ष्मण सम्प्राह वीरो दधिमुखः कपिः । अङ्गदप्रमुखैर्वीरैर्भक्षितं मधु वानरैः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘आर्य लक्ष्मण ! वीर वानर दधिमुखने मुझसे यह कहा है कि ‘अङ्गद आदि वीर वानरोंने मधुवनका सारा मधु खा-पी लिया है’ ॥ १६ ॥
नैषामकृतकार्याणामीदृशः स्याद् व्यतिक्रमः । वनं यदभिपन्नास्ते साधितं कर्म तद् ध्रुवम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘इसकी बात सुनकर मुझे यह अनुमान होता है कि वे जिस कार्यके लिये गये थे, उसे अवश्य ही उन्होंने पूरा कर लिया है । तभी उन्होंने मधुवनपर आक्रमण किया है । यदि वे अपना कार्य सिद्ध करके न आये होते तो उनके द्वारा ऐसा अपराध नहीं बना होता—वे मेरे मधुवनको लूटनेका साहस नहीं कर सकते थे ॥ १७ ॥
वारयन्तो भृशं प्राप्ताः पाला जानुभिराहताः । तथा न गणितश्चायं कपिर्दधिमुखो बली ॥ १८ ॥ पतिर्मम वनस्यायमस्माभिः स्थापितः स्वयम् । दृष्टा देवी न संदेहो न चान्येन हनूमता ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जब रक्षक उन्हें बारंबार रोकनेके लिये आये, तब उन्होंने इन सबको पटककर घुटनोंसे रगड़ा है तथा इन बलवान् वानर दधिमुखको भी कुछ नहीं समझा है । ये ही मेरे उस वनके मालिक या प्रधान रक्षक हैं । मैंने स्वयं ही इन्हें इस कार्यमें नियुक्त किया है ( फिर भी उन्होंने इनकी बात नहीं मानी है ) । इससे जान पड़ता है, उन्होंने देवी सीताका दर्शन अवश्य कर लिया । इसमें कोई संदेह नहीं है । यह काम और किसीका नहीं, हनुमान्जीका ही है ( उन्होंने ही सीताका दर्शन किया है ) ॥ १८-१९ ॥
न ह्यन्यः साधने हेतुः कर्मणोऽस्य हनूमतः । कार्यसिद्धिर्हनुमति मतिश्च हरिपुङ्गवे ॥ २० ॥ व्यवसायश्च वीर्यं च श्रुतं चापि प्रतिष्ठितम् ।
भावार्थ
‘इस कार्यको सिद्ध करनेमें हनुमान्जीके सिवा और कोई कारण बना हो, ऐसा सम्भव नहीं है । वानरशिरोमणि हनुमान्में ही कार्य-सिद्धिकी शक्ति और बुद्धि है । उन्हींमें उद्योग, पराक्रम और शास्त्रज्ञान भी प्रतिष्ठित है ॥ २०½ ॥
जाम्बवान् यत्र नेता स्यादङ्गदश्च महाबलः ॥ २१ ॥ हनूमांश्चाप्यधिष्ठाता न तत्र गतिरन्यथा ।
भावार्थ
‘जिस दलके नेता जाम्बवान् और महाबली अङ्गद हों तथा अधिष्ठाता हनुमान् हों, उस दलको विपरीत परिणाम— असफलता मिले, यह सम्भव नहीं है ॥ २१½ ॥
अङ्गदप्रमुखैर्वीरैर्हतं मधुवनं किल ॥ २२ ॥ विचित्य दक्षिणामाशामागतैर्हरिपुङ्गवैः । आगतैश्चाप्रधृष्यं तद्धृतं मधुवनं हि तैः ॥ २३ ॥ धर्षितं च वनं कृत्स्नमुपयुक्तं तु वानरैः । पातिता वनपालास्ते तदा जानुभिराहताः ॥ २४ ॥ एतदर्थमयं प्राप्तो वक्तुं मधुरवागिह । नाम्ना दधिमुखो नाम हरिः प्रख्यातविक्रमः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘दक्षिण दिशासे सीताजीका पता लगाकर लौटे हुए अङ्गद आदि वीर वानरपुङ्गवोंने उस मधुवनपर प्रहार किया है, जिसे पददलित करना किसीके लिये भी असम्भव था । उन्होंने मधुवनको नष्ट किया, उजाड़ा और सब वानरोंने मिलकर समूचे वनका मनमाने ढंगसे उपभोग किया । इतना ही नहीं, उन्होंने वनके रक्षकोंको भी दे मारा और उन्हें अपने घुटनोंसे मार-मारकर घायल किया । इसी बातको बतानेके लिये ये विख्यात पराक्रमी वानर दधिमुख, जो बड़े मधुरभाषी हैं, यहाँ आये हैं ॥ २२–२५ ॥
दृष्टा सीता महाबाहो सौमित्रे पश्य तत्त्वतः । अभिगम्य यथा सर्वे पिबन्ति मधु वानराः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘महाबाहु सुमित्रानन्दन ! इस बातको आप ठीक समझें कि अब सीताका पता लग गया; क्योंकि वे सभी वानर उस वनमें जाकर मधु पी रहे हैं ॥ २६ ॥
न चाप्यदृष्ट्वा वैदेहीं विश्रुताः पुरुषर्षभ । वनं दत्तवरं दिव्यं धर्षयेयुर्वनौकसः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘पुरुषप्रवर ! विदेहनन्दिनीका दर्शन किये बिना उस दिव्य वनका, जो देवताओंसे मेरे पूर्वजको वरदानके रूपमें प्राप्त हुआ है, वे विख्यात वानर कभी विध्वंस नहीं कर सकते थे’ ॥ २७ ॥
ततः प्रहृष्टो धर्मात्मा लक्ष्मणः सहराघवः । श्रुत्वा कर्णसुखां वाणीं सुग्रीववदनाच्च्युताम् ॥ २८ ॥ प्राहृष्यत भृशं रामो लक्ष्मणश्च महायशाः ।
भावार्थ
सुग्रीवके मुखसे निकली हुई कानोंको सुख देनेवाली यह बात सुनकर धर्मात्मा लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीके साथ बहुत प्रसन्न हुए । श्रीरामके हर्षकी सीमा न रही और महायशस्वी लक्ष्मण भी हर्षसे खिल उठे ॥ २८½ ॥
श्रुत्वा दधिमुखस्यैवं सुग्रीवस्तु प्रहृष्य च ॥ २९ ॥ वनपालं पुनर्वाक्यं सुग्रीवः प्रत्यभाषत ।
भावार्थ
दधिमुखकी उपर्युक्त बात सुनकर सुग्रीवको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने अपने वनरक्षकको फिर इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २९½ ॥
प्रीतोऽस्मि सोऽहं यद्भुक्तं वनं तैः कृतकर्मभिः ॥ ३० ॥ धर्षितं मर्षणीयं च चेष्टितं कृतकर्मणाम् । गच्छ शीघ्रं मधुवनं संरक्षस्व त्वमेव हि । शीघ्रं प्रेषय सर्वास्तान् हनूमत्प्रमुखान् कपीन् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘मामा ! अपना कार्य सिद्ध करके लौटे हुए उन वानरोंने जो मेरे मधुवनका उपभोग किया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ; अतः तुम्हें भी कृतकृत्य होकर आये हुए उन कपियोंकी ढिठाई तथा उद्दण्डतापूर्ण चेष्टाओंको क्षमा कर देना चाहिये । अब शीघ्र जाओ और तुम्हीं उस मधुवनकी रक्षा करो । साथ ही हनुमान् आदि सब वानरोंको जल्दी यहाँ भेजो ॥ ३०-३१ ॥
इच्छामि शीघ्रं हनुमत्प्रधाना- ञ्शाखामृगांस्तान् मृगराजदर्पान् । द्रष्टुं कृतार्थान् सह राघवाभ्यां श्रोतुं च सीताधिगमे प्रयत्नम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘मैं सिंहके समान दर्पसे भरे हुए उन हनुमान् आदि वानरोंसे शीघ्र मिलना चाहता हूँ और इन दोनों रघुवंशी बन्धुओंके साथ मैं उन कृतार्थ होकर लौटे हुए वीरोंसे यह पूछना तथा सुनना चाहता हूँ कि सीताकी प्राप्तिके लिये क्या प्रयत्न किया जाय’ ॥ ३२ ॥
प्रीतिस्फीताक्षौ सम्प्रहृष्टौ कुमारौ दृष्ट्वा सिद्धार्थौ वानराणां च राजा । अङ्गैः प्रहृष्टैः कार्यसिद्धिं विदित्वा बाह्वोरासन्नामतिमात्रं ननन्द ॥ ३३ ॥
भावार्थ
वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण पूर्वोक्त समाचारसे अपनेको सफलमनोरथ मानकर हर्षसे पुलकित हो गये थे । उनकी आँखें प्रसन्नतासे खिल उठी थीं । उन्हें इस तरह प्रसन्न देख तथा अपने हर्षोत्फुल्ल अङ्गोंसे कार्य-सिद्धिको हाथोंमें आयी हुई जान वानरराज सुग्रीव अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गये ॥ ३३ ॥
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